परिवार का उत्पत्ति सिद्धांत - Origin of Family
परिवार का उत्पत्ति सिद्धांत - Origin of Family
परिवार की उत्पत्ति से संबंधित प्रमुख सिद्धांत इस प्रकार हैं:
1.शास्त्रीय सिद्धांत(Classical Theory)- प्लेटो तथा अरस्तु ने इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया।इन विद्वानों की मान्यता था कि आरंभ से ही समाज और सामाजिक समूह में पुरुषों का आधिपत्य रहा है, और उनकी प्रधानता पाई जाती रही है। उन्होंने परिवार की उत्पत्ति में भी पुरुषों को ही प्रमुख कारण माना है। इसी आधार पर इन लोगों ने बतलाया है कि प्रारंभ में पितृसत्तात्मक परिवार ही थे।सर हेनरीमेन भी सन 1861 में सभी प्राचीन सभ्यताओं का अध्ययन कर इन्हीं विचारों का समर्थन किया था। प्राचीन ग्रीक, रोमन एवं यहूदी इतिहास पितृसत्तात्मक परिवारों के तथ्य की पुष्टि करते हैं परंतु निश्चय पूर्वक नहीं कहा जा सकता परिवार का यही मौलिक स्वरूप था।
2. यौन साम्यवाद का सिद्धांत (Theory of Sex Communism)- मानव जीवन की प्रारंभिक अवस्था में यौन साम्यवाद पाया जाता था। लुईस मॉर्गन, फ्रेजर, ब्रिफाल्ट की मान्यता थी कि प्रारंभ में परिवार नहीं पाए जाते थे। उस समय यौन संबंधों पर किसी भी प्रकार का नियंत्रण नहीं था कोई भी पुरुष किसी भी स्त्री के साथ या कोई भी स्त्री किसी भी पुरुष के साथ स्वछन्दतापूर्वक यौन संबंध स्थापित कर सकते थे,जिसे यौन साम्यवाद कहा गया। इस अवस्था में परिवार नाम की कोई संस्था नहीं थी। इस सिद्धांत के प्रतिपादकों ने अपने मत के समर्थन में कुछ आदिम जातियों में पाए जाने वाले ऐसे रीति-रिवाजों का उल्लेख किया है जिनसे प्रतीत होता है कि प्रारंभ में यौन सम्बन्धि नियंत्रण काफी कम था।रीति-रिवाजों में त्योहारों के अवसर पर पत्नियों का आदान-प्रदान, सत्कार के लिए पत्नियों को प्रस्तुत करना इत्यादि यौन संबंधी स्वच्छंदता के उल्लेख मिलते हैं।इस सिद्धांत के प्रवर्तक नातेदारी की वर्गीय व्यवस्था से भी काफी प्रभावित थे।
इसके अंतर्गत एक ही आयु समूह के सभी व्यक्तियों को पिता माता बहन अथवा पुत्री के रूप में संबोधित किया जाता था। इन सब तथ्यों के आधार पर कहा गया है कि जीवन के आरंभिक काल में एवं साम्यवाद पाया जाता था।
3. एक विवाह का सिद्धांत (Theory of Monogamy)- इस सिद्धांत का प्रतिपादन वेस्टरमार्क ने पुस्तक" हिस्ट्री ऑफ़ ह्यूमन मैरिज"में किया है। उनकी मान्यता है कि एक विवाह ही परिवार ही थोडार्विन का कहना है कि परिवार का जन्म पुरुष के आधिपत्य और निशा की भावना के कारण हुआ है। वेस्टरमार्क ने डार्विन के इस कथन का पूर्ण समर्थन करते हुए बतालाया है कि पुरुष स्त्रियों पर उसी प्रकार का अधिकार रखना चाहता था जिस प्रकार अपनी संपत्ति पर अपनी शक्ति के आधार पर पुरुष स्त्री पर अपना अधिकार स्थापित करने में सफल भी हुआ। फिर भी जब इस एकाधिकार को इन दोनों के हितों में आवश्यक समझा गया तो समाज द्वारा इन्हें मान्यता प्राप्त हो गई और इसने प्रथा का रूप ग्रहण कर लिया।
आगे चलकर यही विवाह के रीति बन गई है। वेस्टरमार्क ने वाले पूछ वाले बंदरों, गोरिल्ला, चिमपांजीआदि का अध्ययन करके यह बतलाया है कि इनमें भी एक विवाह प्रथा का ही प्रचलन हैं। जुकरर्मेन तथा मैलिनोवस्की ने भी वेस्टरमार्क के इस सिद्धांत का समर्थन किया है। मैलिनोवस्की ने लिखा है कि एक विवाह एक विवाह का सच्चा स्वरूप है, रहा था और रहेगा।
4. मातृसत्तात्मक सिद्धांत (Theory of Matriarchy)- ब्रिफाल्ट ने वेस्टरमार्क के सिद्धांत की कटु आलोचना करते हुए अपनी पुस्तक दी मदर्स' में परिवार की उत्पत्ति के संदर्भ मे मातृसत्तात्मक सिद्धांत प्रस्तुत किया व बतलाया कि आरंभ में यौन संबंधों के बहुत अधिक निश्चित नहीं होने के कारण बालक अपनी माता को ही जानते थे।माता और संतान के संबंधों में ही घनिष्ठता पाई जाती थी व पारिवारिक जीवन में पिता का स्थान महत्वपूर्ण नहीं था। वह शिकार की तलाश में अक्सर घर से बाहर ही रहता था और परिवार का भार माता पर ही होता था ऐसी दशा में पारिवारिक क्षेत्र में माता के अधिकार और बढ़ गए और मातृसत्तात्मक परिवारों का जन्म हुआ। ब्रिफाल्ट ने कहा है कि माता और उनकी संतान की आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा की निरंतर अवश्यकता ने परिवार को जन्म दिया।
परिवार के अंदर स्त्री के वर्चस्व के कारण इसका स्वरूप मातृ सत्तात्मक होता गया। ब्रिफाल्ट ने लिखा है कि परिवार का आरंभिक रूप मातृसत्तात्मक ही था बाद में कृषि विकास और पुरुष प्रभुत्व के कारण पितृसत्तात्मक परिवारों का उदय हुआ। उन्होंने आदिम जातियों में पाए जाने वाले मातृसत्तात्मक परिवारों के उदाहरण के आधार पर बतलाया है कि इन परिवारों में ना केवल स्त्री का स्थान पुरुष के बराबर है बल्कि कहीं-कहीं तो पुरुष से भी ऊंचा है।टायलर नामक विद्वान ने इस सिद्धांत का समर्थन करते हुए बतलाया है कि आरंभ में परिवार का स्वरूप मातृसत्तात्मक था बाद में मातृ सत्तात्मक व पितृसत्तात्मक व्यवस्था का मिश्रित रूप प्रारंभ हुआ और अंत में पितृसत्तात्मक परिवारों की स्थापना हुई आज भी यथावत है।
5. उद्वविकासीय सिद्धांत (Evolutionary Theory)- उद्वविकासीय सिद्धांत परिवार की उत्पत्ति का एक प्रमुख सिद्धांत है। जिसको सर्वप्रथम बैकोफेन (Bachofen) ने प्रतिपादित किया। तत्पश्चात लुईस मॉर्गन (Lewis Morgn) ने इसे विस्तृत रूप में प्रस्तुत किया। हरबर्ट स्पेंसर, मैकलेनन, लुबोक, टायलर इत्यादि इस सिद्धांत के समर्थक रहे हैं।बैकोफेन ने अपने सिद्धांत को निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत किया है। इनका मानना है कि मनुष्य का आरंभिक पारिवारिक जीवन निम्न स्तर का था। उस समय यौन संबंधी निश्चित नियमों का अभाव था। इस समय पति-पत्नी के संबंधों में शिथिलता के कारण वास्तविक पिता का पता लगाना बहुत कठिन था।बच्चों को समूह के सभी पुरुष सदस्यों का संरक्षण प्राप्त था। इस समय पारिवारिक संबंधों में काफी ढीलापन था हर यही स्थिति परिवार की आरंभिक अवस्था मानी जाती हैं धीरे-धीरे परिवार का रूप स्पष्ट होने लगा और मनुष्य को जीवन यापन के लिए कठोर परिश्रम और प्रकृति के साथ घोर संघर्ष करना पड़ा ऐसी स्थिति में स्त्रियों के लिए कठिन परिश्रम करना मुश्किल माना जाता था
और इस प्रकार सामाजिक सांस्कृतिक औरआर्थिक कारणों से समाज में खियों का महत्व एवं संख्या घटता चला गया परिणामस्वरूप बहुपति विवाही परिवारों की उत्पत्ति हुई। कालांतर में विकास के साथ मानव समाज के समक्ष अलग तरह की सामाजिक आर्थिक चुनौतियां हैं तो उससे लड़ने के लिए उन्हें स्त्री की आवश्यकता हुई होगी जिससे समाज में इनका महत्व एवं संख्या दोनों ही बढ़ा होगा। बदलती हुई दशाओं में एक पुरुष कई स्त्रियों से विवाह करने लगा और समाज में बहुपत्नी विवाही परिवार की उत्पत्ति हुई। बहुपत्नी विवाह के दोषों का पता लगने के साथ साथ समाज में लोकतांत्रिक और समानतावादी विचार भी पनपने लगे थे। मानवतावादी मूल्यों के आने के कारण विकास के साथ-साथ स्त्रियों की स्थिति में भी सुधार हुआ परिणामस्वरूप ऐसे सामाजिक संवैधानिक कानून बने जिनके अंतर्गत एक पुरुष केवल एक स्त्री से विवाह कर सकता है अतः समाज में एक विवाही परिवार बनने लगेो वर्तमान समय में परिवार का यह स्वरूप सर्वाधिक है।
लुइस मार्गन परिवार के उद्वविकास के निम्नलिखित पांच चरणों का वर्णन किया है। उन्होंने कहा कि सर्वप्रथम रक्त संबंधी परिवार (Consanguineous Family) का जन्म हुआ। मानव जीवन के आरंभिक काल में ऐसे परिवार पाए जाते थे जिन पर यौन नियंत्रण नहीं था कोई भी किसी के साथ ऐसे संबंध स्थापित कर सकता था। इस अवस्था में भाई-बहनों तक में विवाह होते थे। द्वितीय चरण में समूह परिवार (Punaluan Family) बने। एक परिवार के सभी भाइयों का विवाह दूसरे किसी परिवार के सभी बहनों के साथ होता था और इनमें से प्रत्येक व्यक्ति सभी स्त्रियों का पति था प्रत्येक स्त्री सभी पुरुषों की पत्नी मानी जाती थी। इन परिवारों को समूह परिवार कहा जाता था।तीसरे चरण में सीनडोस्मीयन परिवार (Syndyasmian Family) की स्थापना हुई। इसमें एक पुरुष का विवाह यद्यपि एक ही स्त्री के साथ होता था फिर भी वह परिवार में विवाहित सभी स्त्रियों के साथ यौन संबंध रख सकता था। चतुर्थ चरण पितृसत्तात्मक परिवार (Patriarchal Family) का विकास हुआ । इस समय पिता सर्वशक्तिशाली हो गया, उसके अधिकार बढ़ गए हैं और एक से अधिक स्त्रियों से विवाह करने लगा। पंचम चरण में एक विवाही परिवार की स्थापना हुई।
ऐसे परिवार उद्वविकास की अंतिम अवस्था है। आधुनिक समय में इन्हीं परिवारों का सर्वाधिक महत्व है।
6. चक्राकार सिद्धांत (Cyclical Theory)- इस सिद्धांत के प्रतिपादकों में स्पैंगलर का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। सोरोकिन, लिप्ले, जिमरमैन इस सिद्धांत के अन्य प्रतिपादक रहे हैं। इस सिद्धांत को स्पष्ट करने के दृष्टिकोण से घड़ी के पेंडुलम का उदाहरण दिया गया है।जिस प्रकार घड़ी का सूई एक छोर से दूसरे छोर तक जाता है फिर अपने मूल स्थान पर आता है। यह क्रम चलता ही रहता है।ठीक इसी प्रकार से पारिवारिक प्रतिमान एक छोर से दूसरे छोर की ओर बढ़ते हैं और पुनः अपने मूल स्थान पर लौट आते हैं तत्पश्चात फिर से परिवार का उद्विकास आरंभ हो जाता है। सोरोकिन ने पारिवारिक विकास के इतिहास में तीन अवस्थाओं का उल्लेख किया है और कहा है कि जीवन जहाँ से आरंभ होता है पुनः वही लौट आता है। परिवार की उत्पत्ति और विकास के संबंध में उन्होंने अपने इसी विचार को महत्व दिया है। लिप्ले नामक विद्वान ने फ्रेंच पारिवारिक विकास के इतिहास को 6 भागों में विभक्त किया है और परिवार की उत्पत्ति के इस चक्राकार सिद्धांत का समर्थन किया है।
7. मूलन लियर का सिद्धांत (Theory of Muller-Lyer)-
इन्होंने परिवार के इतिहास को तीन भागों में विभक्त किया है।
1. गोत्र काल (Clan Period)
2. परिवार काल (Family Period)
3. व्यक्तिगत काल () उन्होंने प्रथम दो कालों को 3-3उपकालो में कालों में बांटा है
1. आरंभिक काल
2. मध्यकाल
3. उत्तर काल
तीसरा काल व्यक्तिगत काल का अभी प्रारंभ हुआ है। मूलर लियर की मान्यता है कि अब एक नवीन तांत्रिक परिवार की स्थापना हो रही है और प्रजातांत्रिक परिवार का आरम्भ हुआ है। उन्होंने लिखा है कि जहां राज्य शक्तिशाली होता है वहां परिवार कमजोर होता है और स्त्रियों की स्थिति अच्छी होती हैं और जहां राज्य कमजोर होता है वहां परिवार शक्तिशाली होता है और स्त्रियों की स्थिति तुलनात्मक रूप से कमजोर होती है।
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