सामाजीकरण के सिद्धांत - principles of socialization

 सामाजीकरण के सिद्धांत - principles of socialization


सामाजीकरण की प्रक्रिया के संबंध में विभिन्न समाजशास्त्रियों द्वारा विभिन्न विचार व्यक्त किये गये हैं जिनमें से प्रमुख सिद्धांत निम्नलिखित है -


• कूले का आत्म दर्पण का सिद्धांत


• मीड का 'मैं' तथा 'मुझे का सिद्धांत


• सिग्मंड फ्राइडका इड, अहम् तथा पराहम का सिद्धांत


• जेम्स का अनुकरण सिद्धांत


• दुर्खीम का सिद्धांत


कूले का सिद्धांत कूले ने अपनी पुस्तक 'ह्यूमन एण्ड सोशल आर्डर' में इस सिद्धांत को प्रतिपादित किया है ।

इसके अनुसार सामाजिक चेतना के विकास में व्यक्ति के आत्म का बहुत महत्व है। इसके साथ ही उन्होंने 'स्वयं का दर्पण' या आत्म-दर्पण' शब्द का उपयोग किया। उन्होंने बताया कि आत्म-दर्पण का प्रभाव हमारे दैनिक जीवन पर पड़ता है। शिशु अपने जन्म के कुछ समय बाद ही यह समझने लगता है कि लोग उसके बारे के में क्या सोचते हैं, वह दूसरे की प्रतिक्रियाओं पर ध्यान देने लगता है। अपने में वह लोगों के क्रोध शाबासी जैसे भाव को समझता है तथा अपने व्यक्तित्व को उसी प्रकार बदल लेता है। अर्थात् वह अपने विषय में वही सोचता है जो समाज उसके विषय में सोचता है यह व्यक्ति का 'स्व' है जैसे – किसी अभिनेत्री के विषय में समाज सोचता है कि वह बहुत सुन्दर है तो वह अभिनेत्री भी अपने बारे में सोचती है कि मैं बहुत सुन्दर । यही उसका 'स्व' है। इस प्रकार 'स्व' का विषय सामाजिक अन्त:क्रियासे विकसित होता है। “स्व या अहम् वह है जो ऊपर (Alter) सोचता है। आत्म्-दर्पण की अवधारणा कूले ने विलियम थैकरे की पुस्तक दी वेनिटी फेयर 'The Vanity fair' से लिया था।


इसी के द्वारा सामाजीकरण की प्रक्रिया प्रारंभ होती है और व्यक्ति को आत्मचेतना सामाजिक चेतना, तथा जन-चेतना प्राप्त होती है। आत्म चेतना अर्थ है व्यक्ति स्वयं के बारे में क्या सोचता है सामाजिक चेतना अर्थ है अन्य व्यक्त्यिों का क्या सोचना है एवं जन चेतना का अर्थ है आत्मचेतना एवं सामाजिक चेतना का सामूहिक दृष्टिकोण जिसमें सभी व्यक्ति एक समुदाय का गठन करते है। कूले का विचार है कि “जन चेतना हेतु विचारों का आदान-प्रदान जरूरी है चूँकि इसके कारण मानव संबंध बने रहते है।


मीड का सिद्धांत – जार्ज मीड ने अपनी पुस्तक 'माइन्ड सेल्फ एण्ड सोसाइटी' में बतलाया कि व्यक्ति में 'स्व' का बोध सामाजिक अन्तः क्रियाओं का परिणाम होता है। 'मैं' व्यक्ति द्वारा दूसरों के प्रति किये जाने वाले व्यवहार का प्रतिनिधि है जबकि 'मुझे' व्यक्ति द्वारा दूसरो के प्रति किए गए व्यवहार की प्रतिक्रिया (जो दूसरे बनाते है) का प्रतिनिधि है।

मैं और 'मुझे' में अन्तः क्रिया के परिणाम स्वरूप 'स्व' का विकास होता है। पहले पहले मैं और ‘मुझे’ में विरोधामास होता है परन्तु जैसे-जैसे व्यक्ति की समाज में अन्त:क्रिया व्यापक स्तर पर होने लगती है 'मैं' और 'मुझे' में अन्तर अन्तर समाप्त हो जाता है तब व्यक्ति अपने बारे में वही सोचने लगता है जो समाज उसके बारे में सोचता है। और अन्त में व्यक्ति समाज के सामान्य व्यवहारों नियमों को अपने व्यक्तित्व में समाहित कर लेता है इसे सामाजीकरण कहते है। सामाजीकरण के पश्चात् उसे यह ज्ञात हो जाता है कि उसे कब कहाँ क्या करना है और क्या नहीं। इसे 'मैं' तथा 'मुझे' का सिद्धांत भी कहते है।


फ्राइड का सिद्धांत – सिगमंड फ्राइड को असमान्य मनोविज्ञान का पिता माना जाता है। फ्राइड के अनुसार “बालक बाल्यावस्था में ही अपनी संस्कृति एवं समाज के विषय में ज्ञान प्राप्त करता है तथा स्वयं को अपने माता-पिता, दादा-दादी के साथ आत्म्सात् करने लगता है तथा उन्हीं के विचार दृष्टिकोण एवं अन्य क्रियाएं चेतन या अचेतन रूप से सीखता है।

इसके अनुसार मानव व्यवहार को तीन भागों में बांट सकते हैं इड (ID) यह मूल प्रवृत्तियों का प्रतिनिधि होता है इसके अन्तर्गत असामाजीकृत या पाशविक इच्छाएं आती है। अत:इड सामाजीकरण के लिए ठीक नहीं है। अहम् (Ego) यह व्यक्ति के व्यवहार का तार्किक पक्ष है जो व्यक्ति को समाज की अपेक्षा के अनुरूप कार्य करने का सुझाव देता है तथा पराहम् (Super ago ) यह समाज के उच्च आदर्शों मूल्यों अपेक्षाओं को प्रदर्शित करता है। अतः सामाजीकरण हेतु फ्राइड अहम् (Ego) एवं परम अहम (Super ego) को आवश्यक मानता है। इड एवं परम अहम् के बीच संतुलन का कार्य अहम् करता है। इड व्यक्ति को गलत कार्य करने को प्रेरित करता है तो परम अहम् उसे आर्दश स्थिति में ले जाने का प्रयास करता है जबकि अहम् किसी गलत (इच्छा) को या विचार को समाज के नियम कायदों के अन्तर्गत कैसे कर सकते है

उसके विषय में सोचने पर मजबूर करता है। जहाँ कूले एवं मीड 'स्व' को सामाजिक अंतः क्रियाओं का परिणाम मानते हैं वहीं फ्रायड इसे मानसिक स्थिति से स्पष्ट करते हैं।


जेम्स का अनुकरण सिद्धांत - जेम्स भी एक मनोवैज्ञानिक हैं जिन्होंने कहा कि शिशु अपने आस-पास के वातावरण को देखकर अपने व्यवहार को बदलते है। वह अअपने बड़ों का अनुकरण करते हैं इसलिए बालक के व्यक्तित्व पर उसके पिता का तथा बालिका के व्यक्तित्व पर उसकी माता का प्रभाव देखा जाता है। दुर्खीम का सिद्धांत प्रसिद्ध समाजशास्त्री इमाइल दुर्खीम ने सामाजीकरण के सिद्धांत को सामूहिक प्रतिनिधित्व पर आधारित बताया। यहाँ सामूहिक प्रतिनिधित्व का अर्थ है कि कोई व्यक्ति उन विचारधाराओं के अनुसार अपने आप को बदलता है जो समाज में व्याप्त है साथ ही व्यक्ति के विकास में समाज में विद्यामान मूल्यों एवं आस्थाओं का भी प्रभाव पड़ता है।