सामाजिक क्रिया का अर्थ - Meaning of Social Action

 सामाजिक क्रिया का अर्थ - Meaning of Social Action


सामाजिक क्रिया के सिद्धांत को प्रस्तुत करने का श्रेय सबसे पहले अल्फ्रेड मार्शल को है। मार्शल ने उपयोगितावादी अवधारणा की विवेचना कर गतिविधि की अवधारणा को विकसित किया गतिविधि को मार्शल ने मूल्यों की एक विशिष्ट श्रेणी माना है। मार्शल के बाद इटली के विलफ्रेडो परेटो ने विशिष्ट चालकों एवं भ्रांत तर्कों की अवधारणाओं को विकसित किया। इसी श्रृंखला में दुर्खीम ने सामाजिक तथ्य की


अवधारणा को प्रस्तुत किया। वर्तमान समय में सामाजिक क्रिया की अवधारणा के प्रमुख प्रवर्तक मैक्स वेबर है। उन्होंने अर्थपूर्ण सामाजिक क्रिया के सिद्धांत को सामने रखा। इसके बाद वेब्लन (Veblin), कॉमंस (Commons), मैकाइवर (Maclver), कालमैनहिम (Karl Mannheim), जैननकी (Znaniecki), पारसंस (Parsons), आर. के. मर्टन (RK Merton) के नाम विशेष महत्वपूर्ण है।

इस श्रंखला में विलियम वाइट (William White), डेविड ग्रॉसमैन (David Reisman) तथा सी राइट मिल्स (C- Write Mills) भी रखे सकते हैं।


सामाजिक क्रिया के द्वारा हम सामाजिक जगत की वास्तविकता का अध्ययन कर सकते हैं। स्वयं मैक्स वेबर ने वर्ग, प्रस्थिति, धर्म, नौकरशाही, राजनैतिक दल एवं अनेक सामाजिक घटनाओं का अध्ययन एवं विश्लेषण सामाजिक क्रिया के माध्यम से किया है। इसलिए मार्टिनडेल मैक्स वेबर के सामाजिक क्रिया के सिद्धांत को व्यवहारवाद की एक शाखा मानते हैं।


मैक्स वेबर सामाजिक क्रिया के अध्ययन में तार्किकता एवं व्यक्तिनिष्ठता दोनों को समुचित स्थान देना चाहते थे। जिससे कि मनोविज्ञान और समाजशास्त्र एक सूत्र में आबद्ध हो जाए। मैक्स वेबर ने अपनी इस अवधारणा को अपनी रचना सामाजिक और आर्थिक संगठन का ( The Theory of Social and Economics Organization) में प्रतिपादित किया।


मैक्स वेबर के द्वारा प्रतिपादित सामाजिक क्रिया की अवधारणा बहुत ही स्पष्ट, गहन एवं सूक्ष्म है उन्होंने स्पष्ट किया कि 


1. समाजशास्त्र मानव क्रियाओं से संबंधित है, प्राकृतिक क्रिया अथवा पशु-पक्षियों की क्रियाओं से नहीं।


2. मैक्स वेबर के अनुसार मानव क्रिया से अर्थ मानव के उस आचरण से है जिसे वह आत्मपरक अर्थ प्रदान करता है।


वेबर के अनुसार मनुष्य कभी-कभी ऐसी क्रियाएं करता है। जिसका कोई उद्देश्य या अर्थ नहीं होता, और ऐसे अर्थविहीन क्रियाओं में समाज विज्ञानों की दिलचस्पी नहीं होती। उदाहरण के तौर पर यदि कोई व्यक्ति बैठे बैठे अपने हाथ पैर हिला रहा हो या अपने बालों में उंगलियां घुमा रहा हो और वह यह सब अचेतन रूप में कर रहा हो, तो उसकी यह क्रिया सामाजिक क्रिया नहीं होगी क्योकि वह यह क्रिया किसी उद्देश्य या प्रयोजन से नहीं कर रहा है।

कोई भी वह क्रिया जो कर्ता की दृष्टि में अर्थपूर्ण होती है उसे ही मानवीय क्रिया कहा जाता है।

मानव की सभी आत्मपरक अर्थ-भरी क्रियाएं भी समाजशास्त्र के अध्ययन क्षेत्र में शामिल नहीं की जाती। समाजशास्त्र की रूचि मानव की केवल उन अर्थ पूर्ण क्रियाओं तक ही सीमित है, जो वह किसी अन्य व्यक्ति या समूह की किसी क्रिया को ध्यान में रखकर या उससे प्रभावित होकर करता है और ऐसी क्रियाओं को ही मैक्स वेबर सामाजिक क्रिया कहते हैं।


मैक्स वेबर के सामाजिक क्रिया के सिद्धांत की विस्तृत व्याख्या करने से पहले हमें क्रिया और व्यवहार के बीच के अंतर को जान लेना आवश्यक है। सामाजिक संबंधों के निर्माण के लिए हमें विभिन्न लोगों से अंतःक्रिया करनी पड़ती है। इन अंतःक्रियाओं से ही सामाजिक संबंधों का जन्म होता है। सामाजिक संबंधों से समाज की क्रिया के लिए चार आवश्यक तत्व है कर्ता, लक्ष्य, साधन और परिस्थिति।


सामाजिक क्रिया तभी संभव है जब वह किसी व्यक्ति के द्वारा की जाए। प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा की जाने वाली क्रिया के पीछे कोई ना कोई लक्ष्य अवश्य होता है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उसे क्रिया करनी पड़ती है। समाजशास्त्रीय रूप से समस्त क्रियाएं सामाजिक क्रिया के अंतर्गत नहीं आती, अपितु हम केवल उन्हीं क्रियाओं को सामाजिक क्रिया कह सकते हैं, जिन्हें कर्ता कोई ना कोई अर्थ प्रदान करता है। व्यक्तियों की यह क्रिया बाह्य (Exterior), आंतरिक (Interior), मानसिक (Mental) एवं भौतिक (Physical) हो सकती है। साथ ही यह समय की दृष्टि से वर्तमान (Present), भविष्य (Future) एवं भूत (Past) तीनों में हो सकती है अर्थात क्रिया का संबंध किसी भी एक काल से हो सकता है।


उपरोक्त आधार पर हम कह सकते हैं कि समाजशास्त्रीय दृष्टि से सभी प्रकार की क्रियाएं सामाजिक क्रियाएं नहीं होती, वरन केवल वे क्रियाएं ही जो अर्थ पूर्ण होती हैं और जिनका संबंध व्यक्ति के भूतकाल वर्तमान या भविष्य के व्यवहार से होता है सामाजिक क्रिया कहलाती है।