समाजशास्त्र की विषय-वस्तु में सामाजिक तथ्य मुख्यतः दो प्रकार से हैं - Social facts are mainly of two types in the subject matter of sociology.
समाजशास्त्र की विषय-वस्तु में सामाजिक तथ्य मुख्यतः दो प्रकार से हैं - Social facts are mainly of two types in the subject matter of sociology.
1. वह जो समाज के मान्य स्तरों के अनुरूप होते हैं।
2. दूसरा वह जो इनसे भिन्न होते हैं।
दुर्खीम ने इन्हीं को दो भागों में बांटा है
1. सामान्य प्रघटनाएं
2. व्याधिकीय घटनाएं
दुर्खीम का कहना है कि एक विज्ञान में वह पूरी क्षमता होनी चाहिए कि ऐसे नियमों का प्रतिपादन करें जिसके आधार पर सामान्य एवं व्याधकीय तथ्यों के बीच के अंतर को स्पष्ट किया जा सके। दुर्खीम का यह भी कहना है कि सामान्य एवं व्याधकीय तथ्यों में भेद करने के नियमों को निर्धारण करने में अनेक कठिनाइयां उत्पन्न होती है। मूल रूप में कुछ व्यवहारिक कठिनाइयां ऐसी हैं, जिनके आधार पर हम सामान्य एवं व्याधकीय के तथ्यों में अंतर नहीं कर पा रहे हैं।
दुर्खीम ने सामान्य और व्याधिकीय तथ्यों में भेद करने के लिए प्रमुख रूप से 3 नियम प्रस्तुत किए हैं।
व्यापकता
दुर्खीम के अनुसार दोनों नियमों में अंतर करने का सबसे पहला नियम साधारणता या व्यापकता है। साधारणता उसे कहा जाता है जब कोई विशेषता या तथ्य समूह के अधिकांश व्यक्तियों में पाया जाता है। दुर्खीम व्यापकता को एक वैज्ञानिक मापदंड के रूप में प्रस्तुत करते हैं। सामाजिक तथ्य समाज में अधिकता से पाए जाते हैं और उनमें अपेक्षाकृत कम परिवर्तन होते हैं। दुर्खीम के अनुसार जो तथ्य समाज में अधिकता से पाए जाते हैं, वही सामान्य तथ्य कहे जा सकते हैं। दुर्खीम के ही शब्दों में हम उन सामाजिक दशाओं को सामान्य कहेंगे जो सर्वाधिक व्यापक हैं।" व्यापकता का गुण सामाजिक तथ्य को उपयोगी एवं लाभदायक बना देता है। किसी भी तथ्य की अधिक आवृत्ति उसके महत्व को भी प्रकट करती है। दुर्खीम का मत है कि स्वस्थ एवं व्याधिकीय का कोई भी मापदंड निरपेक्ष तथा सार्वजनिक रूप से सभी समाजों पर लागू नहीं होता। क्योंकि जो चीज जंगली मनुष्य के लिए सामान्य है वह सब मनुष्य के लिए सामान्य नहीं हो सकती। इसलिए दुर्खीम सामाजिक तथ्य को निरपेक्ष न मानकर उसे विशिष्ट समाजों के साथ समाज के विकास के विशिष्ट स्तर एवं युग के साथ सापेक्ष मानते हैं। इस तरह व्यापकता समय व स्थान सापेक्ष तथ्य भी है। एक विशेष व्यवहार एक समय और स्थान में उचित माना जाता है। जबकि वही व्यवहार दूसरे समय और स्थान पर अनुचित माना जा सकता है। इस तरह सामाजिक तथ्य अधिक व्यापक होते हैं और समय स्थान और समाज की दृष्टि से सापेक्ष होते हैं।
उपयोगिता (Utility)
सामान्य एवं व्याधिकीय तथ्यों में दूसरा अंतर उपयोगिता का है। कोई भी समाज उन तथ्यों को स्वीकार नहीं करता जो समाज के लिए हानिकारक हो। सामान्य तथ्य हमेशा समाज के लिए उपयोगी और लाभदायक होते हैं। जो सामान्य तथ्य जितना अधिक व्यापक होता है उतना ही अधिक उपयोगी होता है। व्यापकता और उपयोगिता दोनों ही सामान्य तथ्य के लक्षण हैं। जो सामान्यतः साथ-साथ मिलते हैं ऐसा होना कोई वैज्ञानिक नियम नहीं हैं। दुर्खीम कहते हैं कि तथ्यों की व्यापकता उसकी उपयोगिता को स्पष्ट करती है। किंतु यह आवश्यक नहीं है कि सामान्य तथ्य अनिवार्य रूप से उपयोगी ही हो।
घटनाक्रम का नियम (Law of Course of Events )
सामान्य एवं व्याधिकीय तथ्यों के बीच में भेद करने का तीसरा नियम है कि हम पूर्व में घटी हुई घटनाओं के निष्कर्षों के आधार पर सामान्य तथ्यों की पुष्टि करें। हमें यह ज्ञात करना चाहिए कि क्या अतीत में उस तथ्य को सामान्य माना गया था। यदि माना गया था तो उसके पीछे क्या कारण थे। हमें भूतकाल में घटी किसी भी घटना के लिए उत्तरदाई दशाओं की खोज करनी चाहिए। यह समझना चाहिए कि क्या वे दशाएं वर्तमान में भी विद्यमान हैं। यदि हैं तो उस तथ्य को सामान्य समझना चाहिए और यदि बदल गई है तो वह तथ्य व्याधिकीय हो सकता है।सामान्य और व्याधिकीय तथ्यों में भेद करने के नियम ( Rules for Distinguishing between the Normal and the Pathological)
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