स्पेंसर के आलोचना - Spencer's Criticism

स्पेंसर के आलोचना - Spencer's Criticism


आधुनिक समाजशास्त्रीय स्पेंसर द्वारा प्रस्तुत की गई व्याख्या को स्वीकार नहीं करते हैं। हालांकि प्राणी शास्त्रीय सिद्धांत के आधार पर लंबे समय तक व्यक्ति की समाज पर पूर्ण निर्भरता व्यक्त की जाती रही है। पर वर्तमान में यह सिद्धांत अप्रमाणिक एवं अवैज्ञानिक सिद्ध हो चुका है। जीव रचना और समाज रचना में कुछ ऐसे मौलिक अंतर है कि दोनों को समान नहीं माना जा सकता इसलिए स्पेंसर के इस सिद्धांत की निम्न आलोचना की गई है।


1. यह सत्य है कि समाज और शरीर दोनों का ही निर्माण अंगों के द्वारा होता है पर समाज के अंगों के कार्य स्पष्ट नहीं है तथा इस में परिवर्तन किया जा सकता है। जबकि शरीर के अंगों के कार्य स्पष्ट हैं, किंतु दूसरे अंगों के कार्यों को करने की क्षमता इन अंगों में नहीं होती। जैसे आंख का काम कान नहीं कर सकते।


2. समाज और व्यक्ति के बीच चेतनता की दृष्टि से भी अंतर है चेतन का संबंधी अंतर समाज और शरीर के मध्य पाए जाते हैं।


3. शरीर की चेतना का केंद्र बिंदु होता है, जबकि समाज की चेतना का कोई भी केंद्र बिंदु नहीं होता है।


4. शरीर की मृत्यु से चेतना समाप्त हो जाती है, जबकि समाज की चेतना का कभी भी अंत नहीं होता।


 5. इस सिद्धांत से समाजिक घटना की धारणा स्पष्ट होने की अपेक्षा और अधिक उलझ जाती है तथा जटिल प्रतीत होने लगती है। 


6. इस सिद्धांत के आधार पर समाज का वैज्ञानिक विश्लेषण नहीं किया जा सकता साथ ही सामान्यीकरण करना भी असंभव है।


7. इस सिद्धांत से समाज के लक्षण उसके क्रियात्मक संबंध भी स्पष्ट नहीं होते है।


8. स्पेंसर के सिद्धांत की आलोचना यह कह कर की जाती है कि उन्होंने अपने सिद्धांत में सावयव और समाज की भिन्नता का बृहद वर्णन नहीं किया है। क्योंकि उन्होंने जो भिन्नताएं इस सिद्धांत में बताई हैं उसके अतिरिक्त भी बहुत भिन्नताएं देखने को मिलती हैं जिसे स्पेंसर ने छोड़ दिया है।

जैसे अगस्त कॉम्ट के अनुसार सावयव का जीवन सीमित होता है जबकि समाज का असीमित।


9. मानव सभ्यता एवं समाज में कुछ समानताओं के आधार पर सादृश्य (Anology) को स्थापित करने का विचार उचित प्रतीत नहीं होता।


10. स्पेंसर ने अपने सिद्धांत में एक जगह व्यक्ति को सेल (Cell) तथा दूसरी जगह उसी व्यक्ति को समाज का एक अंग बताया है जबकि सेल (Cell) एवं पार्ट (Part) दोनों भिन्न चीजें हैं। इस अर्थ में उनकी सादृश्यता (Anology) दोषपूर्ण प्रतीत होती है। 


11. हरबर्ट स्पेंसर के सिद्धांत की चौथी आलोचना यह है कि उन्होंने समाज को एक व्यवस्था न मानकर एक अवयव की तरह माना है जो उचित प्रतीत नहीं होता। विल्फ्रेड परेटो और मैकाइवर के अनुसार समाज एक व्यवस्था है इसे अवयव की तरह मानना उचित नहीं है। मैकाइवर और पेज के अनुसार "यह कहना बड़ा भ्रामक है कि हम समाज के उसी तरह अंग है जिस प्रकार पत्तियां पेड़ों की होती है। या अवयव शरीर के होते हैं। इससे स्पष्ट है कि इस स्पेंसर का समाज को एक व्यवस्था न मानने संबंधी विचार दोषपूर्ण है।


12. हरबर्ट स्पेंसर ने अमूर्त संगठन एवं मूर्त तथ्य के बीच समानता को स्थापित करने का प्रयत्न किया है जो कि उचित नहीं है। समाज में मानव शरीर रचना को किसी भी प्रकार समान आधारों पर नहीं समझा जा सकता क्योंकि समाज एक अमूर्त संगठन है। शरीर रचना एक मूर्त तथ्य है।


13. हरबर्ट स्पेंसर ने सामाजिक सावयव सिद्धांत को मस्तिष्क का कीड़ा कहकर संबोधित किया है। टार्डे ने लिखा है कि शरीर सावयववाद मात्र दोषपूर्ण नहीं है, अपितु खतरनाक भी है, संभवत यह तात्विक चिंतन का सबसे बुरा प्रकार है।”


14. सोरोकिन ने हरबर्ट स्पेंसर के सावयव सिद्धांत की आलोचना करते हुए लिखा है कि सावयववाद की प्राणीशास्त्रीय परिपूर्णता का फार्मूला समाजशास्त्र में न तो संचरित किया जा सकता है और न ही समाज पर लागू होता है।


15. बार्न्स ने बड़े ही स्पष्ट शब्दों में कहा है कि हरबर्ट स्पेंसर का सामाजिक सावयव का सिद्धांत भले ही रुचिकर हो किंतु जब हम सबको सामाजिक प्रक्रियाओं के विश्लेषण की दृष्टि से देखते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है, इस सिद्धांत का कोई मूल्य नहीं है। 16. बोगार्डस ने हरबर्ट स्पेंसर के इस सिद्धांत की आलोचना करते हुए कहा कि स्पेंसर की शरीर रचना संबंधी अवधारणा से संबंधित तर्क उसके लिए समाजशास्त्रीय पतन के अलावा कुछ भी नहीं है।