समाजशास्त्रीय प्रमाणों की स्थापना से संबंधित नियम - Rules Relative to Establishing Sociological Proofs

 समाजशास्त्रीय प्रमाणों की स्थापना से संबंधित नियम - Rules Relative to Establishing Sociological Proofs


दुर्खीम ने अपनी पुस्तक के अध्याय छः में समाजशास्त्रीय प्रमाणों की स्थापना से संबंधित नियमों को प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार इस कार्य के लिए अनेक विधियों का प्रयोग किया जाता है और यह विधियां इस प्रकार हैं


1. ऐतिहासिक पद्धति (Historical Method)


2. प्रयोगात्मक पद्धति (Experimental Method)


3. तुलनात्मक पद्धति (Comparative Method)


दुर्खीम ऐतिहासिक पद्धति एवं प्रयोगात्मक पद्धति को समाजशास्त्रीय अध्ययन के लिए अनुपयुक्त मानते हैं एवं उनके अनुसार तुलनात्मक पद्धति का प्रयोग करके ही समाजशास्त्रीय प्रमाणों की स्थापना उचित रूप से की जा सकती है।

दुर्खीम का कहना है कि यदि हम कार्य के पीछे के कारणों को प्रमाणित करना चाहते हैं तो इसकी बहुत बड़ी पद्धति तुलनात्मक पद्धति है। इस विधि के द्वारा समानता और विभिन्नताओं को स्पष्ट कर सकते हैं। समाजशास्त्रीय पद्धति का बहुत बड़ा उद्देश्य सामाजिक घटनाओं के पीछे छिपे कारणों की खोज करना है। कोई भी समाजशास्त्री प्रयोगशाला में कार्य नहीं करता है, क्योंकि प्रघटनाएं उसके नियंत्रण से बाहर होती हैं। ऐसी अवस्था में तुलनात्मक पद्धति ही एक ऐसा नियम है जिसके द्वारा हम तथ्यों का विश्लेषण कर सकते हैं दुखम का कहना है कि तुलनात्मक विधि एक विश्वसनीय विधि है, जिससे समाजशास्त्री प्रयोग में ला सकते हैं। दुर्खीम तुलनात्मक विधि को अप्रत्यक्ष रूप से विज्ञान की प्रयोगात्मक विधि मानते हैं। दुर्खीम ने स्वयं लिखा है कि “तुलनात्मक समाजशास्त्र, समाजशास्त्र की एक विशेष शाखा नहीं है बल्कि वह स्वयं समाजशास्त्र है। यह मात्र वर्णनात्मक न होकर तथ्यों की व्याख्या करने की आकांक्षा करता है।”