भारत के प्राचीन ग्रंथों में सामाजिक चिंतन - Social thought in ancient texts of India

 भारत के प्राचीन ग्रंथों में सामाजिक चिंतन - Social thought in ancient texts of India

भारत के प्राचीन ग्रंथों में वेद, ब्रह्ममण, आरण्य, उपनिषद, वेदांग, रामायण, महाभारत, पुराण, स्मृतियाँ आदि को सम्मिलित किया जाता है। जिसमें वेद को भारत के सामाजिक चिंतन का मूल स्रोत माना जाता है। भारत के प्राचीन ग्रंथों के सामाजिक चिंतन को समझने के लिए इन ग्रंथों पर संक्षिप्त चर्चा आवश्यक है।


1. वेद वेदों की रचना के समय निर्धारण के बारे में सामाजिक चिंतकों में काफी मतभेद है, फिर भी कई सामाजिक चिंतक इन्हें विश्व का प्राचीनतम ग्रंथ मानते है। वेदो को अपौरूषेय कहा गया क्यो की ऐसे मान्यता है कि इसकी रचना किसी पुरूष द्वारा न होकर ईश्वर द्वारा की गयी है। वेदो की संख्या चार है प्रथम तीन वेदो को वेद त्रयी कहा जाता है।


क. ऋग्वेद - यह सर्वाधिक प्राचीन वेद है। इसके पुरुष सूक्त में पहली बार वर्ण व्यवस्था पर विचार व्यक्त किया गया है। जिसमें ब्रम्हा के मुख से ब्रह्ममण, बाहु से क्षत्रिय, जांघ से वैश्य और पैर शूद्र की उत्पत्ति मानी गयी है।


ख. यजुर्वेद यह कर्मकाण्डी वेद है जिसमें देवताओं की स्तुति, धार्मिक अनुष्ठान एवं कर्मकाण्डों का वर्णन किया गया है।


ग. सामवेद इसमें गायन एवं संगीत का वर्णन है। इसकों भारतीय संगीतशास्त्र का जनक कहा जाता है।


घ. अथर्ववेद - इस वेद में मंत्रों-तंत्रों, जादू, टोना, भूत, प्रेत, आदि का वर्णन मिलता है।


2. ब्रह्ममण ग्रंथ वेदों को सरल ढंग से समझने के लिए ब्रह्ममण ग्रंथों का निर्माण हुआ जिसमें शतपथ ब्रह्ममण ग्रंथ प्रमुख है। ब्रह्ममण काल के सामाजिक चिंतन में कर्मकांडों की प्रबलता होने जाने आध्यात्मवाद कमजारे पड़ने लगा।


3. आरण्यक वनों में रहकर लिखे गये ग्रंथों को आरण्यक कहा गया जिसमें दार्शनिक रहस्यों का विवरण मिलता है।


4. उपनिषद - शिष्य द्वारा गुरू के समीप बैठकर प्राप्त किया गया ज्ञान उपनिषद कहलाता है। जिसमे ब्रह्ममण काल के कर्मकाण्ड के विरूद्ध प्रतिक्रिया उत्पन्न हुई। आश्रम व्यवस्था का सर्वप्रथम उल्लेख छांदोग्य उपनिषद में मिलता है। चारों आश्रमों का सर्वप्रथम उल्लेख जबालों उपनिषद में मिलता है।