स्पेंसर के विचारों पर प्रभाव - Spencer's influence on ideas

 स्पेंसर के विचारों पर प्रभाव - Spencer's influence on ideas


स्पेंसर का चिंतन अत्यंत ही जटिल है और उसे समझने के लिए स्पेंसर जैसी बहुमुखी प्रतिभा का होना भी आवश्यक है। यदि हम स्पेंसर के दर्शन को समझना चाहते हैं तो इसके लिए आवश्यकता है की स्पेंसर पर पड़ने वाले प्रभावों को समझ लिया जाए, स्पेंसर ने अपने समय के अनेक विद्वानों और उस समय की परिस्थितियों से प्रेरणा प्राप्त की और उन्हें एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया। स्पेंसर को निम्नलिखित विद्वानों ने प्रभावित किया


1. अगस्त कॉम्ट


स्पेंसर, कॉम्ट से बहुत अधिक प्रभावित थे। कॉम्ट को यदि समाजशास्त्र का पिता कहा जाता है तो स्पेंसर को समाजशास्त्र का अंग्रेज पिता के नाम से जाना जाता है। कॉम्ट ने सबसे पहले समाजशास्त्र के सिद्धांतों की व्याख्या की थी यदि हम स्पेंसर के समाजशास्त्र के सिद्धांत नामक ग्रंथ का अध्ययन करें तो हमें इस ग्रंथ पर कॉम्ट के विचारों की छाप स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

स्पेंसर पर कॉम्ट के कई विचारों का प्रभाव पड़ा है जिनमें से कुछ इस तरह है


1. अगस्त कॉम्ट का विचार था कि समस्त घटनाएं परस्पर अंतर संबंधित हैं। स्पेंसर ने अपनी पुस्तकों में ऐसा विचार व्यक्त किया की सभी घटनाएं संबंधित होती है।


 2. अगस्त कॉम्ट ने विज्ञानों का वर्गीकरण किया था और लिखा था कि सभी विज्ञान अंतः संबंधित है। स्पेंसर के अनुसार भी सभी विज्ञान अंतःसंबंधित है।


3. अगस्त कॉम्ट प्रत्यक्षवादी था और अवलोकन तथा वर्गीकरण को ज्ञान का आधार मानता था।


4. स्पेंसर ने भी इसी तरह के विचार व्यक्त किए और कहा कि विज्ञान को कार्य-कारण पर आधारित होना चाहिए।


5. कॉम्ट के अनुसार प्राकृतिक नियम अटल होते हैं। स्पेंसर ने भी इसी तरह के विचार व्यक्त किए हैं।


2. इंग्लैंड के सुधारवादी आंदोलन


स्पेंसर के विचारों को प्रभावित करने में इंग्लैंड की तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों का योगदान भी बहुत महत्वपूर्ण रहा है। जिस समय स्पेंसर के विचारों में परिपक्वता आ रही थी उस समय इंग्लैंड में सुधारवादी आंदोलन उग्र रूप में था। स्पेंसर के चाचा इस आंदोलन के समर्थक थे इसलिए स्पेंसर का इस आंदोलन से प्रभावित होना स्वाभाविक था। इस आंदोलन से प्रभावित होकर ही उन्होंने 'दी प्रॉपर स्फीयर आफ गवर्नमेंट' नामक एक निबंध लिखा था जो उनके नान करफर्स्ट में छपा था। इस सुधारवादी आंदोलन के अनेक विचारकों के विचार एवं उनके चिंतन का प्रभाव भी स्पेंसर के ऊपर पड़ा था। इनमें से कुछ प्रमुख इस तरह हैं। 


3. एडम स्मिथ


एडम स्मिथ मूल रूप से इंग्लैंड के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री थे। उनका जन्म 1723 में और मृत्यु 1790 में हुई थी । उन्होंने ‘वेल्थ ऑफ नेशन' (Wealth of Nations) नामक एक महत्वपूर्ण ग्रंथ की रचना की थी


और इस ग्रंथ में उन्होंने दो प्रमुख सिद्धांतों का प्रतिपादन किया था


1. व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सिद्धांत


2. व्यापार में अहस्तक्षेप का सिद्धांत


स्पेंसर एडम स्मिथ से बहुत अधिक प्रभावित थे इसलिए उन्होंने अपने सिद्धांतों में व्यक्तिवाद और अहस्तक्षेप के सिद्धांत को भी प्राथमिकता दी है। 


4. बेंथम


बेंथम इंग्लैंड का दूसरा विचारक था। जिसने की स्पेंसर को प्रभावित किया। बेंथम का जन्म 1728 मृत्यु 1832 में हुई थी। बेंथम सुखवादी दर्शन में विश्वास करता था। उसने लिखा था कि राज्य का कर्तव्य है कि वह अधिक से अधिक व्यक्तियों का कल्याण करें। बेंथम एक उपयोगितावादी सामाजिक विचारक था उसके विचारों ने भी स्पेंसर को बहुत अधिक प्रभावित भी किया था।


5. माल्थस


माल्थस इंग्लैंड का प्रसिद्ध जनसंख्याशास्त्री था। उसका जन्म 1766 में और मृत्यु 1834 में हुई थी। माल्थस ने जनसंख्या के सिद्धांत का प्रतिपादन किया था। इस सिद्धांत में माल्थस ने इस बात की पुष्टि की थी कि जनसंख्या और खाद्य वृद्धि मे समानता न होने से खाद्य सामग्री और जनसंख्या के बीच में सामाजिक असंतुलन पैदा हो जाता है। माल्थस ने अपने सिद्धांत के माध्यम से जनसंख्या के संबंध में एक निराशावादी दृष्टिकोण को अपनाया था। स्पेंसर माल्थस के सिद्धांत से बहुत अधिक प्रभावित थे पर उससे असहमत होते हुए उन्होंने लिखा था कि सभ्यता के विकास के साथ ही मानव की प्रजनन शक्ति कम होती जाएगी। इस प्रकार स्पेंसर के अनुसार जनसंख्या की वृद्धि का सिद्धांत आशावादी होना चाहिए। 


6. डार्विन


सामाजिक विकास के क्षेत्र में डार्विन का नाम हमेशा ऊंचे स्थान पर है। डार्विन का जन्म 1809 में और मृत्यु 1882 में हुआ था। डार्विन ने अपनी पुस्तक जाति वर्गों का जन्म' (Origin of Species) में लिखा है कि समाज का निरंतर विकास होता रहता है। सामाजिक उद्विकास की भांति ही प्राणियों का भी विकास हुआ है। स्पेंसर ने भी उद्विकास के सिद्धांत की विवेचना की है। उन्होंने अपने उद्विकास के सिद्धांतों को तीन भागों में विभाजित किया था---


1. प्राकृतिक उद्विकास


2. प्राणीशास्त्री उद्विकास


3. सामाजिक उद्विकास


7. कार्ल मार्क्स


मार्क्स का जन्म 1818 में जर्मनी में और मृत्यु 1883 में हुई थी। स्पेंसर के समय मार्क्स के साम्यवादी घोषणा पत्र की चर्चा हर जगह पर हो रही थी और स्पेंसर अपने विचारों को उनसे अछूता नहीं रख पाए थे। इसलिए उनके साम्यवादी घोषणापत्र का प्रभाव स्पेंसर के विचारों में देखने को मिलता है। 1.2.7 हरबर्ट स्पेंसर की प्रमुख रचनाएं (Important works of Herbert Spencer) हरबर्ट स्पेंसर ने अपने जीवन काल में सामाजिक विज्ञानों पर अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकें तथा लेख लिखें उनकी प्रमुख कृतियाँ इस प्रकार हैं


1. Social statics (1850) सामाजिक स्थितिशास्त्र


2. Synthetic philosophy ( 1859) समन्वयात्मक दर्शन


3. Frist principles (1863) प्रथम सिद्धांत


4. Principle of biology I (1864) जीव विज्ञान के सिद्धांत


5. Principle of biology II (1867) वजी विज्ञान के सिद्धांत 2


6. Principle of psychology-1 ( 1870) मनोविज्ञान के सिद्धांत


7. Principle of psychology II ( 1872) मनोविज्ञान के सिद्धांत 2


8. The study of sociology ( 1873) समाजशास्त्र का अध्ययन


9. Principle of sociology I (1876) समाजशास्त्र के सिद्धांत 1


10. Principle of sociology II (1879) समाजशास्त्र के सिद्धांत 2


11. Principle of sociology III ( 1896) समाजशास्त्र के सिद्धांत 3


12. Principle of ethics-I (1879) नीतिशास्त्र के सिद्धांत 1


13. Principle of ethics-II ( 1893) नीतिशास्त्र के सिद्धांत 2


14. Descriptive Sociology विवरणात्मक समाजशास्त्र


15. Article and editing लेख एवं संपादन


सामाजिक स्थितिशास्त्र Social statics (1850) इस ग्रंथ का प्रकाशन 1850 में हुआ था। यह स्पेंसर की पहली रचना है। इस ग्रंथ के प्रकाशन के समय स्पेंसर की आयु मात्र 30 वर्ष की थी। इस ग्रंथ में स्पेंसर ने जिन सिद्धांतों को प्रतिपादित किया है, उन्हे दो भागों में विभाजित किया जा सकता है


• इस पुस्तक के प्रथम भाग में स्पेंसर ने मानव और समाज के संबंधों का विश्लेषण किया है।


दूसरे भाग में स्पेंसर ने समाज के विकास की उपकल्पना की थी। इसलिए यह रचना उद्विकास की व्याख्या करने वाली प्रथम रचना मानी जाती है। इसके प्रकाशन के 9 वर्ष बाद 1859 में डार्विन ने अपने विकासवादी सिद्धांत की व्याख्या की थी।


समन्वयात्मक दर्शन synthetic philosophy (1859) सामाजिक स्थितिशास्त्र के प्रकाशन के 9 वर्ष बाद 1859 में स्पेंसर ने अपनी दूसरे ग्रंथ समन्वयात्मक दर्शन का प्रकाशन किया। इस पुस्तक में उन्होंने एक योजना बनाई थी। जिसमें उद्विकास की सार्वभौमिकता पर बल दिया गया था। यह पुस्तक 10 भागों में विभक्त है और इसकी रचना 1859 से 1898 के बीच की थी।


प्रथम सिद्धांत first principles (1863) स्पेंसर के इस ग्रंथ की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार है- स्पेंसर ने समन्वयात्मक दर्शन नामक ग्रंथ के जिन 10 भागों का प्रकाशन किया था। उनमें यह पहला है इसलिए स्पेंसर ने इसका नाम प्रथम सिद्धांत रखा। इसका प्रकाशन 1863 में हुआ था। इसमें वैज्ञानिक ज्ञान के तीन तत्वों की विवेचना की गई थी

 1. पदार्थ (Matter)


2.गति ( Motion)


3. शक्ति (Force)


•जीव विज्ञान के सिद्धांत principle of biology I (1864) यह ग्रंथ भी समन्वयात्मक दर्शन का ही एक भाग है। यह ग्रंथ भी दो भागों में विभक्त है इसमें पहले भाग का प्रकाशन 1864 में और दूसरे भाग का प्रकाशन 1867 में हुआ था। इस ग्रंथ में स्पेंसर ने प्राणीशास्त्रीय उद्विकास के सिद्धांत की व्याख्या की थी। मनोविज्ञान के सिद्धांत principle of psychology-I (1870)- इस ग्रंथ की रचना स्पेंसर ने समाज के विकास को मनोवैज्ञानिक आधार पर समझाने के प्रयास के रूप में की थी। यह ग्रंथ भी समन्वयात्मक दर्शन का ही भाग है। यह ग्रंथ दो भागों में विभक्त है। इसके पहले भाग का प्रकाशन 1870 में और दूसरे भाग का प्रकाशन 1872 में हुआ था। समाजशास्त्र का अध्ययन The study of sociology ( 1873)- इसका प्रकाशन 1873 में हुआ था। यह ग्रंथ समन्वयात्मक दर्शन की योजना से अलग करके लिखा गया था। समाजशास्त्र के क्षेत्र में स्पेंसर की इस कृति का योगदान अत्यधिक महत्वपूर्ण है।


समाजशास्त्र के सिद्धांत principle of sociology (1876)- यह ग्रंथ भी समन्वयात्मक दर्शन की योजना का एक भाग है। यह ग्रंथ तीन भागों में प्रकाशित हुआ। इसके प्रथम भाग का प्रकाशन 1876 में दूसरे भाग का प्रकाशन 1879 और तीसरे भाग का प्रकाशन 1896 में हुआ था। इस ग्रंथ के अंतिम भाग से जिसका प्रकाशन 1896 में हुआ था स्पेंसर के समन्वयात्मक दर्शन की योजना समाप्त हो जाती है। इस ग्रंथ में स्पेंसर ने समाजशास्त्र के सिद्धातों की व्याख्या की है। के


नीतिशास्त्र के सिद्धांत principle of ethics (1879)- यह ग्रंथ भी समन्वयात्मक दर्शन की योजना का एक भाग है। इसका प्रकाशन भी दो भागों में हुआ है। इसके प्रथम भाग का प्रकाशन 1879 मे और दूसरे भाग का प्रकाशन 1893 में हुआ था। इस ग्रंथ में स्पेंसर ने नीतिशास्त्र पर भी विकासवादी सिद्धांत लागू किया है। विवरणात्मक समाजशास्त्र Descriptive Sociology उपरोक्त पुस्तकों के अतिरिक्त आप के निर्देशन में Descriptive Sociology के नाम से 8 विस्तृत एटलस का भी प्रकाशन किया गया जिसमें हरबर्ट स्पेंसर के


अनेक लेख प्रकाशित हुए। लेख एवं सम्पादन Article and editing स्पेंसर का पहला लेख 1842 में नॉनकन्फरमिस्ट में प्रकाशित हुआ था साथ ही उन्होने “इकोनोमिस्ट” साप्ताहिक पत्रिका मे संपादकीय का कार्य भी किया था।