सामाजिक तथ्यों की व्याख्या के नियम - Rules for the Explanation social Facts
सामाजिक तथ्यों की व्याख्या के नियम - Rules for the Explanation social Facts
दुर्खीम कहते हैं कि जब हम सामाजिक तथ्यों का विश्लेषण करते हैं तब हमें इस विश्लेषण को उन समाजों के साथ जोड़ना चाहिए जिनमें यह सामाजिक तथ्य पाए जाते हैं। समाजशास्त्री तथ्यों का विश्लेषण करते समय घटनाओं जैसे परिवार, जाति, वर्ग आदि का अध्ययन करते हैं। उस समय उनका ध्यान इस बात पर रहता है कि यह समाज के लिए कितने उपयोगी हैं, समाज में इनकी भूमिका क्या है? और इनके साथ समाज के कितने संवेग जुड़े हुए हैं। इस तरह से यह दृष्टिकोण केवल उपयोगितावादी है पर दुर्खीम का कहना है कि जब हम सामाजिक प्रघटनाओं की व्याख्या करते हैं तो हमें इन्हें उत्पन्न करने वाले कारणों और इनके द्वारा किए जाने वाले कार्यों की भी खोज की जानी चाहिए। जब हमारे पास कारण और कार्य दोनों होंगे तब हमारे लिए सामाजिक तथ्यों का विश्लेषण करना निश्चित हो जाएगा
दुर्खीम ने सामाजिक तथ्यों की व्याख्या कैसे की जाए इसके लिए कुछ नियम बताए हैं। दुर्खीम ने अपनी पुस्तक के अध्याय पाँच में सामाजिक तथ्यों की व्याख्या के तीन नियमों को स्पष्ट किया है।
1. जब हमें किसी सामाजिक घटना की व्याख्या करनी हो तो हमें उसे उत्पन्न करने वाले कारणों को तथा उस घटना के द्वारा पूरे किए जाने वाले प्रकार्यों को अलग-अलग खोजना चाहिए।
2. एक सामाजिक तथ्य के निर्धारक कारक को हमें सामाजिक तथ्यों में ही ढूंढना चाहिए न कि व्यक्तिगत चेतना की अवस्थाओं में। साथ ही एक सामाजिक तथ्य का प्रकार्य सर्वदा किसी सामाजिक उद्देश्य के संबंध में ही खोजना चाहिए।
3. किसी भी महत्व की सभी सामाजिक प्रक्रियाओं की प्रथम उत्पत्ति को सामाजिक समूह की आंतरिक संरचना में ही खोजा जाना चाहिए।
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