यांत्रिकी एवं सावयवी एकता का सिद्धांत - mechanics and principle of organic unity

 यांत्रिकी एवं सावयवी एकता का सिद्धांत - mechanics and principle of organic unity

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है वह समाज के बिना नहीं रह सकता। उसके स्वभाव में सामाजिकता होती है। वह अपनी आवश्यकताओं के कारण भी सामाजिक होता है। उसे समाज सुरक्षा प्रदान करता है एवं उसकी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। अर्थात समाज में किसी न किसी प्रकार से जाती है। समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने आपको समाज के अनुरूप बनाता है, समाज के अनुरूप अपने को एकता पाई ढालने का प्रयास करता है, इससे उसमें सामूहिक चेतना उत्पन्न होती है और यह सामूहिक चेतना जितनी दृढ़ होती है, समाज में एकता भी उतनी ही दृढ़ होती है।

दुर्खीम ने सामाजिक एकता को एक व्यापक अर्थ में लिया है, हालांकि सामाजिक एकता की अवधारणा केवल दुर्खीम के द्वारा प्रस्तुत नहीं की गई है बल्कि अनेक विचारको जैसे प्लेटो, अरस्तु, फर्गुसन, सेंट साइमन, एडम स्मिथ, अगस्त कॉम्ट और हरबर्ट स्पेंसर ने भी अपने लेखों और रचनाओं में सामाजिक एकता का उल्लेख किया है। परंतु दुर्खीम ने इसे नए रूप में प्रस्तुत किया। इनके अनुसार सामाजिक एकता का अर्थ समाज की विभिन्न इकाइयों में समायोजन से है। दुर्खीम के अनुसार सामाजिक एकता पूर्णतः एक नैतिक घटना है क्योंकि इसके द्वारा ही समाज में सहयोग एवं सद्भावना को बढ़ावा मिलता है।