सामाजिक समूह की विशेषताएं - social group characteristics
सामाजिक समूह की विशेषताएं - social group characteristics
1. सामाजिक समूह के निर्माण हेतु कम से कम दो अथवा दो से अधिक व्यक्तियों का होना आवाश्यक है। यद्यपी समूह में सदस्यों की अधिकतम संख्या निश्चित नहीं है। इसको स्पष्ट करने के लिए सिमेल ने में अकेले व्यक्ति को एकल (Monard) दो व्यक्तियों से मिलकर बनने वाले समूह को द्विक (Diard), जैसे पति-पत्नी, माँ-बेटा आदि तथा तीन व्यक्तियों से मिलकर बनने वाले समूह को त्रिक (Triad) कहा है। जैसे पति-पत्नी तथा बच्चा।
2. समूह के सभी सदस्यों का एक निश्चित उद्देश्य है क्योंकि सामान्य हितों के अभाव में समूह के सभी सदस्य एक-दूसरे के साथ नहीं रह सकते।
3. समूह के अंतर्गत सदस्यों के मध्य विचारों तथा क्रियाओं आदि का आदान-प्रदान मिलता है क्योंकि जब तक समूह के सदस्यों के मध्य सामाजिक सतः क्रिया नहीं होती तब तक उनमे स्थायी संबंध विकसित नहीं होते तथा संबंधों के अभाव में उस समग्र को सामाजिक संबंध नहीं कहा जा सकता।
4. समूह के सदस्यों में पारस्परिकता की भावना का होना आवश्यक है क्योंकि तभी वे एक-दूसरे से नियमित अंतःक्रिया करने में सक्षम हो पाते हैं किन्तु इस पारस्परिकता की भावना के विकास हेतु किसी समूह के सदस्यों की जीवन मूल्यों में समानता का होना आवश्यक है।
5. सामाजिक समूह सापेक्षिक रूप से व्यक्तियों के अन्य समग्र की तुलना में अधिक स्थायी होता है क्योंकि किसी समूहों के सदस्यों के मध्य ठोस सामाजिक संबंध मिलते हैं।
6. 'सामाजिक पहचान' समूह की एक अन्य आवश्यक विशेषता है। इस विशेषता को सर्वप्रथम मर्टन ने प्रस्तुत किया। उनका मानना है कि यह आवश्यक नहीं है कि किसी समूह के सभी सदस्य एक-दूसरे को भली-भांति पहचानते हों। जैसे बड़े सामाजिक संगठन में यह बहुत मुश्किल है। अतः समूह की सदस्यता हेतु महत्वपूर्ण यह है कि समूह के बाहर के लोग किसी व्यक्ति को किस रूप में जानते अथवा पहचानते हैं। प्रत्येक समूह में सदस्यों के व्यवहार के निर्धारण अथवा उसमे एकरूपता लेन हेतु कुछ नियमों और कानूनों की व्यवस्था होती है। जैसे औपचारिक समूह में अधिकांश नियम कानून लिखित तथा अनौपचारिक समूहों में अलिखित जो कि प्रथाओं और रीती-रिवाजों के रूप में होते हैं, मिलते हैं।
7. किसी समूह का सदस्य होना व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर करता है, अर्थात समूह की सदस्यता ऐच्छिक होती है, जिसमे कोई व्यक्ति अपने हितों को ध्यान में रखकर किसी समूह की सदस्यता स्वीकार अथवा अस्वीकार करता है। यद्यपी प्राथमिक समूह ऐसे होते हैं। जैसे परिवार, नातेदारी इत्यादि जिनकी - सदस्यता सामान्यतः न तो हम सरलता से प्राप्त कर सकते हैं और न ही छोड़ सकते हैं।
8. प्रत्येक समूह की एक सामाजिक संरचना' होती है क्योंकि प्रत्येक समूह की संरचना में कोई न कोई एक निश्चित स्थान होता है उसकी परिस्थिति को सूचित करता है। ये सभी प्रस्थिति अपने भूमिका के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़कर समूह की संरचना का निर्माण करती है। चूँकि संरचना विभिन्न प्रस्थितियों के मध्य सम्बन्धों पर आधारित होता है। अतः यह स्वयं में अमूर्त होती है।
9. प्रत्येक समूह में स्थायित्व की प्राप्ति हेतु स्तरीकरण के माध्यम से ही विभिन्न प्रस्थितियों को एक क्रम में नियोजित कर उनके अधिकार तथा कर्तव्यों का निर्धारण संभव हो पाता है जिससे समूह अंतःक्रिया की व्यवस्था विकसित हो पाती है जो कि समूह के स्थायित्व के लिए आवश्यक है।
वार्तालाप में शामिल हों