सामाजीकरण का अर्थ - The meaning of socialization

 सामाजीकरण का अर्थ - The meaning of socialization


सामाजीकरण एक प्रक्रिया है जो निरन्तर चलती रहती है, जिसके द्वारा बालक या व्यक्ति अपने समाज की जीवन-शैली, रहन-सहन, नियम कायदे सीखता है और समाज में समायोजन करता है। बालक जिस समाज में जन्म लेता है और रहता है उसे उस समाज की भाषा, रहन-सहन, खान-पान, नियम-कायदे, और रीति-रिवाज सीखने होते है। इनके सीखे बिना वह उस समाज में समायोजन नहीं कर सकता तथा उस समाज का सदस्य नहीं बन सकता। बालक ये सब कार्य एक दिन में नहीं सीखता यह सब सीखने में उसे काफी समय लगता है जन्म से लेकर मृत्यु तक वह सीखता ही रहता है अत: यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है। जन्म के साथ ही परिवार में रहकर भाषा एवं परिवार के नियम कायदे रहन-सहन, खान-पान और आचरण सीखता है। विद्यालय में जाने के बाद वह अन्य छात्रों के सम्पर्क में आने के पश्चात् आपसी व्यवहार विद्यालय के नियम, सामूहिक कार्य, सहयोग, सीखता है।

वह जैसे जैसे बड़ा होता है तैसे तैसे समाज के रीतिरिवाज सीखने लगता है और उसकी के अनुसार अपना आचरण कर अपने समाज में समायोजन करता है। प्रायः मनुष्य एक साथ अनेक समाजों का सदस्य होता है, इनमें से किसी भी समाज में समायोजन करने के लिए उसे उसकी भाषा, और व्यवहार प्रतिमानों को सीखना होता है। इस पूरी प्रक्रिया को समाजीकरण कहते हैं। परन्तु यहाँ यह स्पष्ट करना अनिवार्य है कि सामाजिकरण का अर्थ समाज का अन्धानुकरण करना नहीं हैं यदि जैसा समाज है वैसा ही हम अनुसरण करते रहे तो समाज की विकासात्मक प्रक्रिया में एक ठहराव-सा आ जायेगा। इसी कारण यह प्रक्रिया चयनात्मक एवं मूल्यांकनात्मक प्रक्रिया हैं जो समाज में विद्यामान तौर तरीकों का मूल्यांकन करता है और जो समय की दृष्टि से उचित एवं वांछनीय है उनका चयन कर लेता है। अन्य को छोड़ देता है। उदाहरणार्थ- भारतीय समाज की आधारभूत विशेषता है

जाति व्यवस्था परन्तु आज के समाज में हमें इसका त्याग करना होगा जो व्यक्ति अपने आपको इस जातिगत भेदभावों से दूर रख सके, वही समाजीकृत व्यक्ति कहा जायेगा।


जिस छात्र या व्यक्ति का समाजीकरण हो जाता है, वह अपने व्यवहार को समाज के मूल्यों एवं मानकों के अनुसार अपने आप को ढालता है तथा वह ऐसे कार्य नहीं करता जो समाज विरोधी हो इस प्रकार हम कह सकते है कि समाजीकरण की प्रक्रिया व्यक्ति के व्यवहार को प्रतिबन्धित करती है वह समाज के नियम कायदों में बंध कर रह जाता है और कुछ नया नहीं कर पाता है या नया करने के लिए उसे संघर्ष करना पड़ता है। वास्तव में समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा बालक समाज के तौर तरीकों को सीखता है व उन्हें अपने व्यक्तित्व का अभिन्न अंग बनाता है। किशोरावस्था के छात्र छात्राओं को समाजीकरण प्रक्रिया में बहुत संघर्ष करना पड़ता है वे सामाजिक नियमों को मानना नहीं चाहते जबकि परिवार एवं समाज निरन्तर उन पर समाज के अनुरूप चलने का दबाब डालता है।