समाजशास्त्र एवं विद्याशास्त्र में संबंध - Relationship between sociology and pedagogy

 समाजशास्त्र एवं विद्याशास्त्र में संबंध - Relationship between sociology and pedagogy


भारत विद्याशास्त्र जिसे भारतशास्त्र (इण्डोलाजी) भी कहते है का विकास भारत में समाजशास्त्र के विकास के बहुत पहले हो चुका था। जिसके विकास का श्रेय सर विलियम जोन्स, हेनरी मेन, मैकमूलर, आदि जैसे कई प्राच्य विदों को है। इन लोगो ने भारत की समृद्धि प्राचीन संस्कृति और दार्शनिक परंपरा का अध्ययन किया और इस बात पर बल दिया कि भारतीय समाज की संरचना प्रकार्य, गतिशीलता आदि को यूरोपीय परिपेक्ष्य के माध्यम से न समझकर भारत की ऐतिहासिक, प्राचीन संस्कृतिक एवं दार्शनिक परंपरा के माध्यम से समझा जाना चाहिए। इनका मानना था कि भारतशास्त्र के माध्यम से ही भारतीय समाज की वास्तविकता को जाना जा सकता है। जिसके लिए सर विलियम जोन्स 1787 में ऐशियाटिक सोसाइटी आफ बंगाल" की स्थापना की। यहा पर उन्होनें संस्कृत और भारतशास्त्र का अध्ययन आरम्भ किया। इनकी इस सोसाइटी का कार्य एक ऐसी पत्रिका का प्रकाशन करना था जो संस्कृत, तुलनात्मक विधिशास्त्र, तुलनात्मक मिथकों आदि जैसी नृशास्त्र और भारतशास्त्र संबंधित विषयों में रूचि पैदा कर सकें।

मैक्समूलर जैसे विद्वानों ने संस्कृत में सीखकर पुराने महाकाव्यों और साहित्यिक कृतियों के अनुवाद में सहायता की जिसे भारतवासी करीब-करीब भूल चुके थे। इनकें संस्कृत के ज्ञान ने भारत की महान सांस्कृतिक और दार्शनिक परंपरा को समझने में सहायता की। उस समय जब अधिकाश शिक्षित भारतीयों का अंग्रेजी शासकों द्वारा उपहास किया जा रहा था संस्कृत की इस ज्ञान ने उनके स्वाभिमान को फिर से जगाया। भारत विद्याशास्त्रियों ने प्राचीन कानून और समाज का सावधानी अध्ययन किया। जिसमें हेनरी मेन ने सहायता की इन्होने 1871 में विलेज कम्प्यूनिटीज इन दा ईष्ट एव दा वेस्ट' नाम की एक पुस्तक भी लिखी। भारत में समाजशास्त्र का औपचारिक विकास 20 वीं शताब्दी के दूसरें दशक में जीएस घुरिये के निर्देशन में हुआ। घुरिये को भारतीय समाजशास्त्र का जनक कहा जाता है। घुरिये ऐसे पहले समाजशास्त्री थे जिन्होंने अपने अध्ययनों में भारत विद्याशास्त्र का प्रयोग किया यही कारण है कि इन्हें समाजशास्त्र ने भारतीय विद्याशास्त्रीय परिपेक्ष्य के प्रवर्तक के रूप में देखा जाता है। घुरिये जाति व्यवस्था, परिवार एवं नातेदारी व्यवस्था, जनजातिएं समाज, भारतीय समाज में तनाव, भारतीय समाज में साधू की भूमिका तथा भारत के समाज में शहरीकरण के अध्ययन में भारत विद्याशास्त्र का व्यापक प्रयोग किया।

घुरिये के बाद मम्बई विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के अध्यक्ष पद का भार संभालने वाले के.एम. कपाड़िया नातेदारी, विवाह एवं परिवार जैसी मूलभूत भारतीय सामाजिक सामाजिक संस्थाओं को समझने के लिए भारतशास्त्र उपागम का प्रयोग किया। वहीं मति ईरावती कर्वे ने संयुक्त परिवार एवं भारत के नातेदारी व्यवस्था के अध्ययन के लिए इस प्रविधि का प्रयोग किया। लुई डयूमा ने भारत की जाति व्यवस्था एवं गांवों की सामाजिक संरचना के अध्ययन के लिए भारत विद्याशास्त्रीय उपागम का प्रयोग किया। जबकि पी.एन. प्रभु ने भारतीय सामाजिक संरचना को समझने के लिए इस उपागम का प्रयोग किया।


इन समाजशास्त्रीयों के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि भारत विद्याशास्त्र एंव समाजशास्त्र में घनिष्ट संबंध है। भारत के समाजशास्त्रीय अध्ययन में यह विद्याशास्त्र एक विशेष समाजशास्त्रीय उपागम के रूप में सामने आया। जिसका मुख्य कारण है कि भारतीय विद्याशास्त्र जहां भारतीय समाज एवं संस्कृत के अध्ययन के लिए उसकी ऐतिहासिक, दार्शनिक एवं परम्परिक चितंन के पृष्ठभूमि का सहारा लेती है वही समाजशास्त्रीय अध्ययनों में इन समाजशास्त्रियों ने भी इसी अध्ययन पद्धति का प्रयोग किया।