प्रस्थिति एवं भूमिका में संबंध - relationship between status and role
प्रस्थिति एवं भूमिका में संबंध - relationship between status and role
जैसा कि पहले भी बताया जा चुका है कि प्रस्थिति तथा भूमिका दोनों ही अंतर्संबंधित अवधारणाएँ हैं। एक के आधार पर ही दूसरे को परिभाषित किया जा सकता है। समाज में किसी व्यक्ति की स्थिति तथा उसके व्यवहार को समझने के लिए दोनों अवधारणाओं की आवश्यकता रहती है। प्रस्थिति को स्पष्ट तौर से एक समाजशास्त्रीय अवधारणा कहा जा सकता है, जबकि भूमिका का संबंध सामाजिक मनोविज्ञान से अधिक घनिष्ठ प्रतीत होता है। समाज में अनेक प्रकार की भूमिकाएँ देखने को मिलती हैं तथा अनेक प्रकार के व्यक्तित्व वाले व्यक्ति भी देखने को मिलते हैं। प्रत्येक व्यक्ति की योग्यता, कुशलता, परिश्रम आदि दौरे व्यक्ति से भिन्न होती है। यही कारण है कि सभी लोग शिक्षक की भूमिका का निर्वहन समान रूप से नहीं कर सकते।
प्रत्येक समूह अथवा संगठन के विकास के साथ-साथ उसके पदाधिकार्यों के कार्यों, दायित्वों तथा संबंधित कार्यप्रणालियों में भी बदलाव आ जाते हैं। इसलिए भूमिका को प्रस्थिति के गतिशील पक्ष के रूप में परिभाषित किया जाता है।
प्रस्थिति तथा भूमिका के संबंध सदैव स्थिर नहीं रहते हैं, अपितु ये संबंध निरंतर परिवर्तित होते रहते हैं। बिना प्रस्थिति के कोई भूमिका नहीं होती है तथा बिना भूमिका के कोई प्रस्थिति नहीं रहती है। उदाहरणस्वरूप, किसी विद्यालय में एक व्यक्ति की प्रस्थिति शिक्षक की है तथा उस व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाती है कि वह पूरी लगन से विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करे। ऐसी दशा में उस व्यक्ति की भूमिका यह बनती है कि वह विद्यार्थियों को पूरी तन्मयता के साथ पढ़ाये बिना उसकी प्रस्थिति के भूमिका को परिभाषित नहीं किया जा सकता तथा ठीक यही बात भूमिका के संदर्भ से भी लागू होती है।
हालांकि रॉबर्ट बीरस्टीड ने इस बात की आलेचना की है। उनका कहना है कि कई बार व्यक्ति द्वारा किसी अन्य की प्रस्थिति के अनुरूप भूमिका निभानी पड़ती है तथा ना ही उस व्यक्ति से समाज द्वारा ऐसी
भूमिका की अपेक्षा की जाती है और ना ही उस भूमिका को उस व्यक्ति की भूमिका कहा जाता है। उदाहरणस्वरूप, यदि किसी महाविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग का अध्यक्ष कुछ समय के लिए छुट्टी पर चला जाता है
तो उसी विभाग का कोई वरिष्ठ शिक्षक उस पद का कार्यभार संभालता है तथा उसी के अनुरूप भूमिका निभाता है, परंतु उस भूमिका के निभाने से वह समाजशास्त्र विभाग का अध्यक्ष नहीं हो जाता। बहरहाल हम इसके बावजूद इस बात को नकार नहीं सकते हैं कि जहां प्रस्थिति है वहाँ भूमिका अवश्य होगी तथा इसी प्रकार भूमिका के साथ प्रस्थिति अंतर्संबंधित रहेगी।
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