आत्महत्या के निराकरण के उपाय ,आलोचना - Solutions to suicide, criticism

 आत्महत्या के निराकरण के उपाय ,आलोचना - Solutions to suicide, criticism

दुर्खीम का कहना है कि प्रत्येक समाज में आत्महत्या के तीनों प्रकारों में से कोई ना कोई हमेशा विद्यमान रहती है। यह सामूहिक विषाद को जन्म देती है, दुर्खीम का कहना है कि आत्महत्या सार्वभौमिक सर्वकालिक घटना होते हुए भी निरपेक्ष रूप से सामाजिक तथ्य नहीं कही जा सकती। वर्तमान समय में आत्महत्याओं की दर काफी बढ़ गई है और यह बढ़ती हुई दर हमारी चमक को नहीं सकट और अशांति की अवस्था को व्यक्त करती है। जिसके विकास के प्रति उदासीन नहीं रहा जा सकता। इस आधार पर दुर्खीम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कितुं वास्तव में यह एक व्याधकीय घटना है जो दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।

दुर्खीम ने इस घटना की विभीषिका से बचने के लिए कुछ उपाय भी बताए हैं, जैसे- शिक्षा, राजनीतिक समाज, धार्मिक समाज, संगठित परिवार, व्यवसाय, सामाजिक समूह, मधुर वैवाहिक संबंध, आदि के द्वारा आत्महत्या को कम किया जा सकता है।


आलोचना


आत्महत्या पर प्रस्तुत दुर्खीम की रचना सैद्धांतिक एवं पद्धतिशास्त्रीय मान्यताओं की अनुपम कृति है। एम. हैरलमबोस ने लिखा है कि “आत्महत्या का अध्ययन करके दुर्खीम ने आत्महत्या की समस्या के प्रति समाजशास्त्रियों का आकर्षण बढ़ा दिया।" मारिश हालबैकस ने 1930 में आत्महत्या का अध्ययन किया और दुर्खीम के इस सिद्धांत की प्रशंसा की इस सब के बावजूद दुर्खीम के आत्महत्या के सिद्धांत की अनेक समाजशास्त्रियों द्वारा आलोचना की गई है। समाजशास्त्री बोगार्ड्स लिखते हैं की आत्महत्याओं के पूर्व की व्याख्याओं को संशोधित करने के प्रयास में दुर्खीम सामाजिक कारकों को ही सबकुछ मान लेने की भूल कर बैठे दुखम ने सामाजिक तथ्य के अतिरिक्त अन्य कारकों के लिए कोई स्थान ही नहीं छोड़ा है।”


1. जे.पी. गिब्बस एवं डब्ल्यू. टी. मार्टिन ने यह तो स्वीकार किया है कि आत्महत्या का वैज्ञानिक अध्ययन होना चाहिए पर उन्होंने दुखम की आलोचना इस बात पर की कि उन्होंने एकीकरण एवं सुदृढ़ता की ठोस परिभाषा नहीं दी है।


2. डगलस के अनुसार अलग-अलग संस्कृतियों में आत्महत्या के अलग-अलग अर्थ हो सकते हैं।


3. फ्रांसीसी समाजशास्त्रीय ज्यॉ बैचलर के अनुसार अनेक व्यक्ति केवल नकारात्मक स्थिति से बचने के लिए आत्महत्या करते हैं। जैसे यदि भारत में देखा जाए तो किसान कर्ज न चुकाने पर भी आत्महत्या कर रहे हैं।


4. हेजेडार्न और लोबोविज के अनुसार अलग-अलग व्यवसाइयों में एक ही तरह की परिस्थितियां में आत्महत्या की दरें अलग-अलग हो सकती हैं।


5. जे. एम. एटकिंसन के अनुसार आत्महत्या का वस्तुनिष्ठ आकलन कठिन हैं।


6. स्टेनमेट्ज ने भी लिखा है “मैं जो आंकड़े एकत्रित करने में सफल हो पाया हूँ उनसे यह प्रतीत होता है कि सभ्य लोगों की अपेक्षा वन्य मनुष्यों में आत्महत्या की प्रवृत्ति अधिक है।


7. जिल बोर्ग ने लिखा है कि "आत्महत्या के सांख्यिकी आंकड़े जिस प्रकार आज उन्हें संकलित


किया जाता है, बहुत कम विश्वसनीय है अतः आत्महत्या जैसी प्रघटना की व्याख्या महज आंकड़ों के आधार पर करना उतना सरल नहीं प्रतीत होता जितना की दुर्खीम ने अनुभव किया था। 8. हैरी बार्न्स ने लिखा है कि “आत्महत्या के सिद्धांत में दुर्खीम ने व्यक्तिगत प्रेरणा तथा सांस्कृतिक कारकों को कोई महत्व नहीं दिया है जो व्यक्ति को आत्महत्या करने को प्रेरित करते हैं।"


9. दुर्खीम के आत्महत्या के सिद्धांत के प्रति यह कहा गया है कि दुर्खीम ने मानव की जैविकीय या व्यक्तिगत प्रेरणाओं की इतनी उपेक्षा की है कि उनकी विवेचना संदेहास्पद हो गई है। 


10. जॉर्ज सिंपसन ने लिखा है कि “दुर्खीम प्रेरणा विश्लेषण और संवेगात्मक जीवन की मौलिक विशेषताओं की व्याख्या से संबंधित आधुनिक विकास से अनभिज्ञ थे।” 


11. कोजर के अनुसार दुर्खीम ने आत्महत्या के लिए नियमहीनता या व्याधिकीय परिस्थितियों को महत्वपूर्ण माना है। अतः यहां पर प्रश्न उठता है कि यदि व्याधिकीय दशा ही आत्महत्या का कारण है तो इन दशाओं से प्रभावित सभी व्यक्ति आत्महत्या क्यों नहीं करते।


आत्महत्या के लिए मनोवैज्ञानिक एवं जैविकी कारक भी महत्वपूर्ण होते हैं पर दुर्खीम ने इन कारकों को कोई महत्व नहीं दिया। दुर्खीम ने अपने अध्ययन में समाज के नैतिक संरचना, समूहों के एकीकरण की मात्रा आदि ऐसी अवधारणाओं का प्रयोग किया है। जिनको क्षेत्रीय अध्ययन में मापना कठिन है।