सामाजिक पुनर्निर्माण की योजना - Plan of Social Reconstruction
सामाजिक पुनर्निर्माण की योजना - Plan of Social Reconstruction
सामाजिक पुनर्निर्माण की योजना बनाते हुए कॉम्ट ने मनोविज्ञान को इसका आधार माना है -
कॉम्ट के अनुसार मन की तीन अवस्थाएं होती हैं
1. इच्छा व अनुभूति (Feeling)
2. ज्ञान व बुद्धि (Intelligence)
3. धर्म या क्रिया (Action ) कॉम्ट के अनुसार समाज का संचालन तीन व्यक्तियों के द्वारा ही होता है। स्त्री, पुरोहित एवं नेतां । स्त्री की इच्छा प्रेम की प्रतिनिधि है। पुरोहित ज्ञान का प्रतिनिधि है, समाज नेता (उद्योगपति) कर्म का प्रतिनिधि है।
प्रत्येक शहर में शहर की जनता में समाज का संचालन इन्हीं तीनों के द्वारा होता है। कॉम्ट के अनुसार छोटे से छोटे नगरों में जहां पृथक अस्तित्व संभव है।
हम इन वर्गों का दर्शन कर सकते हैं। वहां पुरोहित मिलेंगे जो हमारे अनुमानों को निर्देशित करते हैं। वहां स्त्रियां हैं जो हमारे उच्चतम स्नेह को प्रेरणा प्रदान करती हैं। वहां व्यवहारिक नेता हैं, जो हमारे कार्यों को निर्देशित करते हैं।
कॉम्ट का मत है कि इन तीनों के आधार पर सामाजिक निर्माण की प्रत्यक्षवादी योजना में तीन प्रकार की शक्तियों का समन्वय आवश्यक है
बौद्धिक शक्ति (Intelligence Force)
बौद्धिक शक्ति से तात्पर्य प्रत्यक्षवादी ज्ञान का विस्तार एवं प्रसार है। बौद्धिक शक्ति का जन्म मानवीय चिंतन एवं मनन पर आधारित है। यह विभिन्न अवधारणाओं के रूप में अभिव्यक्त होती है। इसका उत्तरदायित्व पुरोहित वर्ग पर निर्भर है। समाज अपनी प्रगति के लिए निरीक्षण, परीक्षण और वर्गीकरण के द्वारा वैज्ञानिक ज्ञान का अर्जन करें। विज्ञान के आधार पर ही नवीन अविष्कारों एवं योजनाओं का निर्माण संभव है। यही बौद्धिक शक्ति का प्रतीक है।
भौतिक शक्ति (Material Force)
भौतिक शक्ति मानवीय क्रियाकलापों पर आश्रित है तथा यह व्यक्तियों के परिश्रम के परिणाम स्वरुप उत्पन्न होती है। इसका उदय संपत्ति और संस्था के रूप में होता है। किसी भी समाज में संपत्ति अर्जन एवं सामाजिक संगठन के लिए यह आवश्यक है। समाज के सदस्य संगठित रूप से संपत्ति का अर्जन करें। यह भौतिक शक्ति है।
नैतिक शक्ति (Moral Force)
नैतिक शक्ति मानवीय स्नेह पर आधारित है। नैतिक शक्ति की अभिव्यक्ति आज्ञा देने एवं आज्ञा पालन के रूप में प्रकट होती है। इसे हृदय से प्रेरणा मिलती है। समाज में वैज्ञानिक खोज से उपलब्ध परिणामों को समाज पर लागू करने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति एवं समाज में एकता हो, नए ज्ञान को ग्रहण करने की क्षमता हो। इसके लिए आज्ञा देना और आज्ञा मानना आवश्यक है। यह कार्य सत्ता की शक्ति या दबाव पर आधारित न होकर नैतिक शक्ति पर आधारित होना चाहिए। आज्ञा देने वाला भी चरित्रवान हो और उसमें परमार्थ की भावना हो एवं आज्ञा का पालन करने वाला व्यक्ति भी बिना भय व दबाव के मन से ऐसा करने के लिए तैयार हो। कॉम्ट के अनुसार सामाजिक पुनर्निर्माण की योजना में इन तीनों शक्तियों का समुचित समन्वय होगा।
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