तात्विक स्तर पर सामाजिक संगठन , वैज्ञानिक स्तर एवं सामाजिक संगठन -Social organization at the elemental level, Scientific level and social organization

 तात्विक स्तर पर सामाजिक संगठन , वैज्ञानिक स्तर एवं सामाजिक संगठन -Social organization at the elemental level, Scientific level and social organization


तात्विक स्तर पर सामाजिक संगठन और राज्य शक्ति के स्वरूपों में परिवर्तन होता है। ईश्वरीय अधिकार की अवधारणा को त्याग कर प्राकृतिक अधिकारों को अपनाया जाता है। इसी आधार पर मनुष्यों के राजनैतिक संबंध निर्धारित और नियमित होते हैं। इस स्तर का सामाजिक संगठन प्रथम स्तर से अधिक प्रगतिशील होता है। तात्विक स्तर पर राजनैतिक सत्ता अमूर्त अधिकारों के सिद्धांतों पर आधारित होती है। इस अवस्था में दैवीय अधिकार लगभग समाप्त हो जाते हैं। इस अवस्था में सामाजिक संगठन का वैधानिक पहलू विकसित होने लगता है। राजा की निरंकुश सत्ता घट जाती है और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के विचार जोर पकड़ने लगते हैं। इस अवस्था में मानव चितंन में कल्पना का स्थान भावनाएं ले लेती हैं। जिसका प्रभाव सामाजिक संगठन पर भी पड़ता है। भावात्मक अवस्था में धार्मिक सत्ता की वृद्धि के कारण पुरोहितवाद का विकास होता है। यही कारण है कि दसवीं से 15वीं शताब्दी तक यूरोप में पुरोहितवाद एवं पोपवाद का प्रभुत्व रहा।

राज्य की तुलना में उनका स्थान श्रेष्ठ और पवित्र रहा है। कॉम्ट के अनुसार पोप का दावा था कि सेंट पीटर को इस लोक और परलोक दोनों में मनुष्यों का बद्ध और मुक्त करने का अधिकार मिला था। पोप सेंट पीटर का प्रतिनिधि है और इस कारण उसे भी ये अधिकार प्राप्त हैं। संसार या लोक में बद्ध और मुक्त करने के अधिकार का यह अभिप्राय है कि पोप की सत्ता लौकिक विषयों में भी सर्वोच्च है पर उसे उसने स्वयं अपने हाथ में न रखकर सम्राट को हस्तांतरित कर दिया है। अतएव सम्राट को जो कुछ अधिकार मिले है, वे सीधे ईश्वर से न मिलकर पोप से प्राप्त हुए हैं। इस कारण सम्राट का पर पोप के पद से नीचे और उसके आधीन है। इस प्रकार इस युग मे राजकीय शक्ति का ह्रास हुआ एवं धार्मिक शक्ति का उत्थान हुआ। यह भी माना गया है कि धर्म संघ सर्वथा विशुद्ध है और इसी कारण राज्य की तुलना में उसका स्थान श्रेष्ठ और पवित्र है। संक्षेप में इस अवस्था को चिंतन के संक्रमण काल की अवस्था कहा जा सकता है।


इस अवस्था में सामाजिक संगठन इस प्रकार था।


1. ईश्वरीय सिद्धांत का स्थान प्राकृतिक सिद्धांत ने ले लिया था।


2. इस अवस्था में सामाजिक संगठन भावनाओं पर आधारित था।


3. इसमें पुरोहितवाद का जन्म हुआ।


4. राज्य सत्ता में गिरावट के साथ ही व्यक्तिगत स्वतंत्रता में वृद्धि हुई। 


5. संक्षेप में इस अवस्था को चिंतन में संक्रमण काल की अवस्था कहा गया था।


वैज्ञानिक स्तर एवं सामाजिक संगठन


कॉम्ट के अनुसार मानव चिंतन की अंतिम अवस्था वैज्ञानिक या प्रत्यक्षात्मक अवस्था है। इस अवस्था में सामाजिक संगठन विश्वास पर आधारित न होकर अवलोकन, परीक्षण एवं प्रयोगों की वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित हो जाता है। इस अवस्था में समाज का वैज्ञानिक आधार पर विकास होने लगता है। तात्विक विचार शाश्वत या स्वयं पूर्ण हो सकते हैं पर वास्तविक तर्को तथ्यों पर आधारित नहीं होते हैं।

अतः जब व्यक्ति तात्विक विचारों को छोड़कर निरीक्षण, परिक्षण और तर्क के आधार पर संसार की घटनाओं को समझने और परिभाषित करने का प्रयास करता है तभी वैज्ञानिक या प्रत्यक्षात्मक स्तर में उसका प्रवेश होता है। इस अवस्था में सम्पूर्ण समाज में नए-नए अविष्कार होने लगते हैं। लोगों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता की भावना पनप जाती है। समय का मूल्य बढ़ जाता है। सामाजिक पुर्ननिर्माण तथा शिक्षा को प्रोत्साहन मिलता है।


विभिन्न प्रकार के वैज्ञानिक अनुसंधान किए जाने लगते हैं। विज्ञान की सहायता से प्राकृतिक शक्तियों का अधिकाधिक प्रयोग करने का प्रयास किया जाता है।


कॉम्ट का कथन है कि तर्क और निरीक्षण सम्मिलित रूप से वास्तविक ज्ञान का आधार है। जब हम किसी घटना की व्याख्या करते हैं तो कुछ सामान्य तथ्यों और उस घटना के बीच संबंध दुढ़ने का प्रयास करते हैं। यह खोज निरीक्षण के द्वारा यथार्थ हो सकती है। क्योकि निरीक्षण ही प्रमाण है। वही वास्तविक है न कि काल्पनिक।


कॉम्ट के अनुसार विश्व के विभिन्न तथ्यों घटनाओं को समझने का वास्तविक तथा निर्भर योग्य साधन निरीक्षण और वर्गीकरण ही है। प्रत्यक्षात्मक स्तर पर मनुष्य इसलिए न तो काल्पनिक किला बनाता है और न ही तात्विक दृष्टि से संसार के विभिन्न तत्वों को देखने का प्रयास करता है। इस स्तर पर ज्ञान का संग्रह ही एक मात्र उद्देश्य है। इस स्तर पर समाज में भौतिक नैतिक एवं बौद्धिक शक्तियों का उचित समन्वय पाया जाता है। इस अवस्था में लोकतंत्रात्मक शासन व्यवस्था को शासन का सर्वोच्च स्वरूप माना जाता है और विज्ञान की सहायता से सामाजिक संगठन को अपने अनुकूल बनाया जा सकता है। संक्षेप में इस अवस्था की निम्न विशेषताएं थी


1. सामाजिक संगठन में विश्वास और परम्पराओं के स्थान पर निरीक्षण परीक्षण और वर्गीकरण पर बल दिया गया।


2. इस अवस्था में प्राकृतिक साधनों का उपयोग और औद्योगिक विकास हुआ।


3. व्यक्तिगत स्वतंत्रता में वृद्धि हुई।


4. इस अवस्था में भौतिक, बौद्धिक और नैतिक उन्नति का सामंजस्य हुआ।


5. राजनैतिक जीवन में लोकतंत्र की सत्ता को स्वीकार किया गया।