धार्मिक या काल्पनिक अवस्था में सामाजिक संगठन - social organization in a religious or imaginary state

 धार्मिक या काल्पनिक अवस्था में सामाजिक संगठन - social organization in a religious or imaginary state


इस अवस्था में सामाजिक संगठन को ईश्वर की इच्छा का प्रतिरूप माना गया है। इस समय दैवी सिद्धांत का प्रभाव समाज पर बहुत अधिक था। इसलिए यह माना गया कि समाज की उत्पत्ति एवं विकास और अस्तित्व के लिए ईश्वर की इच्छा ही आधार है। जब मानव ज्ञान धार्मिक अवस्था पर होता है तब प्रत्येक चीज की भांति सामाजिक जीवन तथा संगठन को भी ईश्वरी इच्छा के प्रतिरूप माना जाता है। इस स्तर पर समाज का स्वरूप संबंधी सिद्धांत ईश्वरी सिद्धांत होता है। ईश्वरी आधार पर ही राजनीतिक सत्ता को स्वीकार किया जाता है। पृथ्वी पर ईश्वर के बाद राजा का ही स्थान है। राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि राजा ईश्वर की ओर से समाज पर शासन करता है। राजा की आज्ञा का पालन अनिवार्य है। उसकी आज्ञा का उल्लंघन करना ईश्वरी शक्ति का विरोध करना है।

राजा की आज्ञा सर्वोपरि है और वह सर्वोच्च शक्ति का प्रतीक होता है। राजा के समस्त आदेशों को उचित या अनुचित का विचार न करते हुए सबको मानना चाहिए। राजा प्रत्येक प्रकार के कार्य को कर सकता है। वह इसके लिए ईश्वर को छोड़कर किसी अन्य के प्रति उत्तरदायी होगा न ही कोई उसके किसी कार्य को संदेह की दृष्टि से देख सकता है। राजा पृथ्वी पर ईश्वर का प्रत्यक्ष प्रतिनिधी होता है। इस कारण उसके शब्द ही कानून है। इस प्रकार के कानून के पीछे ईश्वरीय अभिमति होती है। इसलिए किसी को यह अधिकार नहीं है कि वह इस कानून के उचित-अनुचित पर विचार करे। राजा की आज्ञा का पालन करना अनिवार्य था। ऐसा न करने पर ईश्वर उसे दंड देता है। इस अवस्था में अंधविश्वासों का स्थान महत्वपूर्ण होता है। सामाजिक संगठन अंधविश्वासों, रूढ़ियो, लोक प्रथा, परंपराओं आदि से घिरा हुआ था। ईश्वर की सत्ता को ही सामाजिक व्यवस्था एवं संगठन का मूल आधार माना गया था। लोगों में उचित-अनुचित की समझ नहीं थी। तर्क शक्ति का अभाव लोक-कथाओं एवं परंपराओं के द्वारा सामाजिक नियंत्रण का प्रयास किया जाता था।

सम्पूर्ण समाज में अंधविश्वासों का प्रचलन था। राजा को चुनौती देने का साहस किसी में नहीं था। समाज का संगठन सरल सुगम एवं कल्पना आश्रित था। राजा को निरंकुश शक्तियां प्रदान करने के कारण इस अवस्था में निरंकुश राजतंत्र की स्थापना हुई। इस आधार पर हमे इस अवस्था में निम्न विशेषताएं देखने को मिलती है


1. सामाजिक संगठन को ईश्वरीय इच्छा का प्रतिरूप माना जाता था।


2. दैवीय सिद्धांत का समाज में बोलबाला था।


3. राजा को पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था। 


4. राजा के शब्द ही नियम होते थे और इनका उल्लंघन करना पाप माना जाता था।


5. राजा के दंड को ईश्वरीय आज्ञा मानकर स्वीकार किया जाता था।


6. समाज का संगठन लोकगाथाओं और परम्पराओं पर आधारित था।


7. समाज का संगठन अत्यन्त ही सरल था।