सामाजिक समूह का वर्गीकरण - social group classification

 सामाजिक समूह का वर्गीकरण - social group classification


विभिन्न विचारकों ने अलग-अलग आधारों को स्वीकार कर सामाजिक समूहों को अनेक रूपों में वर्गीकृत किया है, जिनमें प्रमुख वर्गीकरण एवं उनके आधार निम्न हैं: अथवा उसके आकर


1. सिमेल : इन्होनें समूह का वर्गीकरण उसको निर्मित करने वाले सदस्यों की संख्या के आधार पर प्रस्तुत किया जो कि निम्न है:


2. मोनार्ड (एकल) : अकेले व्यक्ति को सिमेल ने 'मोनार्ड' कहा तथा इसे समूह स्वीकार नही किया क्योंकि समूह निर्माण हेतु दो व्यक्तियों का होना आवश्यक है।


3. डायार्ड (द्विक) : दो व्यक्तियों से मिलकर बनने वाले समूह को 'द्विक' कहा तथा इसे समूह का मूल स्वरुप किया। जैसे पति-पत्नी, माँ-बाप आदि।


4. ट्रीयार्ड (त्रिक) : तीन व्यक्तियों से बने समूह को सिमेल ने 'त्रिक' कहा। उन्होंने समूह के इस स्वरुप को सबसे स्थायी माना, क्योंकि तीसरा व्यक्ति दो व्यक्तियों के मध्य सम्बन्धों को और गहनता प्रदान करता है। जैसे पति-पत्नी और बच्चा।


2. कूले: इन्होनें आत्मीयता की गहनता तथा समूह की संरचना की प्रकृति को आधार ३ भागों में विभाजित किया। यह वर्गीकरण उन्होंने अपनी पुस्तक 'Social Organisation' में 1909 में प्रस्तुत किया।


I. आत्मीय युगल समूह (Intimate Pair Group) यह सिमेल के दिक् के समान है जिसका निर्माण दो व्यक्तियों से मिलकर होता है। उन्होंने माना है कि ऐसे समूह में आत्मीयता की भावना (Degree of Intimacy) सर्वाधिक होती है। इन्होनें माँ-बेटे के समूह को समाज का मूल स्वरूप स्वीकार किया है। 


ii. प्राथमिक समूह (Primary Group) : कूले ने अंतःक्रिया पर आधारित स्वविकसित होने वाले अनौपचारिक समूहों को प्राथमिक समूह कहा। इसकी विशेषताओं में उन्होंने सदस्यों के मध्य आमने सामने के संबंधों, गहरी आत्मीयता, हम की भावना तथा सामान्य हित को माना है। उनका कहना है कि जब दो-चार लोग आमने-सामने के संबंध ( face to face relation) के आधार पर स्वाभाविक अंतःक्रिया में भाग लेते हैं तो आत्मीयता के विकसित होने के साथ ये समूह स्वाभाविक रूप से निर्मित हो जाते हैं। उनका कहना है कि प्राथमिक समूह कई अर्थों में प्राथमिक है पहला तो यह की शिशु जन्म के पश्चात् सर्वप्रथम इन्हीं समूहों में आता है किन्तु सर्वाधिक महत्वपूर्ण यह है कि यह समूह समाजीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से उसके व्यक्तित्व निर्माण में बुनियादी योगदान देते है। उन्होंने परिवार, पड़ोस तथा मित्रमण्डली समूह (Pear Group) को प्राथमिक समूह के उदहारण के रूप में स्वीकार किया है।


iii. आभासी समूह (Quasi Primary Group) : कूले का कहना है की जब कोई समूह अपनी मूल प्रकृति में प्राथमिक समूह की विशेषताओं को प्रदर्शित करता है, लेकिन साथ ही उसमे कुछ विशेशताएँ द्वितीयक समूह की भी मिलती हैं। जैसे- औपचारिक संरचना एवं निश्चित लक्ष्य इत्यादि तो उसे आभासी प्राथमिक समूह कहते है। जैसे- ब्वायस अकाउंट समूह, कीर्तन मण्डली इत्यादि। यद्यपी द्वितीयक समूह की अवधारणा कूले द्वारा प्रस्तुत नही की गयी किन्तु इस अवधारणा का विकास प्राथमिक समूह की पूरक अवधारणा के रूप में हुआ, जिससे इसे कूले की अवधारणा के साथ स्वीकार किया जा सकता है। 


3. समनर: इन्होनें समूह के सदस्यों के संबंधों में सामाजिक दूरी एवं आत्मीयता को आधार बनाकर समूहों को दो भागों में विभाजित किया है। यह वर्गीकरण उन्होंने अपनी पुस्तक में “Folkways" 1906 में प्रस्तुत किया।


i. अन्त: समूह (In Group) समनर के अनुसार कोई व्यक्ति जिस भी समूह का सदस्य होता है और जिसके प्रति हम की भावना (We-feeling) प्रदर्शित करता है वे सभी समूह उसके अन्तः समूह होते हैं।

समनर ने अन्तः समूह की अवधारणा के आधार पर ही स्वजतिकेंद्रवाद' (Etheno Centism) की अवधारणा प्रस्तुत की जिसके अनुसार कोई व्यक्ति अपने समूह और संस्कृति को श्रेष्ठ तथा दूसरों के समूह और उनकी संस्कृति को हीन स्वीकार करता है। समनर का मानना है कि स्वजाति केन्द्रवाद की भावना ही समूह के एकीकरण तथा विघटन हेतु उत्तरदायी है।


ii. वाह्य समूह (Outer Group): समनर के अनुसार व्यक्ति जब किसी समूह का सदस्य नहीं होता है और वह उस समूह के प्रति वे की भावना का प्रदर्शन करता है तो वह समूह उस व्यक्ति के लिए वाह्य समूह का परिचायक होता है।


4. हर्बर्ट हाईमैन: सन्दर्भ समूह की अवधारणा का प्रयोग सर्वप्रथम हर्बर्ट हाईमैन ने १९४२ में अपने एक लेख “The Psychology of Status" में स्कूली बच्चों के व्यवहार प्रतिमानों के विश्लेषण के सन्दर्भ में किया था। उन्होंने अपने अध्ययन में देखा कि निम्न वर्ग से आने वाले बच्चे अपने व्यवहार प्रतिमानों में उच्च वर्ग से आने वाले बच्चों का अनुकरण करते है। इस आधार पर हाईमैन का कहना है कि उच्च वर्ग वाले बच्चों का समूह निम्न वर्ग के बच्चों के लिए सन्दर्भ समूह का काम करता है। इस प्रकार यह अवधारणा इस तथ्य को स्पष्ट करती है कि कभी-कभी हमारे व्यवहार प्रतिमान वाह्य समूहों के अनुरूप भी होते है। यद्यपि सैद्धान्तिक तौर पर यह माना जाता है कि हम जिस समूह के सदस्य होते हैं हमारा व्यवहार आम तौर पर उसी समूह के प्रतिमानों के अनुरूप होता है।