प्राथमिक एवं द्वितीयक समूह एवं विशेषताएं - Primary and Secondary Groups and Characteristics

 प्राथमिक एवं द्वितीयक समूह एवं विशेषताएं  - Primary and Secondary Groups and Characteristics


प्राथमिक समूह (Primary Group)


प्राथमिक समूह की अवधारणा का प्रयोग सर्वप्रथम कूले ने अपनी पुस्तक Social Organization 1909 में किया था। उनके अनुसार प्राथमिक समूह से हमारा तात्पर्य उन समूहों से है जिनमें सदस्यों के बीच आमने-सामने के संबंध तथा पारस्परिक सहयोग की विशेषता होती है। कूले के अनुसार ऐसे समूह अनेक अर्थों में प्राथमिक होते हैं, लेकिन विशेष रूप से इस अर्थ में कि ये सामाजिक स्वाभाव और आदर्शों के निर्माण में बुनियादी योगदान देते हैं। इस प्रकार कूले ने प्राथमिक समूह की अवधारणा में सदस्यों के मध्य भौतिक निकटता पर आधारित आमने-सामने के संबंधों के साथ गहरे आत्मीय संबंधों पर बल दिया है। इस रूप में उनकी यह अवधारणा दुर्खीम की यांत्रिक एकता तथा टॉनिज के जैमिनशाफ्ट से समानता प्रदर्शित करती है।


प्राथमिक समूह के विश्लेषण :


1. शारीरिक समीपता या भौतिक निकटता


2. समूह का लघु आकार 


3. संबंधों की अवधि


i. उद्देश्यों की समानता


ii. संबंध स्वयं साध्य होते हैं


iii. संबंधों की वैयक्तिक प्रकृति


iv. संबंधों की समग्रता


V. संबंधों का स्वतः विकास


vi. प्राथमिक समूह की नियंत्रण शक्ति


vii. सार्वभौमिकता


द्वितीयक समूह (Secondary Group)


विभिन्न विचारकों ने कूले के प्राथमिक समूह की अवधारणा के आधार पर तुलनात्मक रूप से तृतीयक समूह को परिभाषित किया है। डेविस का कहना है कि द्वितीय समूहों को स्थूल रूप से सभी प्राथमिक समूहों के विपरीत कहकर परिभाषित किया जा सकता है।

बिरस्टीड का कहना है कि वे सभी समूह तृतीयक हैं जो प्राथमिक नहीं हैं। इन परिभाषाओं से स्पष्ट है कि प्राथमिक समूहों में पाई जाने वाली विशेषताओं के विपरीत प्रकार की विशेषताओं को व्यक्त करने वाले समूह ही तृतीयक समूह हैं। कुछ विचारकों ने अपने परिभाषा में तृतीयक समूह की प्रकृति को स्पष्ट करने का प्रयास किया है, जैसे- आगबर्न निमकाफ का कहना है कि तृतीयक समूह उन्हें कहते हैं जिनमे प्राप्त अनुभवों में घनिष्ठता का अभाव होता है और आकस्मिक संपर्क ही तृतीयक समूह का सारतत्व है। लुण्डबर्ग का कहना है कि तृतीयक समूह वे हैं जिनमे सदस्यों के संबंध अवैयक्तिक हित प्रधान तथा योग्यता पर आधारित होते हैं।


तृतीयक समूह की विशेशताएं:


1. बड़ा आकार


2. अप्रत्यक्ष एवं अवैयक्तिक संबंध


3. उद्देश्यों का विशेषीकरण


4. प्रतिस्पर्धा का महत्व


5. ऐच्छिक तथा अस्थायी सदस्यता


6. औपचारिक तथा परिवर्तनशील संरचना


7. सापेक्षिक स्थायित्व का अभाव