समाजशास्त्र समाज के अध्ययन के रूप में - Sociology as the study of society
समाजशास्त्र समाज के अध्ययन के रूप में - Sociology as the study of society
समाज के अध्ययन के रूप में गिडिग्स, समनर, वार्ड, आदि समाजशास्त्रियों ने समाजशास्त्र को ऐसे विज्ञान के रूप में परिभाषित किया है जो सम्पूर्ण समाज का एक समग्र इकाई के रूप में परिभाषित किया है तो सम्पूर्ण समाज का एक समग्र इकाई के रूप में अध्ययन कर सके। कुछ प्रमुख विद्वानों ने समाजशास्त्र को इस प्रकार परिभाषित किया है
वार्ड (Word) के अनुसार, समाजशास्त्र समाज का विज्ञान है।"
गिडिग्स (Giddings) के अनुसार, “ समाजशास्त्र समाज का वैज्ञानिक अध्ययन है।" आपने अत्यन्त भी लिखा है कि समाजशास्त्र समाज का एक समग्र इकाई के रूप में व्यवस्थित वर्णन एवं व्याख्या है।
ओडम (Odum) के अनुसार "समाजशास्त्र वह विज्ञान है जो समाज का अध्ययन करता है।" जी. डंकन मिचेल (G. Duncan Mitchell) के अनुसार, समाजशास्त्र मानव समाज के संरचनात्मक पक्षों का विवरणात्मक एवं विश्लेषणात्मक शास्त्र है।"
इन परिभाषाओं के आधार पर यह तो स्पष्ट है कि समाजशास्त्र समाज का वैज्ञानिक अध्ययन करता है।
समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों के अध्ययन के रूप में
कुछ विद्वानों ने समाजशास्त्र को सामाजिक संबंधों के क्रमबद्ध अध्ययन के रूप में परिभाषित किया है। सामाजिक संबंधों, से अभिप्राय है दो या दो से अधिक से अधिक ऐसे व्यक्तियों के संबंधों से है जिन्हें एक दूसरे का आभाष है तथा जो एक-दूसरे के लिए कुछ-न-कुछ कार्य कर रहे हैं। यह जरूरी नहीं है कि संबंध सहयोगात्मक ही हो, संबंध संघर्षात्मक भी हो सकते है। समाजशास्त्र में इन दोनों प्रकार के सामाजिक संबंधों का अध्ययन किया जाता है। सामाजिक संबंध उस परिस्थिति में पाए जाते हैं जिसमें दो या अधिक 'व्यक्ति'
अथवा दो या दो से अधिक समूह परस्पर अर्न्तक्रिया करें सामाजिक संबंध तीन प्रकार के होते हैं
1. व्यक्ति तथा व्यक्ति के बीच
2. व्यक्ति तथा समूह के बीच
3. एक समूह तथा दूसरे समूह के बीच
समाजशास्त्र को सामाजिक संबंधों का अध्ययन मानने वाले कुछ प्रमुख विद्वानों की परिभाषाएँ इस प्रकार है मैकाइवर तथा पेज (Maciver and page) के अनुसार, “समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों क विषय में है, संबंधों के इसी जाल को हम समाज कहते हैं।"
क्यूबर (J. F. Cuber) के अनुसार, “समाजशास्त्र को मानव संबंधों के वैज्ञानिक शाखा के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।"
मैक्स वेबर (Max Weber) के अनुसार, “समाजशास्त्र प्रधानतः सामाजिक संबंधों तथा कृत्यों का अध्ययन है।"
वान वीज (Von Wiese) के अनुसार, “सामाजिक संबंध ही समाजशास्त्र की विषय वस्तु का एकमात्र वास्तविक आधार है।" आरनोल्ड एम. रोज (Arnold M. Rose) के अनुसार, समाजशास्त्र मानव संबंधों का विज्ञान है।"
उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि समाजशास्त्र एक ऐसा विज्ञान है जो सामाजिक संबंधों का व्यवस्थित अध्ययन करता है। सामाजिक संबंधों के जाल को ही समाज कहा गया है। मनुष्य पारस्परिक जागरूकता और सम्पर्क के आधार पर विभिन्न व्यक्तियों एवं समूहों के साथ अगणित सामाजिक संबंध स्थापित करता है । जब अनेक व्यक्ति और समूह विभिन्न इकाइयों के रूप में एक-दूसरे के साथ संबंधित हो जाते है, तब इन संबंधों के आधार पर जो कुछ बनता है, वही समाज' कहलाता है। ऐसे समाज या सामाजिक संबंधों का अध्ययन समाजशास्त्र के अंतर्गत किया जाता है।
3. समाजशास्त्र समूहों के अध्ययन के रूप में
नोब्स, हाइन तथा फ्लेमिंग के अनुसार, समाजशास्त्र समूहों में लोगों का वैज्ञानिक और व्यवस्थित अध्ययन है।" इसका तात्पर्य है कि समाजशास्त्र व्यवहार के उन प्रतिमानों की ओर ध्यान देता है जो संगभित समुदायों में रहने वाले लोगों में पाये जाते हैं।
जॉन्सन (Johnson) ने समाजशास्त्र को सामाकिज समूहों का अध्ययन माना है। आपके ही शब्दों में, “समाजशास्त्र सामाजिक समूहों का विज्ञान है। सामाजिक समूह सामाजिक अंतः क्रियाओं की ही एक व्यवस्था है।” आपकी मान्यता है कि समाजशास्त्र को सामाजिक संबंधों का अध्ययन कह देने से काम नहीं चलेगा और हम किसी निश्चित निष्कर्ष पर भी नहीं पहुंच सकेंगे। अतः समाजशास्त्र को सामाजिक समूहों का विज्ञान माना जाना चाहिए। सामाजिक समूहों का अर्थ जॉन्सन के अनुसार केवल व्यक्तियों के समूह से नही होकर व्यक्तियों के मध्य उत्पन्न होने वाली अन्तः क्रियाओं की व्यवस्था से है। विभिन्न व्यक्ति जब एक दूसरे के संपर्क में आते हैं तो उनमें सामाजिक अन्तः क्रियाओं की व्यवस्था से है। विभिन्न व्यक्ति जब एक दूसरे के संपर्क में आते हैं तो उनमें सामाजिक अन्तः क्रिया उत्पन्न होती है और इन्ही अन्त: क्रियाओं के आधार पर समूह बनते हैं। समाजशास्त्र सामाजिक अन्तः क्रियाओं के आधार पर बनने वाले ऐसे सामाजिक समूहों का अध्ययन ही है। जॉनसन ने समाजशास्त्र में उन्ही सामाजिक संबंधों को महत्व दिया है, जो सामाजिक अन्तः क्रियाओं के परिणामस्वरूप उत्पन्न होते हैं। आपने लिखा है- "समाजशास्त्र के अंतर्गत व्यक्तियों में हमारी रुचि केवल वहीं तक है जहां तक वे सामाजिक अन्तः क्रियाओं की व्यवस्था में भाग लेते हैं।” स्पष्ट है कि समूह के निर्माण में सामाजिक अन्त: क्रियाएँ आधार के रूप में हैं और इन्हीं के आधार पर बनने वाले सामाजिक समूहों का अध्ययन समाजशास्त्र में किया जाता है।
4. समाजशास्त्र सामाजिक अन्तःक्रियाओं के अध्ययन के रूप में
कुछ समाजशास्त्री विद्वान समाजशास्त्र को सामाजिक अन्तः क्रियाओं के अध्ययन के रूप में परिभाषित करते हैं। इनकी मान्यता है कि सामाजिक संबंधों की बजाय सामाजिक अंतःक्रियाएं समाज का वास्तविक आधार है। सामाजिक संबंधों की संख्या इतनी अधिक है कि उनका ठीक से अध्ययन किया जाना बहुत ही कठिन है। अत: समाजशास्त्र में सामाजिक अन्तः क्रियाओं का अध्ययन किया जाना चाहिए। अन्तः क्रिया का तात्पर्य दो या दो से अधिक व्यक्तियों या समूहों का जागरूक अवस्था में एक-दूसरे के सम्पर्क में में आना और एक दूसरे के व्यवहारों को प्रभावित करना है। सामाजिक संबंधों के निर्माण का आधार अन्तः क्रिया ही है। यही कारण है कि समाजशास्त्र को सामाजिक अन्तः क्रियाओं का विज्ञान माना गया है।
कुछ प्रमुख विद्वानों की परिभाषाएं इस प्रकार है गिलिन और गिलिन (Gillin and Gillin) के अनुसार, “व्यापक अर्थ में समाजशास्त्र व्यक्तियों के एक-दूसरे के संपर्क में आने के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाली अन्तः क्रियाओं का अध्ययन कहा जा सकता है।"
गिन्सबर्ग (Ginsberg) के अनुसार, “समाजशास्त्र मानवीय अन्तः क्रियाओं और अन्त: संबंधों, उनकी दशाओं और परिणामों का अध्ययन है।" जार्ज सिमेल (George Simmel) के अनुसार, “समाजशास्त्र मानवीय अन्तःसंबंधों के स्वरूपों का विज्ञान है।"
उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि समाजशास्त्र सामाजिक अन्त: क्रियाओं का विज्ञान है ।
कुछ प्रमुख पारंपरिक समाजशास्त्रियों की परिभाषाएँ इस प्रकार है
अगस्त कॉम्ट (Auguste Comte) के अनुसार, “समाजशास्त्र सामाजिक व्यवस्था और प्रगति का विज्ञान है।” आपकी इस परिभाषा के अनुसार समाजशास्त्र दो तथ्यों पर केंद्रित है -
1. व्यवस्था
2. प्रगति
कॉम्ट समाज को एक व्यवस्था के रूप में स्वीकार करते हैं। समाज के (मानव शरीर की तरह) भिन्न भिन्न अंग हैं। ये अंग एक दूसरे पर आश्रित हैं और परस्पर संबंधित हैं। ये अपने अनेक कार्यों के द्वारा परस्पर सामंजस्य करते हैं। समाज में दिखाई देने वाला यह सामंजस्य और इसके विभिन्न अंगों में पाया जाने वाला एक मत्य ही सामाजिक व्यवस्था है जिसका अध्ययन समाजशासत्र करता है। साथ ही समाजशास्त्र सामाजिक प्रगति का विज्ञान है। बौद्धिक और नैतिक विकास के आधार पर समाज के विभिन्न अंगों में जो निरन्तर परिवर्तन तथा संशोधन होता रहता है, उसी को कॉम्टे ने प्रगति कहा है।
इमाईल दुर्खीम, (Emile Durkheim) के अनुसार, “समाजशास्त्र सामूहिक प्रतिनिधि का विज्ञान है।" दुर्खीम के अनुसार समाज की कुछ सामूहिक शक्ति होती है जो समाज के अधिकांश लोगों के द्वारा मान्य होते हैं, जो पूरे समाज का नियमित और नियंत्रित करती है। ये सामूहिक शक्ति, विचार धारणाएँ, भावनाएँ प्रतीक आदि कुछ भी हो सकते हैं। इन्हीं का अध्ययन समाजशास्त्र करता है।
मैक्स वेबर (Max Weber) के अनुसार, “समाजशास्त्र वह विज्ञान है जो सामाजिक क्रिया व विश्लेषणात्मक बोध कराने का प्रयत्न करता है" आपके अनुसार सामाजिक क्रियाओं को समझे बिना समाजशास्त्र को समझना कठिन है। इसका कारण यह है कि जहां समाजशास्त्र में सामाजिक संबंधों एवं सामाजिक अन्त: क्रियाओं का विशेष महत्व है। वहां सामाजिक क्रियाओं को समझे बिना इन दोनों को नहीं समझा जा सकता। स्वयं अनतः क्रियाओं का निर्माण सामाजिक क्रियाओं से ही होता है। अत: मैक्स वेबर ने समाजशास्त्र में सामाजिक क्रियाओं को समझने पर विशेष जोर दिया है। समाजशास्त्र में सामाजिक क्रिया के अध्ययन को टालकट पारसन्स ने भी महत्वपूर्ण माना है। आपका मानना यह है कि सम्पूर्ण सामाजिक संरचना, सामाजिक संबंधों, समाज तथा सामाजिक व्यवस्था को 'क्रिया' की धारणा के माध्यम से ही समझा जा सकता है।
सोरोकिन (Sorokin) के अनुसार, समाजशास्त्र सामाजिक सांस्कृतिक प्रघटनाओं के सामान्य स्वरूपों, प्रकारों और अनेक अर्न्तसंबंधों का सामान्य विज्ञान है।" आपने अत्यन्त बताया है कि समाजशास्त्र समाज के उन पहलुओं का अध्ययन करता है जो आवर्तक (Recurrent) स्थायी और सार्वभौमिक है। जो प्रत्येक सामाजिक विज्ञान की विषय वस्तु से संबंधित है, किन्तु फिर भी कोई भी सामाजिक विज्ञान उनका विशेष रूप से अध्ययन नहीं करता।”
अपने व्यापक रूप में समाजशास्त्र समाज व्यवस्था का अध्ययन करने वाला विज्ञान है। समाज व्यवस्था में सामाजिक प्रक्रिया, सामाजिक संबंध, सामाजिक नियंत्रण, सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक संस्थाएं तथा इससे संबंधित प्रभाव एवं परिस्थितियां आती हैं। अन्य शब्दों में समाजशास्त्र वह विज्ञान है जो समाज व्यवस्था से संबंधित विभिन्न पक्षों का अध्ययन करता है।
उपर्युक्त सभी परिभाषाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि समाजशास्त्र सम्पूर्ण समाज का एक समग्र इकाई के रूप से अध्ययन करने वाला विज्ञान है। इसमें सामाजिक संबंधों का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। सामाजिक संबंधों को समझने की दृष्टि से सामाजिक क्रिया, सामाजिक अन्त: क्रिया एवं सामाजिक मूल्यों के अध्ययन पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
वार्तालाप में शामिल हों