समाज और प्राणी में समानताएं - Similarities between individual society

 समाज और प्राणी में समानताएं - Similarities between individual society


स्पेंसर का स्वयं से एक प्रश्न था कि क्या सामाजिक वास्तविकता यथार्थ है? स्पेंसर के लिए एक समस्या यह भी थी कि यदि सामाज एक वास्तविक वस्तु है, जिसकी अपनी विशेषता है तो हम इसे क्या कहेंगे कार्बनिक या अकार्बनिक। हरबर्ट स्पेंसर ने इसलिए मशीनी सदृश्यों का प्रयोग किया है जैसे समाज को सामाजिक संग्रह कहना। परंतु इन बातों से भी समाज के संबंध में सामाजक सिद्धांत प्रस्तुत नहीं कर सके थे। इसलिए उन्होंने समाज का सावयवी मॉडल प्रस्तुत किया जो जटिल एवं गत्यात्मक था। इसलिए उन्होंने अपनी पुस्तक प्रिंसिपल ऑफ सोशियोलॉजी (Principle of Sociology) के एक अध्याय का शीर्षक "समाज एक जीव" रखा था। हरबर्ट स्पेंसर ने बताया कि सामाज, कार्बनिक है न कि अकार्बनिक स्पेंसर ने यह अनुभव किया कि समाज रूपी जीव एवं जैविक जीव में समानताएं भी हैं और विभिन्न समानताएँ भी हैं।

इस सादृश्य में शाब्दिक दृष्टि से केवल कार्यात्मक समानताओं का वर्णन होता है परंतु व्यवहार में स्पेंसर ने संरचनात्मक एवं कार्यात्मक समानताएं एवं विभिन्नताओं का उल्लेख किया है। समाज और जीव में पाई जाने वाली विभिन्न समानताएं इस प्रकार हैं।


जड़ पदार्थों से (Different from the Matter)


समाज और प्राणी की समानता को दर्शाने के लिए हरबर्ट स्पेंसर ने दोनों की तुलना जड़ पदार्थों से की है। उनके अनुसार जड़ पदार्थों में कभी वृद्धि नहीं होती परंतु समाज और प्राणी में निरंतर वृद्धि होती रहती है। दोनों में यह भी समानता है कि दोनों का विकास धीरे-धीरे होता है। उदाहरण के लिए जब एक बच्चा जन्म लेता है तो वह धीरे-धीरे बढ़ता है वह बड़ा होकर जीवन पथ पर आगे चलता है। इसी तरह जनसंख्या की वृद्धि के साथ-साथ समाज का आकार भी धीरे-धीरे बढ़ता जाता है। स्पेंसर ने वृद्धि का उदाहरण देकर समझाया की जड़ पदार्थ अनेक शताब्दियों के बाद भी उसी प्रकार रह जाते हैं जैसा कि पहले थे किंतु समाज और शरीर में देखते ही देखते परिवर्तन स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगते है।

समाज और शरीर छोटे से बड़े हो जाते हैं किंतु जड़ पदार्थ उतने के उतने ही बने रहते हैं।


 परिणाम की वृद्धि के साथ रचना में विषमता


समाज एवं प्राणी की दूसरी समानता को निर्धारित करने के लिए दोनों के परिमाण वृद्धि को आधार माना गया है। हरबर्ट स्पेंसर का कहना है कि ज्योज्यों समाज एवं शरीर के परिमाण में वृद्धि होती है, त्यों त्यों उसकी रचना में परिवर्तन होने लगता है। रचना क्रमशः जटिल होती जाती है। विकास क्रम के प्रथम स्तर पर जीवन मात्र एक जीव (कोस्ट ( के रूप में होता है। उसका केवल एक शारीरिक ढांचा होता है जो साधारण रहता है पर ज्यों-ज्यों विकास होता है उसके अंगों में वृद्धि होती जाती है और शरीर रचना में जटिलता आ जाती है। जैसे पहले शिशु छोटा होता है फिर वह किशोर होता है, फिर वयस्क होने पर उसका शरीर पूर्णतया विकसित हो जाता है। यह आकार बढ़ने का क्रम है। यही तथ्य समाज के ढांचे पर भी लागू होता है।

प्रारंभ में समाज का स्वरूप सीमित एवं संरचना सरल होती है। गांव, कस्बा बन जाता है। शहर नगर हो जाता है और नगर महानगर का आकार ले लेता है। एक छोटा राज्य साम्राज्य बन जाता है। परिवार जाति में परिवर्तित हो जाती है और जाति एक सांस्कृतिक समूह बन जाती है। इस भांति मनुष्य की देह संरचना और समाज की संरचना दोनों के आकार में वृद्धि होती है और समाज में भी विकास के साथ-साथ नए सामाजिक संबंधों सामाजिक संगठनों एवं सामाजिक संस्थाओं का जन्म होता है। फलस्वरुप सामाजिक ढांचे की जटिलता में भी वृद्धि होती है।


रचना और कार्य में विषमता


समाज एवं प्राणी में तीसरी समानता यह है कि दोनों में विकास के साथ-साथ उसकी संरचना में भी जटिलता आती है। समाज की संरचना बदलने से उसके अंग अर्थात समुदायों एवं समूहों के कार्य बदल जाते हैं। अधिक विशेषीकृत हो जाते हैं।

यह तथ्य प्राणी शरीर पर भी लागू होता है। प्राणी शरीर की रचना भिन्न होने पर, शरीर के विकसित हो जाने पर कार्य भी भिन्न हो जाते हैं। उदाहरण के लिए जब एक बच्चा छोटा होता है तो वह केवल सरल एवं छोटे-मोटे कार्य ही कर पाता है, जबकि बड़ा होने पर उसकी कार्य क्षमता में वृद्धि होती है और वह जटिल कार्य भी करने लगता है। ठीक यही बात समाज पर भी लागू होती है। यदि हम नगरीय एवं ग्रामीण समाज की तुलना करें तो पाते हैं कि शहर आदि अन्य जटिल समाज का कार्य ग्रामीण समाजों के कार्यों से जटिल होता है।


कार्यों की विषमता के साथ आपसी समन्वय


समाज तथा प्राणी दोनों में विकास के साथ-साथ अंगों में विषमता पैदा होती है परंतु इस विषमता के होते हुए भी विभिन्न अंगों के कार्यों में समन्वय रहता है। दोनों का प्रत्येक भाग या अंग दूसरे भाग के कार्य में


सहायक होता है विरोधी नहीं। शरीर की रचना तथा उसके कार्य में विकास से जो विषमता की प्रक्रिया विकसित होती है, उसमें विषमता ही नहीं होती बल्कि समन्वय भी होता है। इसी तरह समाज रूपी सावयवी के घटक व्यक्ति, परिवार, समुदाय ये सभी सामाजिक विकास की प्रक्रिया में पैदा होते हैं। इनके विभिन्न कार्यों के बीच समन्वय रहता है और यह समाज के सामूहिक कार्य में सहायक होते हैं। हरबर्ट स्पेंसर का कहना है कि यह तथ्य समाज एवं प्राणी पर समान रूप से लागू होता है अतः समाज और प्राणी में विषमता एवं समन्वय है। 


अवयवों के नष्ट होने से सावयव की मृत्यु नहीं होती


माजस अवयवी है और प्राणी भी अवयवी है। दोनों की समानता दर्शाने के लिए स्पेंसर कहते हैं कि समाज और प्राणी के अवयव नष्ट हो जाने से वे स्वयं नष्ट नहीं होते। उदाहरण के लिए शरीर के किसी एक अंग के नष्ट होने पर शरीर नष्ट नहीं होता है। यदि किसी व्यक्ति के एक हाथ को शरीर से अलग कर दिया जाए तो वह नष्ट नहीं होता लेकिन वह हाथ अस्तित्वहीन हो जाता है। इसी तरह समाज में व्यक्तियों तथा परिवारों और कभी-कभी समुदायों के नष्ट हो जाने पर भी समाज ज्यों का त्यों बना रहता है। दोनों की प्रक्रिया एवं प्रणाली समान है।


समाज एवं शरीर के ढांचे में एक और अन्य समानता भी है। हरबर्ट स्पेंसर का कहना है कि जिस प्रकार शरीर की व्यवस्था बनाए रखने के लिए विभिन्न संस्थान जैसे नाड़ी संस्थान, स्नायु संस्थान आदि अपना-अपना कार्य करते हैं उसी प्रकार समाज में व्यवस्था बनाए रखने के लिए समाज की विभिन्न संस्थाएं अपना अपना कार्य करती हैं। जैसे उत्पादन, वितरण, शिक्षा यातायात आदि की व्यवस्था के लिए विभिन्न संस्थान कार्यरत हैं।


स्पेंसर ने कुछ उदाहरण के द्वारा समाज और शरीर की प्रक्रियाओं की तुलना की है


1. जिस प्रकार शरीर में आमाशय होता है, जिससे भोजन की पहचाना होती है, ठीक उसी प्रकार समाज का भी आमाशय होता है। जिससे समाज का भोजन पचता है। स्पेंसर ने उपभोग (Consumption) को समाज का आमाशय माना है।


2. जिस प्रकार शरीर में रक्त संचालन संस्थान है, जो रक्त को सारे शरीर में पहुंचाता है। उसी प्रकार समाज में भी रक्त संचालन संस्थान है। इसे स्पेंसर ने उत्पादन (Production) का नाम दिया है। 


3. जिस प्रकार मस्तिष्क के द्वारा शरीर पर नियंत्रण बना रहता है। ठीक उसी प्रकार सरकार और कानून के द्वारा समाज नियंत्रित रहता है।


4. जिस प्रकार शरीर के अंगों के कार्य अलग-अलग होते हैं जैसे- आंख, कान, हाथ-पैर आदि का काम एक दूसरे से अलग है ठीक उसी प्रकार समाज के अंगों के काम भी अलग-अलग है। जैसे परिवार, धर्म, राज्य आदि के कार्य एक दूसरे से भिन्न है।