श्रम विभाजन सिद्धांत का परिणाम - result of division of labor theory
श्रम विभाजन सिद्धांत का परिणाम - result of division of labor theory
दुर्खीम के अनुसार सर्वप्रथम श्रम विभाजन लिंग पर आधारित था। उसके बाद उम्र पर आधारित हुआ इस तरह विभिन्न लिंग एवं विभिन्न उम्र के लोगों को अलग-अलग तरह के कार्य सौंपे गए। ने बताया की श्रम विभाजन ही मुख्य रूप से सामाजिक परिवर्तन का निर्धारण कारक है। दुर्खीम के अनुसार श्रम विभाजन का सिद्धांत सावयव की भांति समाजों पर भी लागू होता है। इसके बारे में यहां तक कहा जा सकता है कि सावयव कार्यों की विशेषता के साथ इसका विकास भी अधिक होता है। श्रम विभाजन का प्रमुख आधार समझौते का संबंध है। कोई भी समझौता या संधि उचित नियंत्रण के अभाव में समाप्त भी की जा सकती हैं। श्रम विभाजन की व्यवस्था को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्तियों पर किसी न किसी प्रकार का नियंत्रण हो। श्रम विभाजन से संबंधित समझौते के लिए दो प्रकार का नियंत्रण काम में लाया जाता है
1. कानूनी नियंत्रण
2. परंपरागत नियंत्रण
कानूनी नियंत्रण समाज या सरकार के द्वारा बनाए गए कानूनों से संबंधित व्यक्तियों के हितों की रक्षा करता है। आधुनिक समाज में श्रम विभाजन से संबंधित समझौतों की रक्षा कानूनी नियम से होती है। परंपरागत नियंत्रण समाज के नैतिक आदर्शों एवं प्राचीन मान्यताओं के द्वारा संधि से संबंधित व्यक्तियों के व्यवहार को नियंत्रित रखता है। पारिवारिक एवं प्राथमिक श्रम विभाजन परंपरागत नियंत्रण पर आधारित रहता है।
दुर्खीम नें अपने सिद्धांत के अंतर्गत श्रम विभाजन के प्रभावों की भी चर्चा की हैं। उन्होंने बताया कि समाज में जो भी प्रगति होती है वह श्रम विभाजन का सकारात्मक कार्य है। और जो समस्या उत्पन्न होती है वह श्रम विभाजन का नकारात्मक कार्य है।
दुर्खीम का कहना है कि श्रम विभाजन के कारण समाज में व्यक्ति अलग-अलग तरह के कार्य करने लगे हैं। इसीलिए अलग-अलग समूह उत्पन्न हुए। श्रम विभाजन के कारण विशेषीकरण में वृद्धि हुई जिससे नए आविष्कारों को प्रोत्साहन मिला, इसके साथ ही समाज में प्रतियोगिता की भावना भी विकसित हुई। इससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता एवं व्यक्तिवादिता में वृद्धि हुई। यही कारण है कि आज का समाज यांत्रिकी समाज से सावयवी समाज में बदल गया तथा समाज के विभिन्न अंगों के बीच संबंध स्थापित हो गए। श्रम विभाजन के कारण व्यक्तिगत स्वतंत्रता में निरंतर वृद्धि हो रही है इससे समाज की आत्मनिर्भरता में भी बदलाव आया है। श्रम विभाजन के कारण समाज में धर्म एवं प्रथाओं का महत्व भी कम होने लगा है तथा सामाजिक नियंत्रण के अनेक औपचारिक साधन उत्पन्न होने लगे हैं। श्रम विभाजन के कारण लोगों के रहन-सहन मनोवृत्तियों आदि में परिवर्तन हुआ है। इस परिवर्तन के कारण ग्रामीण समाज एवं जनजाति समाज, शहरी समाज और औद्योगिक समाज में बदल रहे हैं। दुर्खीम ने इस सिद्धांत में यह भी स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि जब श्रम विभाजन नहीं पाया जाता था, उस समय भी कानून होते थे और इन कानूनो का संबंध कठोर शारीरिक दंड देने से था।
उसका उद्देश्य अपराधी का दमन करना था। लेकिन श्रम विभाजन के कारणों का विस्तार हुआ जिससे कि व्यक्ति के व्यवहारों का नियंत्रण सार्वजनिक कानून द्वारा होने लगा। इस तरह दुर्खीम के अनुसार समाज में जो भी अच्छे या बुरे परिवर्तन हो रहे हैं, उसका मुख्य कारण श्रम विभाजन ही है। इस तरह दुखम कहते हैं श्रम विभाजन एक गतिशील तथ्य है और यह तथ्य जनसंख्या के घनत्व से उत्पन्न सामाजिक संरचना में होने वाले परिवर्तनों का फल है। दुर्खीम श्रम विभाजन को निरंतर विकास की ओर बढ़ने वाली प्रक्रिया मानते हैं।
दुर्खीम ने श्रम विभाजन के निम्नलिखित सामाजिक परिणामों की चर्चा की है
1. श्रम विभाजन के फलस्वरुप समाज में सावयवी एकता या संगठन पनपा। जिससे समाज की विभिन्न इकाइयों के बीच सामाजिक आवश्यकताओं के आधार पर अंतर संबंध और अंतर निर्भरता बनीं।
2. श्रम विभाजन के फलस्वरुप विशेषीकरण हुआ क्योंकि एक व्यक्ति के द्वारा लगातार एक ही प्रकार के कार्य को करते रहने से उस कार्य के संबंध में उत्तरोत्तर ज्ञान की प्राप्ति होती है और वह व्यक्ति उस कार्य का विशेषज्ञ बन जाता है।
3. श्रम विभाजन ने समाज में व्यक्तिवादी भावनाओं को पनपाया। श्रम विभाजन और विशेषीकरण के फलस्वरुप व्यक्तिगत विभिन्नताएं बढ़ी। इसका प्रमुख कारण व्यक्तियों के अलग-अलग कार्य एवं अनुभव रहे।
4. श्रम विभाजन के कारण व्यक्तियों का सामाजिक कल्याण कार्यों में योगदान बढ़ गया।
5. श्रम विभाजन और विशेषीकरण के कारण व्यक्तिगत गुण और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का महत्व भी बढ़ गया।
6. श्रम विभाजन ने समाज को अनेक स्वार्थ समूह तथा व्यवसायिक समूह में भी बांटा।
7. दुर्खीम के अनुसार श्रम विभाजन एक गतिशील धारणा है और इसमें प्रगति के तत्व छिपे हैं। श्रम विभाजन के फलस्वरुप जो विशेषीकरण होता है उससे अविष्कारों की संभावनाएं बढ़ती है और प्रगति के मार्ग खुलते हैं।
8. श्रम विभाजन समाज के विभिन्न सदस्यों और समूहों को एक दूसरे पर निर्भर बना देता है। इस पारस्परिक निर्भरता के कारण व्यक्तिवाद की भावना अपने कटु रूप में नहीं बना पाती है।
9. श्रम विभाजन के कारण प्रत्येक व्यक्ति पर एक नैतिक दबाव होता है कि वह विशेषीकरण के द्वारा अपने व्यक्तित्व का विकास तो करे पर वह इसके साथ ही अपने समाज के प्रति नैतिक कर्तव्यों का भी ध्यान रखें।
10. उपयोगितावादी विद्वानों के अनुसार श्रम विभाजन की प्रमुख उपयोगिता यह है कि इसके द्वारा धन तथा उच्च जीवन स्तर प्राप्त करने की अभिलाषा की पूर्ति के साधन के रूप में इसका प्रयोग किया जाए पर दुर्खीम इस विचार से सहमत नहीं है। उनके अनुसार श्रम विभाजन का एकमात्र उद्देश्य और परिणाम आर्थिक उत्पादन की वृद्धि, अधिक सुख की प्राप्ति या धन की वृद्धि नहीं है।
बार्न्स (Barnes) ने लिखा है कि ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि भौतिक प्रगति और सभ्यता ने मानव को अधिक सुखी बनाया हो।" बल्कि वर्तमान समय में हमें इसका उल्टा ही दिखाई दे रहा है।
सोरोकिन के अनुसार “यदि हम आदिम समाज और आधुनिक समाज की तुलना करते हैं तो स्पष्ट होता है कि आधुनिक समाज की तुलना में आदिम समाज के लोगों में आत्मिक संतोष अधिक था तथा आत्महत्या व मानसिक रोग आदि की संख्या कम थी। जबकि आज की तुलना में प्रगति या सभ्यता का विकास उस समय कहीं कम था। इससे यह सिद्ध होता है कि सभ्यता के विकास के साथ-साथ मानव सुख घटता ही गया है।”
श्रम विभाजन का प्रमुख उद्देश्य पारस्परिक सहयोग और आत्मनिर्भरता उत्पन्न करने तथा उससे सामाजिक एकता को अधिक संगठित करने का प्रयत्न होना चाहिए। जिससे समाज को उसका लाभ मिले और सामाजिक श्रम विभाजन की सार्थकता पूर्ण हो ।
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