समाजशास्त्रीय पद्धति के नियम - rules of sociological method
समाजशास्त्रीय पद्धति के नियम - rules of sociological method
समाजशास्त्र को सामाजिक विज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए दुर्खीम ने 1895 में समाजशास्त्रीय पद्धति के नियम (The Rules of Sociological Method) नामक एक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक में उन्होंने यह स्पष्ट किया कि समाजशास्त्र का अध्ययन क्षेत्र व्यक्ति नहीं अपितु समाज है। दुर्खीम की जब यह पुस्तक छप कर आई उस समय समाज विज्ञानों पर काफी बहस हुई। क्योंकि पुस्तक के द्वारा दुर्खीम ने उस समय विधि संबंधित प्रचलित विचारधारा को झकझोर दिया था। इस पुस्तक पर उस समय काफी विवाद भी हुआ था। इसका प्रमुख कारण यह था कि यह पुस्तक उपयोगितावाद का विरोध करती थी और इसका विरोध व्यक्तिवाद से भी था। यह पुस्तक अत्यंत संक्षिप्त रूप में थी। टालकट पारसंस ने एक सिद्धांतवेक्ता होने के तौर पर दुर्खाम की इस रfचना का गहन अध्ययन प्रस्तुत किया था। उस समय की परिस्थितियों से स्पष्ट है कि 19वीं शताब्दी के अंत में समाज विज्ञानों पर उपयोगितावाद का प्रभाव बहुत अधिक दिखाई दे रहा था। अधिकांश अर्थशास्त्री इसका उपयोग कर रहे थे। समाजशास्त्रियों में हरबर्ट स्पेंसर ने भी इसका उपयोग सामाजिक प्रगघटनाओं और सामाजिक वास्तविकताओं के अध्ययन के लिए किया था। दुर्खीम इस उपयोगितावादी अवधारणा के विरोधी थे। इसलिए उन्होंने एक प्रत्यक्षवादी सिद्धांत बनाया जो की उपयोगितावादी प्रत्यक्षवाद के विपरीत था।
पारसंस ने लिखा है कि दुर्खीम की इस पद्धति के दो बड़े आधार हैं पहला उपयोगितावादी व्यक्तिवाद का विरोध और दूसरा दुर्खीम का प्रत्यक्षवादी सिद्धांत। दुर्खीम ने अपनी इस संक्षिप्त रचना में इस तथ्य पर जोर दिया था कि जब हम समाजशास्त्र को एक स्वतंत्र विज्ञान की तरह स्थापित करते हैं तो हमें निश्चित रूप से यह भी तय करना पड़ेगा कि इसकी विधियां कौन सी होंगी? कौन सी आधार सामग्री होगी और कौन से सिद्धांत होंगे? समाजशास्त्री पद्धति के नियम की पहली विशेषता जो दुखम ने बताई है, वह है उपयोगितावाद और व्यक्तिवाद का विरोध दुर्खीम कहते हैं, उपयोगितावादी व्यक्तिवादी अध्ययन विधि प्रत्यक्षवादी है और इसका आधार व्यक्तिवाद है। दुर्खीम का आग्रह है कि व्यक्ति की आवश्यकताएं स्वयं व्यक्ति नहीं पूरा कर सकता है। यह समाज सामाजिक तत्व के द्वारा पूरी की जाती है। इसलिए वे सामाजिक तथ्यों पर केंद्रित विधि को प्रत्यक्षवाद की तरह परिभाषित करते हैं। इस आधार पर हम यह कह सकते हैं कि जहां उपयोगितावाद का केंद्र व्यक्ति है वहां प्रत्यक्षवाद का केंद्र सामाजिक तथ्य है।
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