आधुनिक पूंजीवाद के निर्माण में धर्म की भूमिका -The Role of Religion in the Formation of Modern capitalism
आधुनिक पूंजीवाद के निर्माण में धर्म की भूमिका -The Role of Religion in the Formation of Modern capitalism
मैक्स वेबर ने धर्म की व्याख्या करने के लिए प्रोटेस्टेंट एथिक्स एंड द स्पिरिट ऑफ कैपिटलिज्म' नामक ग्रंथ का प्रतिपादन किया और इस ग्रंथ के द्वारा उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि आधुनिक पूंजीवाद के निर्माण में प्रोटेस्टेंट धर्म महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। प्रोटेस्टेंट धर्म की आचार पद्धति ने ही आर्थिक क्षेत्र की व्यवस्था को जन्म दिया है और मैक्स वेबर के विचारों की विवेचना करते हुए वीर स्टीड ने लिखा है कि “प्रोटेस्टेंट धर्म में ही कुछ ऐसी चीज है जिसकी सहायता से ऐसी मान्यताओं का जन्म हुआ है जिन्हें हम पूंजीवाद के नाम से जानते हैं और वह प्रोटेस्टेंट धर्म सुधार ही था जिसने प्रत्यक्ष रुप से पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को और प्रोत्साहन किया।" वेबर ने कुछ उदाहरणों के द्वारा यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है।
कि ऐसे देश जहां पर प्रोटेस्टेंट धर्म है अधिक समृद्ध है। इन देशों में अमेरिका, इंग्लैंड और हालैंड प्रमुख हैं इसके विपरीत जहां कैथोलिक धर्म है
वे आर्थिक विकास में पीछे हैं। इस प्रकार मैक्स वेबर ने जर्मनी के नागरिकों का अध्ययन करने के उपरांत यह निष्कर्ष निकाला कि जर्मनी में अधिक धनी व्यक्ति प्रोटेस्टेंट धर्म को मानने वाले हैं। संक्षेप में पूंजीवाद की उत्पत्ति धार्मिक परिस्थितियों के कारण होती है।
धर्म और आर्थिक विकास के बीच के पारस्परिक संबंधों को ज्ञात करने के लिए मैक्स वेबर ने विश्व के छः महान धर्मों कनफ्यूसियस, हिंदू, यहूदी, ईसाई, बौद्ध और इस्लाम का अध्ययन किया और इन धर्मों के अध्ययन में उन्होंने इन धर्म के प्रमुख सिद्धांत तथा उनसे प्रभावित आर्थिक नीतियों की व्याख्या की। मैक्स के वेबर ने अपनी पुस्तक चीन का धर्म कनफ्यूसियस और ताओवाद का विस्तार से उल्लेख किया। इस पुस्तक की एक भाग में मैक्स वेबर ने यह स्पष्ट किया कि प्रोटेस्टेण्ट धर्म तथा कन्फ्यूशियस धर्म की नीतियों में भिन्नता होने के कारण ही पश्चिमी समाजों और चीन में प्रचलित आर्थिक मनोवृति में भिन्नता पाई जाती है। कन्फ्यूशियस धर्म में ईश्वर की नैतिक आवश्यकता तथा मानवीय निर्बलता पाप की चेतना एवं मुक्ति की आवश्यकता, लौकिक जीवन के आचरण, पारलौकिक की जीवन में मिलने वाले पुरस्कार, धार्मिक कर्तव्य तथा सामाजिक-राजनैतिक वास्तविकता आदि के बीच किसी प्रकार का तनाव नहीं मिलता। इस धर्म ने अपने प्रत्येक समर्थक को संसार की वर्तमान रूप में से अनुकूलन करने पर ही बल दिया ना कि किसी विशेष आदेशों के अनुसार स्वयं को परिवर्तित करने पर यह धर्म लोगों को परंपरा और परिपाटी से बंधे रहने पर बल देता है
उन से मुक्त होने पर नहीं। इस धर्म में चीन की परंपरागत व्यवस्था और राजनीतिक व्यवस्था जिस में सम्राट को देवता के समान माना गया था। इस बात पर विशेष बल दिया। इसके विपरीत पश्चिमी समाजों में पारिवारिक संबंधों की तुलना में नैतिक सिद्धांतों के पालन पर अधिक बल दिया गया। आर्थिक दृष्टि से इसका अर्थ यही हुआ कि व्यक्ति की व्यापारिक साख उसकी नैतिक विशेषताओं पर निर्भर रहती है। कन्फ्यूशियस धर्म की आर्थिक और राजनीतिक शिक्षाओं में जन कल्याण की बात को तो बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया था किंतु उसमें ऐसी कोई उचित आर्थिक मनोवृति नहीं थी जो धार्मिक नीतियों के उद्देश्यों को पूरा कर सके इसके विपरित प्रोटेस्टेण्ट धर्म, श्रम और कर्म की नीति जिनसे की पूंजी संचय और आर्थिक विचारों को बढ़ावा दिया जाता है पर विशेष बल दिया गया था और पूंजीवाद के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। प्रोटेस्टेण्ट धर्म की क्षमता तथा कर्म की नीतियां कन्फ्यूशियस धर्म के सौंदर्य संबंधी मूल्यों से पूर्णता अलग थी। इसी कारण पश्चिम की मनोवृत्तियों से स्वायत्तता पूर्ण पूंजीवाद के विकास को प्रोत्साहन मिला जबकि इसकी विपरित मनोवृत्तियों ने चीन में इस प्रकार की पूंजीवाद को विकसित नहीं होने दिया।
वेबर ने दूसरा उदाहरण हिंदू धर्म का लिया है। भारत का धर्म The Religion of Inida' नामक पुस्तक जो वेबर की मृत्यु के बाद प्रकाशित हुई थी। उसमें वेबर ने हिंदू धर्म की उन बातों का उल्लेख किया है। जिसके कारण भारत में पूंजीवाद का विकास नहीं हो सका था। हिंदू धर्म के अध्ययन में मैक्स वेबर का ध्यान उन आरंभिक तथा मनोवैज्ञानिक समस्याओं की ओर रहा जो हिंदुओं के परस्पर विरोधी विचारों में झलकती। थी जिसके कारण भारत अपनी परंपराओं से हटकर एक विकसित अर्थव्यवस्था का निर्माण नहीं कर पाया। मैक्स वेबर ने अपने सिद्धांत में बताया कि हिंदू धर्म वास्तव में एक ब्राम्हण धर्म है। इसकी स्थापना और विकास उन ब्राह्मण राजपुरोहितों, धर्म शास्त्रों तथा विधि व्यक्तियों द्वारा किया गया जो कूटनीति और चमत्कारी कर्मकांडी ज्ञान में प्रवीण थे।
मैक्स वेबर के अनुसार हिंदू धर्म दो प्रमुख सिद्धांतों पर आधारित था। पहला आत्मा के पुनर्जन्म का सिद्धांत और दूसरा कर्म का सिद्धांत। इन सिद्धांतों में यह कहा गया है कि मनुष्य के कर्मों का प्रभाव अगले जन्म में उसके भाग्य पर पड़ता है।
प्रत्येक हिंदू सामाजिक पद और जाति व्यवस्था में बना हुआ है और ब्राह्मणों ने व्यक्ति की मुक्ति का लक्ष्य अपनी जाति के संबंध कर्मों को पूरा करने से ही संभव होना बताया था। धार्मिक नीतियों में स्पष्ट किया गया था कि ब्राह्मण ही मोक्ष का अधिकारी है क्योंकि कोई व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से उतने पुण्य अर्जित नहीं कर सकता। जो कि मुक्ति पाने के लिए श्रेष्ठ है। भारत में ब्राह्मणों ने सफलता के साथ साथ सामाजिक और न्याय संबंधी उच्चता के अधिकारों का दावा किया था। जिससे भारत में नैतिक बहुवाद ने जोर पकड़ा। हिंदू धर्म की न्याय व्यवस्था ब्राह्मणों के पक्ष में थी जो ब्राह्मणों पर अत्याचार को निषेध करती थी तथा ब्राह्मणों के विरुद्ध न्याय को भी अस्वीकार करती थी। “कुल पुरोहित कर्मकांडी प्रश्नों के निर्णय को तथा जीवन की सभी परिस्थितियों में पाप मोचक और सलाहकार के रूप में ब्राह्मणों ने जाति व्यवस्था को विकसित किया तथा इसे प्रभावपूर्ण बना दिया।"
मैक्स वेबर का कहना था कि भारत जैसा धार्मिक पुरोहितों को उचित सम्मान विश्व भर में कहीं नहीं मिला। भारतीय समाज में धर्म पुरोहितों को मिलने वाले उच्च सम्मान की पुष्टि के लिए भ्रांत तर्क और प्रमाण विकसित किए गए।
हिंदू धर्म की नीतियों का प्रमुख उद्देश्य इंद्रियों और आवेगो के संसार से दूर रहना जीवन की दौड़ धूप से व्यक्ति को मुक्ति दिलाना और ईश्वर से एकाकार करना है। हिंदू धर्म के अनुसार ब्राह्मणों ने संसार के दुख पाप और अपूर्णता से ना केवल दूर रहने की बात नहीं कही है बल्कि इस क्षणभंगुर संसार को त्यागने की भी बात कही थी और उनके अनुसार सांसारिक वस्तुओं की आशक्ति और जन्म मरण के चक्र से छुटकारा पा लेना ही वास्तविक मुक्ति है।
इसलिए हिंदू धर्म अलौकिक समस्याओं के प्रति उदासीन रहने तथा कर्मकांड और तपस्या करने पर अधिक बल देता है। इन सभी विशेषताओं के कारण हिंदू एक ऐसी जीवनशैली में फंस गए जिसे लांघकर वह तार्किक संसार में प्रवेश नहीं कर पाया। हिंदू धर्म के इन नीतियों का भारत के आर्थिक जीवन पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ा।
मैक्स वेबर कहते हैं कि “धार्मिक नीतियों से आबद्ध जाति व्यवस्था में भारत के आर्थिक विकास को रोका और जातीय बाधाओं के कम होने पर ही आर्थिक क्रियाओं में तार्किकता की वृद्धि हुई। इस प्रकार वेबर यह मानते हैं कि हिंदू धर्म की यह नीतियां भारत के आर्थिक और भौतिक विकास में बाधक रही हैं। " प्राचीन यहूदी धर्म नामक पुस्तक वेबर की मृत्यु के पश्चात प्रकाशित हुई थी। इस पुस्तक में वेबर ने उन परिस्थितियों का भी उल्लेख किया है जो पश्चिमी समाजों के धर्म में तार्किकता के विकास के लिए उत्तरदाई रही। इस किताब में उल्लेख किया गया है कि यहूदी धर्म ने प्रोटेस्टेण्ट धर्म में एक ऐसी नैतिकता विकसित की जो संसार के स्वरूप में परिवर्तन लाना चाहती थी। जबकि ईसाई धर्म का मठवाद सभी सांसारिक वस्तुओं को त्यागने के पक्ष में था यहूदी धर्म में उस सक्रिय वैराग्य के दर्शन होते हैं।
जिसमें ईश्वरी निर्देशों के अनुसार नीति संबंधी कार्यों पर विचार किया गया है। मैक्स वेबर का कथन है कि प्रोटेस्टेण्ट धर्म का शुद्धचार भी वैराग्य में विश्वास करता है लेकिन जुड़ावाद के समान यह संसार को इस अर्थ में त्यागता है कि मौज उड़ाना और आराम करना ऐसे प्रलोभन है जो नीति के दृष्टिकोण से अर्थहीन हैं तथा मुक्ति के प्रयत्न में बाधक हैं।"
पश्चिम में धर्म की यह नैतिकता प्राचीन यहूदी पैगंबरों से ही प्रारंभ हुई थी। यहूदी पैगंबरों ने संसार की वर्तमान सामाजिक व्यवस्था को भविष्य में स्थापित होने वाली व्यवस्था से बिल्कुल अलग माना था। उनके अनुसार संसार शाश्वत नहीं है वरन् उत्पन्न किया हुआ है। इस तरह जुड़ावाद के अनुसार संसार एक ऐतिहासिक उत्पाद है जिसे ईश्वर के द्वारा एक निर्दिष्ट व्यवस्था की स्थापना के लिए बनाया गया है। मैक्स वेबर का कथन है कि यह नीति आज भी बहुत बड़ी सीमा तक मध्य पूर्व तथा यूरोपीय आचार का एक महत्वपूर्ण आधार है। यहूदियों ने नम्रता तथा आज्ञापालन को मनुष्य का सबसे बड़ा गुण बताया था और स्पष्ट किया था कि अच्छे और बुरे भाग्य की आशाएं एवं पुण्य करने की आवश्यकता निकट भविष्य से ही संबद्ध है। इस तरह जुड़ावाद परंपरागत तंत्र तथा रहस्यमई कल्पनाओं से स्वतंत्र है और एक ऐसे निष्ठावान धर्म को महत्व देता है जो मनुष्य के दैनिक जीवन को ईश्वर के द्वारा बनाए गए नैतिक नियमों से अनिवार्य रूप से बांध देता है। वेबर का विश्वास है कि जुड़ावाद ने नैतिक तर्कवाद के निर्माण में सहायता देकर उन अभिवृत्तियों का विकास किया जो आज पश्चिम में पूंजीवाद के सार के पूर्णता अनुरूप है।
विभिन्न धर्मों के बारे में मैक्स वेबर के उपर्युक्त विचारों से स्पष्ट है कि उनकी रुचि धार्मिक नीतियों का आर्थिक क्रियाओं पर पड़ने वाले प्रभाव को ज्ञात करने में थी। उन्होंने ना केवल धार्मिक नीतियों और आर्थिक क्रियाओं के पारस्परिक संबंधों को स्पष्ट किया बल्कि उन्होंने धार्मिक विचारों के सामाजिक संस्तरण पर पड़ने वाले प्रभाव को भी ज्ञात किया। उन्होंने विश्व के प्रमुख धर्मों का अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला की विभिन्न धर्मों के पैगंबरों प्रचारकों और विद्वानों आदि की एक विशेष जीवनशैली थी और उन्होंने अपनी धार्मिक नीतियों का प्रचार करके सामाजिक संस्तरण तथा आर्थिक क्रियाओं को एक विशेष रूप प्रदान करने का प्रयत्न किया है। संस्कार इतना है कि पारसंस का कहना है कि “धर्म के समाजशास्त्र की व्याख्या में वेबर का महत्वपूर्ण योगदान एक व्यवस्थित पद्धतिशास्त्रीय अंतर्दृष्टि है। जिसके द्वारा उन्होंने विभिन्न कारकों को एक दूसरे से पृथक करके उनके कारण और प्रभाव को एक दूसरे की तुलना में स्पष्ट किया हैं।
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