राजनीति शास्त्र और समाजशास्त्र का संबंध - Relation of Political Science and Sociology

राजनीति शास्त्र और समाजशास्त्र का संबंध - Relation of Political Science and Sociology

समाजशास्त्र सम्पूर्ण समाज और सामाजिक व्यवस्था का शास्त्र है। यह व्यक्तियों के समूह के रूप में समाज तथा व्यक्ति के सभी प्रकार के संबंधों का अध्ययन करता है। राजनीति विज्ञान का अध्ययन विषय राज्य भी एवं समाज का ही एक अंग है और राज्य एक राजनीतिक संस्था होने के साथ-साथ सामाजिक संस्था भी है। विद्वान रेटजन हॉफर ने ठीक ही कहा है कि राज्य आपने विकास के प्रारम्भिक चरणों में तो एक सामाजिक संस्था ही थी। अतः राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र एक दूसरे से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित है। कैटलिन ने तो यहां तक कहा है कि राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र अखण्ड है और वास्तव में एक ही तस्वीर के पहलू है। इन दोनों के संबंधों का अध्ययन निम्न रूपों में किया जा सकता है।


1. समाजशास्त्र राजनीति के आधार के रूप में


 समाजशास्त्र सम्पूर्ण सामाजिक परिस्थियों और संबंधों का अध्ययन करता है और यह बताता है कि सामाजिक परिवर्तन तथा विकास के क्या नियम है। राजनीतिक सिद्धांतों और संगठनों का उदय सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर ही हुआ है। अतः राजनीति विज्ञान के उचित अध्ययन के लिए समाजशास्त्र का ज्ञान नितान्त आवश्यक है। गिडिंग्स का मत है कि “समाजशास्त्र के प्राथमिक सिद्धांतों से अनभिज्ञ व्यक्ति को राजविज्ञान पढाना वैसा ही जैसा न्यूटन के गति सम्बन्धी नियमों से अपरिचत व्यक्ति को खगोल विद्या, उष्णता और यन्त्र विद्या से सम्बन्धित विज्ञान की शिक्षा देना। यही नहीं, वरन् समाजशास्त्र के अध्ययन ने राजनीति सिद्वान्त से सम्बन्धित ज्ञान को आधुनिक युग में पर्याप्त प्रभावित किया है। यही कारण है वानेंस ने कहा है कि राजनीतिक सिद्धान्त तथा समाजशास्त्र के बारे में सर्वाधिक विशेष बात यह है कि राजनीतिक सिद्धांतों में गत चालीस वर्षों में जो भी परिवर्तन हुए है जो भी विकास दिशाए दिखलायी गयी है उन सबकी ओर समाजशास्त्र ने ही संकित किया है। दोनों विज्ञानों का इतना निकट सम्पर्क है कि गार्नर के शब्दों में, “राजनीति सामाजिकता में गढी हुई है। ”


2. राजनीति विज्ञान की समाजशास्त्र को देन 


राजनीति विज्ञान भी समाजशास्त्र को सहायता प्रदान करता है। समाजशास्त्र में राज्य की उत्पत्ति, संगठन, ध्येय और कार्या आदि का भी अध्ययन किया जाता है। और समाजशास्त्र राज्य सम्बन्धी यह विशिष्ट ज्ञान राजनीति विज्ञान से ही प्राप्त करता है। गेटल ने ठीक ही लिखा है कि राजनीति विज्ञान समाजशास्त्र को समाज की सामान्य रूपरेखा के तौर पर वे घटनाएं प्रदान करता है। जिनका संबंध राज्य के संगठन और कार्या से होता है। राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र के पारस्परिक संबंध का एक प्रमाण यह है कि मौरिस गिन्सवर्ग, ऑगस्त काम्टे, लेस्टरवार्ड, विलियम ग्राहम, समनर आदि समाजशास्त्रियों ने राज्य की प्रकृति और उद्देश्यों में इतनी रूचि दिखायी है, मानो ये समाजशास्त्र की मुख्य समस्यायें हो।


3. उद्भव के आधार पर संबंध 


प्रारम्भिक सामाजिक चिंतन का रूप मिश्रित था जहां सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक, तत्वों का एक साथ अध्ययन किया जाता है लेकिन सामाजिक चितंन जैसे-जैसे विकसित एंव व्यस्थित होता गया वैसे वैसे विभिन्न सामाजिक विज्ञानों का उद्भव होता गया उद्भव की दृष्टि से राजनीति शास्त्र एक पुरातन सामाजिक विज्ञान है। वही समाज शास्त्र एक नवीन सामाजिक विज्ञान है। राजनीति शास्त्र के उद्भव का श्रेय यूनानी दार्शनिक अरस्तू को जाता है। जिनका चिंतन सामाजिक एवं राजनीति तत्वों पर आधारित था। अरस्तू के एक कथन का उल्लेख यहां अत्यन्त महत्वपूर्ण है। जिसमें उन्होंने कहा था मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह मनुष्य जो सामाजिक नही या तो पशु है या ईश्वर इस तरह अरस्तू का चिंतन समाज, राज्य, परिवार, शिक्षा पर आधारित रहा। वही जब भारत के प्राचीन सामाजिक चिंतन का अध्ययन करते है तो चाणक्य के चिंतन में सामाजिक एवं राजनीतिक तत्वों का सम्मिलित रूप दिखायी पडता है। चाणक्य जिन्हे कौटिल्य भी कहा जाता है ने अपनी पुस्तक अर्थशास्त्र में राज्य का सप्तांग सिद्धान्त दिया। वही उन्होने परिवार, विवाह, वर्ण, आश्रम, पुरूशार्थ, उत्तराधिकार, नारी, स्थिति, आदि जैसे सामाजिक तत्वों का भी अध्ययन किया।


इस तरह हम देखते हैं कि समाजशास्त्रीय चिंतन उतना ही पुराना है जितना की राजनीति चिंतन, प्रारम्भिक अस्था में मिश्रित ये भले ही राजनीति शास्त्र के औपचारिक उद्भव एवं समाज शास्त्र को औरपचारिक उद्भव में भारी अंतर हो। लेकिन इन दोनो सामाजिक विज्ञानों में विशिष्ट संबंध रहा है। समाजशास्त्र का औपचारिक उद्भव 1838 में हुआ। इससे पहले की अनौपचारिक समाजशास्त्रीय चिंतन कहीं न कही अन्य सामाजिक विज्ञानों पर निर्भर था। जिसमें राजनीति शास्त्र का प्रमुख स्थान है। इस तरह समाज शास्त्र का राजनीति शास्त्र से उद्भव एवं विकास के आधार पर घनिष्ठ संबंध है। 18 वीं शताब्दी तक राज्य एवं समाज में कोई भेद नही किया जाता था। इस कारण समाजशास्त्र एवं राजनीति शास्त्र एक ही विषय के अन्तर्गत आते थे। समाजशास्त्र के उद्भव के बाद राज्य एवं समाज में अंतर किया जाने लगा। राज्य का अध्ययन राजनीति शास्त्र करने लगा एवं समाज का अध्ययन समाजशास्त्र।


4. अध्ययन वस्तु के आधार पर संबंध 


समाज शास्त्र समाज का अध्ययन करने वाला विज्ञान है समाज विभिन्न सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक सांस्कृतिक इकाईयो से मिलकर बना है। इस तरह समाजशास्त्र समाज का व्यवस्थित अध्ययन करने के लिए समाजिक संबंधों एवं अन्तः क्रिया का अध्ययन करने के साथ साथ एक सीमा तक आर्थिक एवं राजनीतिक संबंधों का भी अध्ययन करता है। जो समाज के एक आवश्यक अंग है। वर्तमान समय में राजनीतिक समाज शास्त्र की एक इकाई के रूप में राजनीतिक संबंधों एवं अर्न्तक्रियाओं का अध्ययन करती है। वर्ग, संघर्ष, जनमत, प्रजातंत्र, शक्ति, सत्ता, नौकरशाही, वैश्वीकरण आदि जैसे तत्वों का अध्ययन वर्तमान समय में राजनीति शास्त्र एवं समाज शाख दोनों में हो रहा है। गार्नर ने लिखा है राजनीति शास्त्र के बल एक प्रकार के मानव संबंधों जो राज्य से सम्बन्धित है का अध्ययन करता है जबकि समाज शास्त्र इस प्रकार के सामाजिक संबंधों का इस रूप में समाजशास्त्र के अध्ययन वस्तु राजनीति शास्त्र से व्यापक है।


5. चिन्तको एवं सिद्वान्तो के आधार पर संबंध 


गिडिग्स ने लिखा है कि प्रत्येक राजनीति शास्त्रीं, समाजशास्त्री और प्रत्येक समाजशास्त्री, राजनीति शास्त्री होता है। आपके अनुसार समाजशास्त्र के प्राथमिक सिद्धान्तो से अपरिचित लोगो को राज्य के सिद्धांतों को पढना उसी प्रकार बेकार है जिस प्रकार ऐसे व्यक्तियों को ज्योतिस पढाना जिन्होने न्यूटन के सिद्धांतों को नही सीखा हो कहने का तात्पर्य यह है कि राजनीति शास्त्र के प्रारम्भिक सिद्धांतों को समझने के लिए समाजशास्त्रीय ज्ञान अत्यन्त आवश्यक है। ये दोनो शाख एक दूसरे पर काफी निर्भर है।