सामाजिक तथ्य का अर्थ - Meaning of Social Fact

 सामाजिक तथ्य का अर्थ - Meaning of Social Fact


दुर्खीम का कथन है कि सामाजिक तथ्य के बारे में प्राचीन काल से ही अनेक संदेहास्पद विचारधारा प्रचलित रही है। इसलिए अक्सर प्राणीशास्त्र, मनोविज्ञान एवं समाजशास्त्र की विषय-वस्तु के बारे में अनेक भ्रांतियां हैं। दुर्खीम के अनुसार, सामाजिक तथ्यों के बारे में जानने से पहले यह जानना आवश्यक है कि किन तथ्यों को सामान्यतः सामाजिक कहा जाता है। यह सोचना और भी अधिक आवश्यक है क्योंकि 'सामाजिक' शब्द का प्रयोग अत्यधिक अनिश्चित रूप में होता है। वर्तमान समय में इस शब्द का प्रयोग समाज में होने वाली किसी भी घटना के लिए किया जाता है, चाहे उसकी सामाजिक रूचि कितनी ही सीमित क्यों न हो किंतु ऐसी कोई भी मानवीय घटनाएं नहीं है।

जिन्हें की सामाजिक न कहा जा सके। प्रत्येक व्यक्ति सोता है, खाता है, पीता है, विचार करता है, और यह समाज के हित में होता है। ए सभी कार्य एक व्यवस्थित ढंग से किए जाए। यदि इन सभी को सामाजिक तथ्य मान लिया जाए तो फिर समाजशास्त्र की पृथक रूप से अपनी कोई विषय-वस्तु नहीं होगी। दुर्खीम सामाजिक विचारधारा को वैज्ञानिक आधार प्रदान करना चाहते थे उनके अनुसार सामाजिक विज्ञान की अध्ययन सामग्री सामाजिक तथ्य है। दुर्खीम के अनुसार “सामाजिक तथ्य व्यवहार का वह पक्ष है जिसका निरीक्षण वैषियक रूप से संभव है और जो एक विशेष ढंग से व्यवहार करने को बाध्य करता है।" इसलिए समस्त मानव व्यवहार को सामाजिक तथ्य कहा जा सकता है। दुर्खीम की सामाजिक तथ्य की अवधारणा को और अधिक स्पष्ट करते हुए ए. के. सिन्हा एवं क्लोस्टर मायर (A.K. Shina and klostermair) ने लिखा है कि “सामाजिक तथ्य सामाजिक वास्तविकता के तत्व हैं।"


सामाजिक तथ्यों के अर्थ की विवेचना करते हुए दुर्खीम ने सर्वप्रथम यह निर्णय दिया था कि "सामाजिक तथ्यों को वस्तुओं के समान समझना जाना चाहिए।" हालांकि दुखम के लेखों में वस्तु शब्द का वास्तविक अर्थ कहीं स्पष्ट नहीं हो पाया है और यह भ्रामक बन गया है। दुर्खीम ने स्वयं वस्तु शब्द का प्रयोग चार स्थानों पर अलग-अलग तरह से किया है यह चार अर्थ इस प्रकार हैं


1. सामाजिक तथ्य वह वस्तु है, जिसमें कुछ विशेष गुण होते हैं और इन विशेष गुणों को बाहरी तौर पर देखा जा सकता हैं।


2. सामाजिक तथ्य वह वस्तु है जिन्हें केवल अनुभव के द्वारा ही जाना जा सकता है। 


3. सामाजिक तथ्य वह वस्तु है जिसका अस्तित्व मनुष्य पर बिल्कुल निर्भर नहीं है अर्थात वह मानव से परे अस्तित्व रखता है।


 4. सामाजिक तथ्य वह वस्तु है जो केवल बाहरी तौर पर जानी जा सकती है


दुखींम द्वारा सामाजिक तत्व को वस्तु मानने के बारे में उपरोक्त जो चार अवधारणाएं प्रस्तुत की गई हैं। उनसे पता चलता है कि सामाजिक तथ्य का अर्थ बार-बार बदलता रहता है, क्योंकि सामाजिक तथ्य वस्तु के समान हैं। अत: यह कोई निश्चित धारणा नहीं है। अपितु एक गतिशील अवधारणा है। सामाजिक तथ्य सामाजिक परिस्थितियों से संबंधित रहते हैं और सामाजिक परिस्थितियां परिवर्तनशील होती हैं। व्यक्तियों में परिवर्तन होना स्वाभाविक है। समाज में पाई जाने वाली विशेष प्रकार के तथ्यों की व्याख्या मनोविज्ञान, प्राणीशास्त्र अथवा भौतिकशास्त्र के सिद्धांतों के द्वारा संभव नहीं हैं। दुखींम ने इसी प्रकार के तथ्यों को सामाजिक तथ्य माना है।