मानव चिंतन के स्तर एवं सामाजिक संगठन - Social Organisation and Stages of Thinking

 मानव चिंतन के स्तर एवं सामाजिक संगठन - Social Organisation and Stages of Thinking


धार्मिक अवस्था में मानव मस्तिष्क अपनी उत्तपत्ति को प्रकृति या ईश्वर की देन मानता है अर्थात मानव यह सोचता था कि मनुष्य को ईश्वर ने पैदा किया है। तात्विक अवस्था में मानव मस्तिष्क यह सोचने लगा कि उसे विकसित करने में उसके स्वयं के प्रयास ही सफल रहे हैं। वैज्ञानिक अवस्था अर्थात अंतिम अवस्था में वह यह खोजने की कोशिश करता है कि मनुष्य की इस सम्पूर्ण प्रगति के पीछे कौन सा नियम कार्य कर रहा है। यहां पर कॉम्ट ने यह स्पष्ट किया है कि पिछले स्तर के समाप्त होने पर ही अगला स्तर आता है। इन स्तरों से ही मनुष्य के मस्तिष्क के विकास की अवस्थाओं को जाना जा सकता है क्योंकि विकास के ए नियम सम्पूर्ण समाज से जुड़े हुए हैं।


अगस्त कॉम्ट ने तीन स्तरों की अवस्थाओं का संबंध सामाजिक संगठन से जोड़ा है।

उनके अनुसार चिंतन के प्रत्येक स्तर में सामाजिक संगठन का भी एक स्तर का पाया जाता है। सामाजिक संगठन वह अवस्था है जिसके द्वारा समाज की विभिन्न संस्थाओं में कार्यात्मक एकता पाई जाती है। कॉम्ट ने सामाजिक संगठन को सामाजिक विकास का आधार माना है। कॉम्ट के अनुसार आदर्श सामाजिक संगठन मे परिवार, राज्य और चर्च का स्थान महत्वपूर्ण होता है। एक समाज का संगठन दूसरे समाज से भिन्न होता है और इस भिन्नता के लिए अनेक कारक उत्तरदायी होते हैं। कॉम्ट के अनुसार सामाजिक संगठन को चार तत्व प्रभावित करते हैं -


1. पर्यावरण (Environment)


2. प्रजाति (Race )


3. राष्ट्र (Nation)


4. व्यक्ति (Individual )


कॉम्ट चिंतन की तीन अवस्थाओं के नियम को प्रमाणिकता प्रदान करना चाहते थे। कॉम्ट प्रत्यक्षवादी था और वह अपने सिद्धांत को विज्ञान की कसौटी पर कसना चाहता था। इसलिए अपने सिद्धांत की पुष्टि के लिए उसने इतिहास का सहारा लिया। उसके अनुसार चिंतन की अवस्था एवं सामाजिक संगठन प्रत्यक्ष रुप से एक दूसरे से संबंधित है चिंतन की प्रत्येक अवस्था में एक विशिष्ट प्रकार का सामाजिक संगठन रहा है। चिंतन की प्रत्येक अवस्था एक विशेष प्रकार के सामाजिक संगठन का प्रतिनिधित्व करती है।