मनु का सामाजिक चिंतन - social thought of manu
मनु का सामाजिक चिंतन - social thought of manu
मनुस्मृति के अध्यायों के शीर्षक से स्पष्ट है कि मनु ने सामाजिक व्यवस्था (वर्ण व्यवस्था, आश्रम व्यवस्था,) संस्थाओ, संस्कार, कर्म एवं पुनर्जन्म, पुरुषार्थ, राजधर्म आदि जैसे मानवीय सामाजिक जीवन के सभी पहलुओं पर चिंतन किया है।
1. वर्ण व्यवस्था
मनु के अनुसार वर्ण व्यवस्था सामाजिक संगठन का आधार है। जिससे समाज का ही नहीं वरन सम्पूर्ण सृष्टि का रक्षण एवं उत्थान होता है मनु के अनुसार सृष्टि के रक्षा के लिए ब्रम्हा ने अपने मुख से ब्रह्ममण, बाहु से क्षत्रिय, उरू से वैश्य और पैर शूद्र के रूप में चार वर्णों की उत्पत्ति की। प्रकृति एवं गुणों के आधार पर उनके लिए पृथक-पृथक कर्मों का निर्धारण किया। मनु के अनुसार ब्रह्ममण में सतोगुण, क्षत्रिय में रजोगुण, वैश्य रजोमिश्रित तमोगुण और शूद्र में तमोगुण प्रधान होता है। मनु वर्ण व्यवस्था को समझने के लिए वर्णों का अध्ययन आवश्यक है।
क. ब्रह्ममण मनु के अनुसार ब्रह्ममण वर्ण का कर्तव्य पढना-पढाना, यज्ञ करना और करवाना, दान लेना और दान देना, साथ-साथ मनु ने कहा कि आचरण से हीन ब्रह्ममण वेदों के फल की प्राप्ति नहीं कर सकता है। वह अपना पद व प्रतिष्ठा खो देता है। ब्रह्ममण भोगो तृप्ति के लिए नहीं अपितु शरीर की रक्षा के निमित्त ही धन का अर्जन कर सकता है।
ख. क्षत्रिय मनु के अनुसार क्षत्रिय वर्ण का कर्तव्य प्रजा की रक्षा करना, दान देना, यज्ञ करना, विषय- भोगो
से दूर रहना, अध्ययन करना आदि है। ग. वैश्य मनु ने वैश्य वर्ण के कर्तव्य को निर्धारित करते हुए कहा कि इस वर्ण का कर्तव्य पशुओं का पालन करना, दान देना, यज्ञ करना, अध्ययन करना, व्यापार करना, ब्याज लेना और खेती करना आदि है। घ. शूद्र मुन ने कहा कि शूद्र वर्ण का एक मात्र कर्तव्य अपने से उच्च तीनों वर्णों की बिना किसी ईर्ष्या भाव से सेवा करना है।
मनु का विचार है कि प्रत्येक वर्ण की पूर्णता तभी संभव है जब इसमें जन्म लेने वाला मनुष्य जन्म से, कर्म में एवं ज्ञान से पूर्ण हो यदि कोई जन्म से ब्रह्ममण हो परन्तु कर्म व ज्ञान से हीन हो तो वह पूर्ण ब्रह्ममण नही कहलायेगा। मनु ने कहा कि जिस प्रकार काठ का हाथी एवं चर्म का मृग नकली है, उसी प्रकार अज्ञानी ब्रह्ममण भी नाम मात्र का ब्रह्ममण है।
2. आश्रम व्यवस्था
मनु के सामाजिक चिंतन वर्ण व्यवस्था के बाद आश्रम व्यवस्था दूसरी प्रमुख व्यवस्था है इन दोनो व्यवस्थाओं के मध्य घनिष्ठ संबंध है। वर्ण व्यवस्था मनुष्य द्वारा समाज के प्रति कर्तव्य धर्म पर आधारित है जबकि आश्रम व्यवस्था मनुष्य को कर्तव्य पालन हेतु शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, सामाजिक रूप से तैयार करने पर आधारित है। शाब्दिक रूप से आश्रम शब्द 'श्रम' धातु से बना है जिसका अर्थ है 'परिश्रम करना अर्थात आश्रम एक ऐसा स्थान है जहाँ हम अपने जीवन के निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रयास करते हैं। ऋग्वेद में सौ वर्ष जीने की कामना की गयी है (जीमेव शरदः शतम्) इस आधार पर आश्रम व्यवस्था के अन्तर्गत व्यक्ति के जीवन को सौ वर्ष मानकर इसे 25-25 वर्ष के चार आश्रमों में विभाजित किया गया है ये क्रमशः ब्रम्हचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, तथा संन्यास आश्रम है।
क. ब्रम्हचर्य आश्रम मनु के अनुसार पहला आश्रम ब्रम्हचर्य है जिसमें बालक उपनयन संस्कार के माध्यम से प्रवेश करता है और विद्यार्जन के लिए घर छोड़कर गुरूकुल में निवास करता है। ब्रम्हचर्य दो शब्दों से मिलकर बना है ब्रम्ह तथा चर्य जहां 'ब्रम्ह' का अर्थ महान् तथा 'चर्य' का अर्थ है विचरण अथवा अनुचरण करना। अर्थात ब्रम्हचर्य का तात्पर्य ऐसा मार्ग पर चलना है जिससे व्यक्ति शारीरिक, मानसिक, तथा आध्यात्मिक दृष्टि से सक्षम होकर महानता का वरण कर सकें। मनु ने स्पष्ट किया है कि इस आश्रम में बालक का अनुशाषित एवं सरल जीवन व्यतीत करना चाहिए इस संन्दर्भ में मनु ने मनुस्मृति के अध्याय दो में कुछ नियमों का भी उल्लेख किया है। जैसे ब्रम्हचारी यज्ञोपवीत, अजिन, मेघला और दंड को नियम पूर्वक धारण करें। सूर्योदय से पहले सोकर उठ जायें। मन, वचन, कर्म से आचार्य की सेवा करें आदि मनु द्वारा गुरूकुल में रहने की अवधि सामान्यता 18 वर्ष निर्धारित की गयी जिससे इतने समय में वह सभी तरह की विद्याएं प्राप्त कर सकें।
25 वर्ष की आयु पूरी हो जाने पर ब्रम्हचारी को प्रतीक के रूप में एक स्नान करने का विधान रखा गया जिसे समावर्तन संस्कार कहा जाता है इस समय ब्रम्हचारी अपनी शक्ति के अनुसार गुरू को गुरू के. दक्षिणा देता है तथा यही से ब्रम्हचर्य आश्रम की समाप्ति हो जाती है।
ख. गृहस्थ आश्रम मनु के अनसार गृहस्थ आश्रम की अवधि 25 से 50 वर्ष तक की है। ब्रम्हचर्य आश्रम में आवश्यक तैयारी के बाद व्यक्ति गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता है। इस आश्रम का प्रारम्भ विवाह संस्कार के साथ होता है। व्यक्ति का यह कर्तव्य निर्धारित किया गया है कि वह गृहस्थ आश्रम के लिए किसी ऐसी कन्या से विवाह करे जो माता या पिता के सपिंड न हो और साथ ही पिता के गोत्र का न हो। वास्तव में गृहस्थ वह स्थल है जहां व्यक्ति धर्म, अर्थ तथा काम जैसे पुरुषार्थो को पूरा करके अपने आपको मोक्ष के लिए तैयार करता है। एक गृहस्थ के कर्तव्य को स्पष्ट करते हुए मनु ने लिखा है कि गृहस्थ आश्रम में पंच महायज्ञों को पूरा करना आवश्यक है। वेद का अध्ययन और अध्यापन करना ब्रम्ह यज्ञ है, पित्रो का तर्पण करना पित्र यज्ञ है, प्रतिदिन देव यज्ञ, अतिथियों के सत्कार को नृयज्ञ तथा जीवों पर दया करन भूतयज्ञ है। मनु के अनुसार पारलौकिक और सांस्कारिक सुख प्राप्त करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करके इससे संबंधित कर्तव्यों को पूरा करे। जो व्यक्ति अस्थिर बुद्धि वाले अथवा इन्द्रियों में नियंत्रण में रहने वाले होते है उनके लिए इस आश्रम को धारण न करना ही उचित है। इस आश्रम में काम की पूर्ति की भी अनुमति दी गयी है। लेकिन 'काम' को एक साधन माना गया है जिसके द्वारा संतान को जन्म दिया जा सकें। मनु ने गृहस्थ आश्रम को सभी आश्रमों में अधिक महत्वपूर्ण तथा अन्य सभी आश्रमों का आधार माना है। मनु ने कहा है कि ‘‘जैसे सब जन्तु वायु के सहारे जीते है, वैसे ही सब प्राणी गृहस्थ आश्रम में जीवन धारण करते है" जैसे सब नदी-नद समुद्र में जाकर स्थित होते है वैसे ही तीनों आश्रम गृहस्थ आश्रम में स्थिति प्राप्त करते में है, उसी की सहायता से जीवित है अन्य आश्रमो का भरण-पोषण करने के कारण यह आश्रम ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ है।
ग. वानप्रस्थ आश्रम मनु के अनुसार गृहस्थ आश्रम के बाद व्यक्ति वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करता है। जिसकी अवधि 50 वर्ष की आयु से 75 वर्ष की आयु तक होती है। वानप्रस्थ का शाब्दिक अर्थ होता है वन की ओर प्रस्थान करना' अर्थात यह वह आश्रम है जिसमें व्यक्ति गृहस्थ आश्रम के दायित्वों से मुक्त होकर मानव मात्र की सेवा और ज्ञान का प्रसार करने के लिए जंगल में कुटिया बनाकर रहता है। मनु का निर्देश है कि गृहस्थ जब यह देख ले कि शरीर की त्वचा ढीली पड गयी और शरीर के बाल सफेद हो गये, संतान के संतान हो गयी, तब घर-बार का मोह छोड़कर जंगल की ओर प्रस्थान करें। मनु के अनुसार वानप्रस्थ आश्रम में व्यक्ति के सुख के लिए प्रयत्न नही करना चाहिए। इस तरह मनु के द्वारा वानप्रस्थ में व्यक्ति की जो दिनचर्या को निर्धारित की गयी वह अत्यन्त कठोर एवं आव्यावारिक प्रतीक होता है। परन्तु मनु का यह चिंतन इस कारण पर आधारित था कि लम्बी साधना एवं अनुभवों के आधार पर वानप्रस्थ आश्रम में रहने वाले व्यक्ति ही ब्रम्हचारियों को एक व्यवहारिक शिक्षा दे सकते थे।
घ. संन्यास आश्रम वानप्रस्थ आश्रम के बाद व्यक्ति अपने जीवन के अतिंम आश्रम में प्रवेश करता है जिसकी अवधि 75 वर्ष की आयु से 100 वर्ष की आयु तक होती है। मनु के अनुसार इस आश्रम में प्रवेश करते ही व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह सब कुछ त्याग कर परिवाज्रक जीवन व्यतीत करें मुन के अनुसार संन्यासी का कर्तव्य है कि वह अकेला विचरण करें। भिक्षा मांगकर आठ पहर में एक बार ही दिन में भोजन करें। वह यम-नियमो का पूर्णतया पालन करें और अपना जीवन यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान में लगाये। मनु के अनुसार इन्द्रियों को वश में करने से संन्यासी मोक्ष पाने में सामर्थ हो जाता है।
3. पुरूषार्थ
पुरुषार्थ का तात्पर्य उद्योग करने या प्रयत्न करने से है अर्थात अभीष्ट लक्ष्य प्राप्ति के लिए उद्यम करना ही पुरूषार्थ है। मनु ने व्यक्ति के जीवन के चार आधारभूत कर्तव्यों के रूप में पुरूषार्थ का उल्लेख किया है जिन्हें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का नाम दिया है मनु के अनुसार चारो पुरूषार्थों को प्राप्त करके ही व्यक्ति जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो सकता है।
4. संस्कार
मनु के अनुसार ब्रह्ममण, क्षत्रिय, वैश्य भी मूलतः शूद्र के रूप में ही जन्म लेते है। उसके पश्चात ‘संस्कारात् द्विज उच्यते’- अर्थात् धार्मिक संस्कारों द्वारा वह द्विज बनता है। मनु ने मुनस्मृति में तेरह संस्कारों का उल्लेख किया है जो कि इस प्रकार है
1. गर्भाधान संस्का
2. पुंसवन संस्कार
3. सीमान्तोनयन संस्कार
4. जातकर्म संस्कार
5. नामधारण संस्कार
6. निष्कर्मण संस्कार
7. अन्नप्राशन संस्कार
8. चूड़ाकर्म संस्कार
9. कर्णवेध संस्कार
10. विद्यारम्भ संस्कार
11. उपनयन संस्कार
12. विवाह संस्कार
13. अन्त्योष्ठि संस्कार
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