सामाजिक कार्य - Social Functions
सामाजिक कार्य - Social Functions
1. प्रस्थिती निश्चित करना (To Determine Status )- प्रत्येक परिवार की समाज में एक निश्चित प्रस्थिति होती है और इस प्रस्थिति के अनुसार ही व्यक्ति की समाज में स्थिति होती है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी प्रस्थिति के अनुसार कार्य करना होता है। परिवार ही भोजन, वैवाहिक एवं जीविकोपार्जन संबंधी निर्णय लेता है। एक साधारण परिवार में जन्म लेने वाले व्यक्ति की सामाजिक प्रस्थिति एवं भूमिका उस व्यक्ति से भिन्न होगी जो निम्न स्तर वाले परिवार में जन्म लेगा।
2. समाजीकरण (Socialization)- यह हर व्यक्ति का समाजिककरण करने वाली सर्वाधिक महत्व वाली संस्था है। परिवार में सदस्यों में पारस्परिक घनिष्ठ और स्थाई संबंध पाए जाते हैं।
व्यक्ति इन ही परिवारों में रहता हुआ प्रेम, ज्ञान, अनुभव, संस्कार, समाज के मानदंड इत्यादि सीखता है जो इसके समाजीकरण और व्यक्तित्व के विकास में अपूर्व योग देता है।परिवार ही बालक को जैविकीय प्राणी से सामाजिक प्राणी बनाता है। सदरलैंड तथा एडवर्ड ने परिवार की ही समाजीकरण की सबसे अधिक महत्वपूर्ण समिति माना है।
3. मानव सभ्यता को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाना (Perpetuation of Human Achievement from One Generation to another)- मानव सभ्यता का इतिहास बहुत पुराना है। सदियों से मानव जो कुछ सीखता एवं अनुभव प्राप्त करता आ रहा है वह सब कुछ परिवार और बच्चों को सिखा देता है। इस प्रकार आने वाली सभी पीढ़ियां पूर्वजों से प्राप्त संस्कारों को आगे आने वाली पीढ़ियों में देती हैं। इस प्रकार मानव सभ्यता एवं संस्कृति पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरित होती रहती हैं जिससे समाज विकास में योगदान मिलता है।
4. सामाजिक नियंत्रण (Social Control) - प्राथमिक समूह के रूप में परिवार सामाजिक नियंत्रण का मुख्य साधन है। परिवार के सदस्यों का पर नियंत्रण रहता है। बड़ों की आज्ञा का पालन करना, छोटो को प्रेम व सुरक्षा प्रदान करना परिवार के सदस्य अपना कर्तव्य समझते हैं।परिवार अपने सदस्यों में सद्गुण एवं नागरिकता का गुण भरता है जिसका प्रभाव सामाजिक क्षेत्र पर भी पड़ता है और नियंत्रण में इससे सार्थक मदद भी मिलती है।
5. शिक्षात्मक कार्य ( Educational Functions)- बच्चों की आरंभिक शिक्षा परिवार में ही होती है जिसका बालक पर गहरा प्रभाव पड़ता है। परिवार बालक के चरित्र निर्माण सामाजिक जीवन को सीखने का अतुलनीय स्रोत है। परिवार में बच्चा अनुकरण के द्वारा जो कुछ सीखता है
उसी आधार पर उसका जीवन बनता है तथा परिवार में ही इसमें आत्म त्याग कर्तव्यपूर्ति, आज्ञा पालन, सहयोग, सामंजस्य आदि सामाजिक गुणों का विकास होता है।
6. मनोरंजनात्मक कार्य ( Recreational Functions)- परिवार अपने सदस्यों का मनोरंजन भी करता है यद्यपि सिनेमा, क्लब इस कार्य को छिनते जा रहे हैं फिर भी भारत जैसे देश में करोड़ों लोग व्यवसायिक मनोरंजन के इन साधनों का लाभ नहीं उठा पाते। ऐसी दशा में इनका मनोरंजन घर में ही होता है। परिवार बिना पैसे के ही स्वास्थ्य मनोरंजन की व्यवस्था करता है।
7. धार्मिक कार्य (Religious Functions)- परिवार धार्मिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा का केंद्र हैं। यहां सदस्यों को धार्मिक उत्सव में भाग लेने से धार्मिक नियमों तथा विधियों और पाप पुण्य के भेद अपनेआप होता है।
इस प्रकार यह धार्मिक संस्कार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को स्थानांतरित होते हैं जिससे इनका स्थायित्व समाज में बना रहता है।
परिवार के उपर्युक्त कार्यों से स्पष्ट है कि यह अत्यंत महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था है। परिवार बालक के समाजीकरण की एक अपूर्व समिति है। जन्म के बाद बालक परिवार में अपने माता-पिता एवं अन्य सदस्यों के साथ रहता है, संचार करता हुआ व्यवहार प्रतिमान और आचरण संहिता से परिचित होता है और विभिन्न सदस्यों के साथ अन्तः क्रिया के आधार पर बालक के व्यक्तित्व का निर्माण होता है। मनोवैज्ञानिकों कि यह मान्यता है कि अपने व्यक्तित्व और चरित्र संबंधी सभी लक्षण अपने आरंभिक 5 वर्षों में प्राप्त कर लेता है और काल में वह परिवार में ही रहता है। इससे स्पष्ट है कि पारिवारिक पर्यावरण का बालक पर कितना गहरा मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रभाव पड़ता है।
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