सामाजिक तथ्यों को वस्तुओं की तरह देखना चाहिए - Social facts should be treated as objects
सामाजिक तथ्यों को वस्तुओं की तरह देखना चाहिए - Social facts should be treated as objects
सामाजिक तथ्यों के अवलोकन के विषय में दुर्खीम ने लिखा है, यह पहला और सबसे अधिक मौलिक नियम हैं। सामाजिक तथ्यों पर वस्तुओं के रूप में विचार किया जाए। सामाजिक तथ्यों को वस्तु माना जाए, दुर्भाग्य से जैसा कि रॉबर्ट बियरसटिड कहते हैं “अभी तक अर्थात दुर्खीम के समय तक समाजशास्त्र वस्तु की अपेक्षा अवधारणाओं से ही संबंधित रहा है।” सामाजिक तथ्यों के बारे में दुर्खीम का स्पष्ट मत है कि सामाजिक तथ्यों को एक विचार या अवधारणा न मानकर एक ऐसी चीज या वस्तु के रूप में देखा जाए जिसे बाहरी तौर पर देखा जा सके और जिसका अस्तित्व मनुष्य पर निर्भर न हो। दुर्खीम ने लिखा है कि ज्ञान के वे सभी विषय-वस्तु जो केवल मानसिक क्रियाओं द्वारा नहीं जाने जा सकते बल्कि उनके जानने के लिए हमें अवलोकन और प्रयोग के द्वारा मस्तिष्क के बाहर से आंकड़ों को प्राप्त करने होंगे।
इस प्रकार दुखम कहते हैं कि “सामाजिक प्रघटना वस्तुएं हैं तथा उन्हें वस्तुओं के रूप में ही स्वीकार किया जाना चाहिए।”
दुर्खीम ने तथ्यों के अवलोकन के विवेचन में इस बात पर अधिक बल दिया है कि हम किन आधारों पर पहचाने की अमुक घटनाएं सामाजिक तथ्य हैं सामाजिक तथ्यों की घटना की तरह पहचान करने के लिए उन्होंने 6 लक्षण बताएं हैं
1. सामान्य विज्ञान तथ्य की पहचान करते हैं।
2. तथ्य का एक निश्चित अर्थ होता है।
3. जिस किसी वस्तु का हम अध्ययन करते हैं, उसे वस्तु मानकर चलना चाहिए।
4. सामाजिक तथ्य आधार सामग्री है।
5. सामाजिक तयों का अध्ययन वस्तुनिष्ठ विधियों द्वारा करना चाहिए।
6. सामाजिक तथ्य किसी सामान्य इच्छा से बदले नहीं जा सकते।
सामान्य विज्ञान तथ्य की पहचान करते हैं
विज्ञान में चाहे वह प्राकृतिक हो या सामाजिक हमारा उद्देश्य सर्वप्रथम अपने अध्ययन की घटनाओं की पहचान करना होता है। उदाहरण के तौर पर रसायनशास्त्र पहचान करके पेट्रोलियम को अपने अध्ययन का तथ्य मानता है। ठीक इसी तरह समाज विज्ञान और समाजशास्त्र को भी सामाजिक तथ्यों की पहले पहचान निश्चित करनी चाहिए हर विज्ञान की परंपरा है। समाजशास्त्र भी इसका अपवाद नहीं है।
तथ्य का एक निश्चित अर्थ होता है
जब तक तथ्य के बारे में या उसके अर्थ के बारे में एक सामान्य सहमति नहीं बनती है। तब तक हम आगे नहीं बढ़ सकते जो कुछ भी तथ्य का अर्थ लिया जाता है वह स्पष्ट होना चाहिए। आवश्यक है कि तथ्य का सही तरह से अवलोकन किया जाए तथ्य का अर्थ कभी भी बाहर से थोपा हुआ नहीं होना चाहिए। तथ्य का अर्थ वही होना चाहिए जो उस घटना में अंतर्निहित है।
जिस किसी वस्तु का हम अध्ययन करते हैं उसे वस्तु मानकर चलना चाहिए
किसी भी सामाजिक प्रघटना का अध्ययन करते समय हमें यह निश्चित करना चाहिए कि क्या हम उसका अध्ययन एक वस्तु की तरह कर सकते हैं या नहीं। इस तरह दुर्खीम सामाजिक घटना के पहचान का एक आधार देते हैं। उदाहरण के लिए मनुष्य में संवेदनाएं होती हैं, मनोभाव होते हैं और हम उन्हें सामाजिक तथ्य मानते हैं। हम इसका अध्ययन करते हैं, तो हमें इसको एक वस्तु के रूप में देखना चाहिए। जब हम इनको एक वस्तु के रूप में देखेंगे तभी उसे सामाजिक तथ्य का दर्जा प्राप्त हो सकता है।
सामाजिक तथ्य आधार सामग्री है
दुर्खीम सामाजिक तथ्यों की एक और पहचान बताते हुए कहा है कि समाज की छवि उसकी मनोवृति और उसका स्वभाव सामाजिक तथ्यों में निहित होता है। इसलिए यदि समाज की कोई विश्वसनीय आधार सामग्री है तो वह सामाजिक तथ्य है।
सामाजिक तथ्यों का अध्ययन वस्तुनिष्ठ विधि द्वारा करना चाहिए
दुर्खीम का कहना है कि अनुसंधानकर्ता को सामाजिक तथ्यों की पहचान करने के लिए अपने बुद्धिमानी का प्रयोग करना चाहिए। बुद्धिमानी यह है कि जिन्हें हम सामाजिक तथ्य कहते हैं, क्या उन तथ्यों का वस्तुओं की तरह वस्तुनिष्ठ अध्ययन किया जा सकता है? क्योंकि दुर्खीम का कहना है कि यदि जब तक हम सामाजिक तथ्यों को वस्तु मानकर नहीं चलते तब तक उनका वस्तुनिष्ठ अध्ययन संभव नहीं है।
सामाजिक तथ्य किसी सामान्य इच्छा से बदले नहीं जा सकते
सामाजिक तथ्यों में दृढ़ता होती है, वह जमीन से जुड़े होते हैं। इसलिए उनमें एकाएक परिवर्तन मुश्किल होता है। जैसे हमारे समाज में अनेकों तीज त्यौहार, प्रथाएं और परंपराएं हैं और उनकी अनेक मान्यताएं हैं। उन्हें हम चाहने पर भी नहीं छोड़ सकते हैं। सामाजिक तथ्य इनके समान ही जन-जीवन में अपनी पहचान रखते हैं। छोटे-मोटे आंदोलन भी सामाजिक तथ्यों को नहीं बदल पाते हैं। जब तक की इसे बदलने के लिए या इसे स्वीकार करने के लिए जनमानस तैयार न हो। दुखम कहते हैं कि सामाजिक तथ्य जमीन से जुड़ा होता है इसलिए इसकी जड़े हिलाना सामान्य बात नहीं है। दूसरे शब्दों में सामाजिक तथ्य लगभग निरंतर और स्थाई होता है।
सभी पूर्वाग्रहों का उन्मूलन करना चाहिए
दुर्खीम का कथन है कि यदि हम सामाजिक तथ्यों को वस्तु मानते हैं। वस्तुओं के समान ही उनका अवलोकन करना चाहते हैं तो हमें सारे पूर्वाग्रहों को समाप्त कर देना चाहिए। क्योंकि वस्तुनिष्ठता की यही पहली शर्त है। हमें उन सभी पूर्व अवधारणाओं की उपेक्षा करना चाहिए जिनका उद्गम विज्ञान से बाहर हुआ है। दुर्खीम के अनुसार समाजशास्त्री को या तो अनुसंधान के उद्देश्यों का निर्धारण करते समय अथवा वर्णन के करते समय उन अवधारणाओं का जो विज्ञान से अलग पूर्णतः अवैज्ञानिक आवश्यकता के लिए उत्पन्न हुई है का परित्याग करना चाहिए। दुर्खीम का कथन है कि तथ्यों के अध्ययन का दूसरा नियम यह है कि जिन सामाजिक तथ्यों का हम अध्ययन करते हैं उन्हें पहले परिभाषित करना चाहिए और यदि वह पूर्वाग्रह या केवल मिथक हैं तो हमें उन्हें छोड़ देना चाहिए। हमारे लिए तो सामाजिक तथ्य केवल वे ही हैं जिनका वैज्ञानिक कसौटी पर अध्ययन किया जा सकता है।
अध्ययन की विषय सामग्री को परिभाषित करना
एक समाजशास्त्री के लिए यह आवश्यक है कि वह जिस विषय सामग्री का अध्ययन करता हैं। उसे उस सामग्री को स्पष्ट रूप से परिभाषित करना चाहिए। अनुसंधानकर्ता जिन घटनाओ व सामग्री का अध्ययन कर रहा है, उसकी अवधारणाओं का सामाजिक तथ्य के संदर्भ में अर्थ स्पष्ट कर देना चाहिए। दुर्खीम के अनुसार “समाजशास्त्रीय अध्ययन की विषय-सामग्री में कतिपय सामान्य बाह्य विशेषताओं द्वारा पूर्व परिभाषित घटनाओं का समूह होना चाहिए और इस प्रकार सभी परिभाषित घटनाएं इस समूह में शामिल की जानी चाहिए।”
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