समाजशास्त्रीय प्रमाणों की स्थापना से संबंधित नियम - Rules Related to Establishing Sociological Proof
समाजशास्त्रीय प्रमाणों की स्थापना से संबंधित नियम - Rules Related to Establishing Sociological Proof
इसे दुर्खीम अप्रत्यक्ष प्रयोग अथवा तुलनात्मक विधि भी कहते हैं। दुर्खीम इसे अप्रत्यक्ष प्रयोगात्मक विधि इसलिए कहते हैं क्योंकि समाजशास्त्री हमेशा सामाजिक घटनाओं पर नियंत्रण नहीं रख सकता। इसी तरह प्रत्येक तुलना तुलनात्मक विधि नहीं है। इसकी घटनाओं एवं परिस्थितियों में थोड़ी बहुत समानता होनी चाहिए। दुर्खीम ने ऐसी तीन परिस्थितियां बताई है जिनकी तुलना की जा सकती है -
1. किसी एक एकांकी समाज की विभिन्न इकाइयों से तुलना
2. एक समान स्तर वाले समाजों की तुलना
3. एक ही घटना की विभिन्न समाजों में तुलना।
निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि दुर्खीम ने समाजशास्त्रीय पद्धति के नियम की तीन विशेषताएं बताई हैं।
1. यह दर्शनशास्त्र से पूर्णतया स्वतंत्र है।
2. यह वस्तुनिष्ठ है।
3. यह पूर्णतया समाजशास्त्रीय है।
सामाजिक तथ्य का सिद्धांत (Theory of Social Fact)
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