मध्यकालीन सामाजिक चिंतन - medieval social thought
मध्यकालीन सामाजिक चिंतन - medieval social thought
वैदिककालीन सामाजिक चिंतन के बाद भारतीय सामाजिक चिंतन में विसंगतियाँ उत्पन्न होने लगी। व्यावहारिक धर्मवाद एंव आध्यात्मवाद का स्थान कर्मकांड़ लेने लगे। वर्ण प्रथा का विकृत रूप जाति व्यवस्था में बदलने लगी। जहाँ इसकी प्रकृति कठोर और बन्द प्रस्थिति वाली थी। स्त्रियों की स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा में कमी आने लगी। इस प्रकार के सामाजिक चिंतन में रूढ़िवादिता, अंधविश्वास, और जाति प्रथा में वृद्धि हुई जिसके कारण छठी एवं सातवीं शताब्दी में तत्कालीन समाज व्यवस्था के विरोध में जैन एवं बौद्ध धर्म के रूप में धार्मिक आंदोलन शुरू हुए जिसके माध्यम से समाज को • सुधारने को प्रयास शुरू हुआ। समाज में सत्य, अहिंसा, आस्तेय, ब्रह्मचर्य आदि सम्बन्धी विचारधारा का महत्व बढ़ा।
इसके बाद सामाजिक चिंतन में स्मृतियों का युग आया जिसमें वैदिककालीन चिंतन सामाजिक चिंतन को पुनः महत्व दिया जाने लगा। जिसमें मनु, याज्ञवालक्य, भृगु आदि का विशेष महत्व है। मनु ने अपनी रचना 'मनुस्मृति' में तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था का व्यापक वर्णन किया है। तीन सौ ईसवीं पूर्व कौटिल्य ने अपने ग्रन्थ ‘अर्थशास्त्र' में मौर्ययुगीन सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व्यवस्था का व्यापक वर्णन किया है। चाणक्य ने विवाह, परिवार, भष्ट्राचार, महिलाओं की दशा आज के बारे में विस्तृत चिंतन किया है।
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