समाज का सावयवी सिद्धांत - The Organismic Theory of Society

 समाज का सावयवी सिद्धांत - The Organismic Theory of Society


सावयवी विचारधारा के अनुसार सामाजिक जीवशास्त्रीय व्यवस्था एक विशालतम व्यवस्था है। जिसमें व्यक्तिगत सावयव के बाद सामान ही संरचना प्रकार्य और एकता दिखाई देती है तथा जिस पर विकास प्रौढ़ता एवं पतन के समान नियम लागू होते हैं। व्यक्ति समाज के सैल (Cell) हैं और समूह व संस्थाएं उसके अंग और व्यवस्थाएं हैं। यह सिद्धांत समाज के विशिष्ट संस्थाओं तथा शारीरिक अवयवों को व्यवस्थाओं के समरूप मानता है। यद्यपि कुछ लेखक समाज में मस्तिष्क, फेफड़ों अथवा शरीर के अंगों के प्रति रूपों के अस्तित्व को भी स्वीकार करते हैं।


सामाजिक संविदा के सिद्धांतवादियों की आलोचना करते समय हमें सावधान रहना चाहिए कि कहीं समाज को अथवा उसके किसी भी क्षेत्र को एक प्रकार का सावयव मानने की भूल न कर बैठे यह विचार उतना ही प्राचीन है

जितना कि संविदात्मक विचार समाजशास्त्री अगस्त कॉम्ट का मानना है कि समाज की एकता और उसमें व्यक्तियों के सहयोग का विचार सावयव को लेकर ही होना चाहिए। कुछ अन्य विचारक जैसे सोरोकिन “यह बताना चाहते हैं कि समाज जन्म, यौवन, प्रौढ़ता, वृद्धावस्था, और मृत्यु की सावयवी क्रियाओं से ही आगे बढ़ता है।" यह विचार की समाज को अधिक बड़ा शरीर मानने की अपेक्षा एक संयुक्त मस्तिष्क मानना चाहिए। सावयव का यह विचार है कि समाज को अधिक बड़ा शरीर मानने की अपेक्षा एक संयुक्त मस्तिष्क मानना चाहिए सावयव के सिद्धांत से घनिष्ठ रूप से संबंधित है।



यह सिद्धांत प्राचीन एवं आधुनिक दोनों है। प्लेटो की प्रसिद्ध पुस्तक 'रिपब्लिक' हीगल के राजनीतिक दर्शन संप्रदाय में और सामूहिक मस्तिष्क को यथार्थ मानने वाले मेकडूगल आदि विद्वानों के कथन में इसी सिद्धांत का प्रतिपादन हुआ है।

प्लेटो का कथन है कि समाज एक विस्तृत अर्थात बड़े डील-डौल वाले व्यक्ति के समान है। उसने व्यक्ति को समाज या राज्य का सूक्ष्म रूप मानते हुए कहा है कि यदि समाज समस्त विश्व है तो व्यक्ति उसका सूक्ष्म अणु है।" सिसरो ने लिखा है कि राज्य के मुखिया का राज्य में वही स्थान है जो शरीर में आत्मा का होता है।”


हॉब्स ने राज्य की तुलना एक कल्पित महामानव एवं दैत्य लेवियाथन (Laviathan) से की है। उसने समाज की कमजोरियों की तुलना मानव शरीर की बीमारियों के साथ की है वीं 19 शताब्दी में समाज का सावयवी सिद्धांत काफी लोकप्रिय हो गया। फिर जर्मन दार्शनिक ब्लंशली एवं प्रसिद्ध अंग्रेज समाजशास्त्री हरबर्ट स्पेंसर ने व्यक्ति के शरीर व समाज की संरचना में सूक्ष्मतम समानताएं ढूँढ़कर समाज के सावयवी सिद्धांतों को महत्वपूर्ण बनाने का प्रयास किया। ब्लंशली ने लिखा है कि राज्य की व्यवस्था प्राणी शारीर की व्यवस्था की अनुकृति मात्र है।”