समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र में संबंध - Relationship between sociology and economics
समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र में संबंध - Relationship between sociology and economics
समाजशास्त्र का अर्थशास्त्र में संबंध आपस में बहुत ही घनिष्ट रहे है जिसके मूल में अगर हम जाये तो समाजशास्त्र अपनी प्रारम्भिक अवस्था की शुरूवात अर्थशास्त्र से ही की है। क्यों की प्रारम्भ में भारत में सन् 1921 में अर्थशास्त्र विभाग के अन्तर्गत समाजशास्त्र विषय को मान्यता दी गयी। तथा प्रथम भारतीय विद्वान डॉ. राधा कमल मुखर्जी को समाजशास्त्र का प्रो. नियुक्त किया गया। 1928 में मैसूर विश्व विद्यालय में भी मती इरावती कार्वे की अध्यक्षता में समाजशास्त्र विभाग सन् 1939 में स्थापित हुआ। समाजशास्त्र की स्थापना इन सभी विश्वविद्यालयों में एक पृथक विषय के रूप में न होकर इसे अर्थशास्त्र, मानव शास्त्र तथा सामाजिक दर्शन के साथ ही जोड़े रखा गया था। यही कारण है कि भारत में जिन विद्वानों ने समाजशास्त्रीय विचारधारा को लेकर आगे बढ़े तथा इसे समृद्ध बनाने के व्यापक प्रयत्न किये वे मूल रूप से अर्थशास्त्रीय तथा मानव शास्त्रीय थे अतः समाजशास्त्र तथा अर्थशास्त्र एक दूसरे से जुड़े हुए है।
यदि हम अर्थशास्त्र की परिभाषा करे तो हम कह सकते है कि अर्थशास्त्र धन का विज्ञान है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्र प्रो. मार्शल ने अर्थ शास्त्र की परिभाषा करते हुए लिखा है अर्थ शास्त्र मनुष्य के जीवन की साधारण व्यापार सम्बन्धी क्रियाओं का अध्ययन है अर्थशास्त्र यह मालूम करता है कि मनुष्य किस प्रकार धन कमाता है और किस प्रकार उसे खर्च करता है इस प्रकार यह एक ओर सम्पत्ति का अध्ययन है और दूसरी ओर अधिक महत्वपूर्ण है, मनुष्य के अध्ययन का एक भाग है, इस परिभाषा से यह स्पष्ट है कि अर्थशास्त्र मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं का समग्र रूप से अध्ययन करता है। इस रूप में दोनो विज्ञानों में घनिष्ट रूप से संबंध होना स्वाभाविक है। क्यों कि कोई भी आर्थिक संबंध सामाजिक संबंधों व दशाओं से अलग नहीं है उदाहरण यदि मांग के नियम को लिया जाए तो यह स्पष्ट होगा कि इस नियम के पीछे अनेक सामाजिक तथ्य कार्य करते है। जैसे किसी वस्तु की मांग इस बात पर आधारित होगी कि वह वस्तु विलासित, सूख कर या आवश्यकता, कौन से वर्ग में आती है, प्रथाओं व फैशन से उसका क्या संबंध है आदि इन सभी बातो का अध्ययन समाजशास्त्र करता है मैकाइवर ने इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि इस प्रकार आर्थिक घटनायें सदैव सामाजिक आवश्यकताओं और क्रियाओं के समस्त स्वरूपों द्वारा निश्चित होती है।'
अर्थशास्त्र के अन्तर्गत मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं या आर्थिक व्यवहार का अध्ययन किया जाता है अर्थशास्त्र को वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन एवं वितरण का अध्ययन भी कहा गया है। इस शास्त्र के द्वारा धन के उत्पादन एवं वितरण और उपभोग के सम्बन्धित व्यक्ति के व्यवहार का अध्ययन किया जाता है धन आवश्यकताओं या ईच्छाओं की पूर्ति का प्रमुख साधन है समाजशास्त्र के अन्तर्गत मनुष्य की सामाजिक क्रियाओं या गतिविधियों का अध्ययन किया जाता है यह शास्त्र प्रथा, परम्परा, रूढि, संस्था, संस्कृति, सामाजिक संबंधों के विभिन्न स्वरूपों, सामाजिक प्रक्रियाओं, सामाजिक प्रतिमानों, सामाजिक संरचनाओं में विशेष रूप से रूचि रखता है। समाजशास्त्र समग्र रूप से मानवीय व्यवहार एवं समाज को समझने का प्रयास करता है।
समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र का पारस्परिक संबंध इस तथ्य से भी समझा जा सकता है कि एक ओर समाज की सभी परंपराएँ, प्रथाएँ, जनरीतियां, विश्वास और नैतिकतायें आर्थिक संबंधों की प्रकृति तथा आर्थिक व्यवस्था के स्वरूप का निर्धारण करती है तथा दूसरी ओर समाज की आर्थिक व्यवस्था, सामाजिक संगठन न्याय व्यवस्था और सामाजिक व्यवहारों की प्रकृति को प्रभावित करती है शायद ही ऐसा कोई समय मिले जहां आर्थिक दशायें सामाजिक दशाओं को और सामाजिक दशायें, आर्थिक दशाओं को प्रभावित न करती हो कभी कभी तो एक ही समस्या दोनों विज्ञान की समान समस्या प्रतीत होती है श्रम की दशायें औद्योगिक उन्नति, श्रम कल्याण, ग्रामीण पुनः निर्माण तथा कितने ही इसी प्रकार के विषय है जिनके बारे में यह निर्णय करना लगभग असम्भव सा है इनका अध्ययन किस विज्ञान में किया जाना चाहिए। है
किसी भी देश की आर्थिक व्यवस्था को समझने के लिए उसकी सामाजिक व्यवस्था या पद्वति का ज्ञान होना भी अति आवश्यक है। इस तथ्य के महत्व पर बल देते हुए अर्थशास्त्री पी० एच० बिकस्टीड ने कहा है कि अर्थशास्त्र समाजशास्त्र की गृहस्वामिनी होनी चाहिए अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र का संबंध भी इस बात से स्पष्ट हो जाता है कि अब बहुत से समाज शास्त्रीय अध्ययन आर्थिक समस्याओं को सुलझाने के लिए होनें लगे है। उदाहरण के लिए श्रम विभाजन, औद्योगिक संगठन व्यवसायिक गतिशीलता आदि इसी प्रकार के विषय है बेबर ने तो धर्म (एक सामाजिक तथ्य) और पूंजीवाद (एक आर्थिक तथ्य) के पारस्परिक संबंध को स्पष्ट करके समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र के बीच की समस्त पृथकता को समाप्त कर दिया है। इसी प्रकार मार्क्स की विवेचना में सामाजिक और आर्थिक कारकों का एक सुन्दर समन्वय देखने को मिलता है। इस आधार पर बाटोमोर ने यह निष्कर्ष दिया है कि अब अधिक समय तक समाजशास्त्र तथा अर्थशास्त्र के घनिष्ट संबंध के बारे में कोई संदेह नही रहेगा.. ........
अनेक अर्थशास्त्रियों ने समाजशास्त्र के सामान्य सिद्वान्तो को उपयोग में लाकर इस तथ्य को स्वीकार कर लिया है। समाजशास्त्र में एक नयी शाखा का विकास हुआ है जिसे हम आर्थिक जीवन का समाजशास्त्र कहते है इसमें भी समाज शास्त्र तथा अर्थशास्त्र का घनिष्ट संबंध स्पष्ट हो जाता है।
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