परिवार की नवीन प्रवृत्तियां - New Trends of Family

 परिवार की नवीन प्रवृत्तियां - New Trends of Family


परिवर्तन एक सार्वभौमिक तथ्य है। समाज और उसका कोई भी अंग परिवर्तन के प्रभाव से नहीं बच सका। 18 वीं सदी के अंत में यूरोप और भारत में 19 वीं सदी के प्रारंभ से औद्योगीकरण एवं नगरीकरण में में वृद्धि हुई है,परिवार में अनेक परिवर्तन प्रारंभ हुआ। औद्योगीकरण से पूर्व परिवारिक एक उत्पादनशील इकाई था किंतु औद्योगीकरण होने पर उत्पादन कारखाने में होने लगा, एक परिवार के सभी सदस्य कारखानों में काम पर जाने लगे, जिससे बच्चों और परिवार की उपेक्षा हुई परंतु इससे परिवार की आर्थिक स्थिति थोड़ी अच्छी हुई। पिता का परिवार पर नियंत्रण कम हुआ, सदस्यों की स्वतंत्रता एवं व्यक्तिवादिता में भी वृद्धि हुई।औद्योगिकरण ने स्त्रियों को आर्थिक स्वतंत्रता प्रदान की। उनके लिए समानता की मांग राज्य एवं उसके कार्यों के विस्तार ने भी परिवार के कई कार्यों को अपने अधिकार में ले लिया जिससे परिवार का महत्व कम हुआ।

नगरीकरण के कारण लोग गांव छोड़कर शहर में जाने लगे जिसके कारण संयुक्त परिवार का विघटन हुआ और एकाकी परिवारों की स्थापना हुई। आधुनिक चिकित्सा एवं औषधि विज्ञान ने भी परिवार कल्याण कार्यक्रम में सहयोग देकर परिवार का आकार छोटा किया। पश्चिमी सभ्यता एवं संस्कृति, व्यक्तिवादी विचार, यातायात के नवीन साधनों एवं विभिन्न प्रकार के संघों एवं संगठनों के निर्माण ने भी परिवार की संरचना एवं प्रकारों को प्रभावित किया जिसके कारण परिवार में अनेक परिवर्तन हुए है। कई नवीन पारिवारिक प्रतिमान उभरकर सामने आ रहे हैं। परिवार के कई कार्य अन्य समितियों द्वारा किए जा रहे हैं जिसके कारण इनके पास बहुत थोड़े कार्य शेष रह गए हैं। वर्तमान में परिवार संक्रमण की स्थिति से गुज़र रहे हैं और अभी तक कोई सर्वस्वीकृत पारिवारिक प्रतिमान दृष्टिगोचर नहीं हो रहे हैं।

आधुनिक समय में परिवार में निम्न लिखित नवीन प्रवृतियां परिवर्तन रहे हैं: 


1. परिवार के आकार में ह्रास (Decline in the size of Family)-परिवार का आकार बहुत छोटा हो गया है। आजकल परिवार में पति पत्नी उनके अविवाहित बच्चे पाए जाते हैं। ऐसे परिवारों में स्वतंत्रता अधिक रहती है। आजकल तो संतानविहीन परिवार या फिर एक संतानवाला परिवार भी काफी मात्रा में पाए जा रहे हैं।फॉल्सम के अनुसार आजकल तो दो बच्चों का परिवार तो सामान्य आदर्श सा बनता जा रहा है। रहन-सहन के उच्च स्तर को बनाए रखने, अधिक बच्चों के पालन-पोषण के भार से बचने तथा संततिनिरोध के साधनों के उपलब्ध होने से परिवार का आकार घटता जा रहा है और सदस्यों की संख्या औसतन 4 से 5 तक रह गई है।


2. पितृसत्तात्मक अधिकार में कमी (Decline in Patriarcha Authority)- कुछ समय पूर्व तक परिवार में पिता सर्वोपरि था। पुरुष का अपनी पत्नी तथा बच्चों पर असीमित अधिकार होता था पर अब स्थिति बदल चुकी है।

कानून व राज्य द्वारा पत्नी व बच्चों को अनेक अधिकार प्रदान किए जा चुके हैं और पिता के अधिकार को को सीमित कर दिया गया है। पारिवारिक समस्याओं पर विचार करते समय पत्नी व बच्चों की राय को भी महत्व दिया जाने लगा है। आधुनिक परिवार अधिनायकवादी आदर्शों से प्रजातांत्रिक आदर्शों की ओर बढ़ रहे हैं।


3. अस्थाई परिवार (Instable Family)- आधुनिक परिवार की भौगोलिक और सामाजिक गतिशीलता पहले से काफी बढ़ चुकी है। परिवार के आकार के छोटा होने तथा विभिन्न प्रकार की व्यवसायिक सुविधाओं के उपलब्ध होने से एक परिवार का एक स्थान और एक व्यवसाय से दूसरे व्यवसाय में जाना सुगम से हो गया है, परिणामस्वरूप मूल परिवार, रिश्तेदारों और पड़ोसियों का ऐसे परिवारों पर कोई नियंत्रण नहीं रहता व आचरणसंबंधी परंपरागत आदर्श प्रभावहीन हो जाते हैं। पति- पत्नी और बच्चे का काफी समय तक परिवार से दूर रहते के कारण भावनात्मक जुड़ाव कम हो जाता है। ये स्थिति परिवार को संगठित रखने में बाधा होती है।

इसके अलावा विवाह विच्छेद को कानूनी मान्यता प्रदान हो जाने से कभी भी परिवार के टूटने का परिस्थितियां उपस्थित हो सकती हैं। अतः इन सब परिवर्तनों के रनपरिवार की अस्थाई प्रकृति में वृद्धि हुई है। 


4. घर के महत्व में कमी (Less importance of Home structure)- आधुनिक परिवार के लिए घर का कोई विशेष आकर्षण एवं महत्व नहीं रहा है केवल सोने एवं भोजन करने के समय व्यक्ति घर पर रहता है। बाकी समय व अन्य स्थानों पर व्यतीत करता है। इससे सदस्यों में अन्तःक्रिया की मात्रा घट गई है। इनके अलावा व्यवसायिक गतिशीलता में वृद्धि के कारण और नए रोजगार के कारण लोग घर बदलते रहते हैं। ऐसी स्थिति में घर के प्रति व्यक्ति का भावनात्मक आकर्षण खत्म हो जाता है। 


5. नातेदारी के महत्व में कमी (Decline in Importance of Kinship)- आधुनिक समय में नातेदारी का महत्व कम होता जा रहा है तथा पारस्परिक संबंधों में तीव्रता से परिवर्तन हो रहे हैं। कुछ समय पूर्व तक व्यक्ति विभिन्न संबंधियों के साथ घनिष्ठ रूप से संबंधित था परन्तुआज व्यक्तिवादिताइतनी बढ़ चुकी है कि व्यक्ति अपने माता-पिता और भाई-बहन तक की चिंता नहीं करते। पहले व्यक्ति की प्रस्थिती का निर्धारण बहुत कुछ सीमा तक और नाते रिश्तेदारों की प्रस्थिति के आधार पर ही होता था परंतु आजकल इसका निर्धारण कि स्वयं की योग्यता के आधार पर होता है इसलिए वर्तमान में नातेरिश्तेदारी का महत्व काफी घट गया है। 


6. स्त्रियों के अधिकार में वृद्धि (Increased rights of Women)- अब समसत्तात्मक परिवार बनते जा रहे है। ऐसे परिवारों में पति और पत्नी की समान सत्ता होती है। पारिवारिक निर्णयों में दोनों की समान भूमिका होती है

इस बदली भी परिस्थिति का मूल कारण स्त्रियों को अनेक सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों का प्राप्त होना है। शिक्षा के प्रसार ने स्त्रियों के अपने अधिकारों के प्रति जागरूक तथा सामाजिक राजनैतिक चेतना जागृत करने में योग दिया है। आजकल स्त्रियों ने नवीन भूमिकाएं ग्रहण की हैं। स्त्रियों के पूर्ण विकास के कारण घर में पनपने वाले पारस्परिक संबंधों एवं परिवार की संरचना में काफी परिवर्तन आया है। 


7. परिवार के परिवर्तित कार्य ( Changing Functions of Family)- अपनी स्वीकृत प्रस्थिति और भूमिका से संबंधित जो कार्य परिवार के विभिन्न सदस्यों द्वारा किए जाते थे उनमे परिवर्तन आ चुका है। परम्परागत परिवार अपने सदस्यों के लिए विभिन्न प्रकार के आर्थिक, धार्मिक, शैक्षणिक, मनोरंजनात्मक, सुरक्षात्मक, स्नेह प्रदान करना जैसे कार्य करता था

यद्यपि यह कार्य आज भी परिवार द्वारा अवश्य किए जाते हैं परंतु इनमें से बहुत से कार्य अन्य संस्थाओं द्वारा किया जाने लगा है जिससे इनका महत्व काफी कम हो गया है। इन कार्यों को करने के लिए अनेक प्रकार की द्वितीयक संस्थाएं पनप चुकी हैं जो परिवार की मूलभूत कार्यों को कर रही हैं अतः जिन आवश्यकताओं के लिए व्यक्ति को परिवार पर निर्भर रहना पड़ता था वह अब समाप्त हो रहा है जिससे परिवार का प्राथमिक संस्था के रूप में महत्व भी समाप्त हो रहा है।


8. विवाह के धार्मिक स्वरूप में परिवर्तन आने से विवाह संस्था में बहुत सारे परिवर्तन होने लगे तथा इसमें प्रेम विवाह, वयस्कविवाह, तलाक अंतरजातीय विवाह, विधवा पुनर्विवाह इत्यादि के कारण इसतरह के मूल्य पनपने लगे जिसने अप्रत्यक्ष रूप से पारिवारिक संरचना को प्रभावित किया है क्योंकि इन सभी परिवर्तनों से त्रियों की स्थिति सशक्त हुई और जिससे परिवार के स्वरूप में संरचनात्मक परिवर्तन आया है।