स्पेंसर का उद्विकास का सिद्धांत - Spencer's Theory of Evolution
स्पेंसर का उद्विकास का सिद्धांत - Spencer's Theory of Evolution
डार्विन के उद्विकासीय सिद्धांत को समाज पर लागू करने का श्रेय अंग्रेज समाजशास्त्री हरबर्ट स्पेंसर को हैं। उन्होंने अपनी पुस्तक प्रिंसिपल ऑफ सोशियोलॉजी में समाज और में सादृश्यता स्थापित करके सामाजिक उद्विकास की अवधारणा को जन्म दिया था। हरबर्ट स्पेंसर ने सामाजिक उद्विकास के सिद्धांत को एक विशिष्ट रुप में प्रस्तुत किया है। स्पेंसर के सामाजिक उद्विकास के सिद्धांत को समझने के लिए उसके भौतिक उद्विकास का सिद्धांत एवं जीवशास्त्र के सिद्धांत को समझना होगा।
भौतिक विकास का सिद्धांत
भौतिक विकास के सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए स्पेंसर ने दो भागों में बांटा है
1. अज्ञेय (Unknowable)
2. ज्ञेय ( Knowable)
स्पेंसर के अनुसार जो ज्ञान से परे हैं वह अज्ञेय (Unknowable) है। अज्ञेय का संबंध धर्म से है। उसका विषय आत्मा परमात्मा है। विज्ञान का इस से कोई संबंध नहीं इसलिए मनुष्य का ज्ञान उस क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर पाता है। अतः हम उस क्षेत्र को छोड़ देते हैं। विज्ञान का संबंध ज्ञेय (Knowable) से है। इसका काम उन विषयों को खोजना है। जो हमारे ज्ञान की सीमा में आते हैं। इसलिए हम उसे ही खोजने का प्रयास करते हैं। इसके द्वारा विश्व के पदार्थों की उत्पत्ति तथा विकास के नियमों एवं सिद्धांतों को ज्ञात किया जाता है।
स्पेंसर के अनुसार जो सिद्धांत भौतिक जगत के विकास पर लागू होते हैं, वही नियम सामाजिक विकास पर भी लागू होते हैं। इसलिए सामाजिक विकास को जानने के लिए भौतिक विकास के नियमों को जानना आवश्यक है। स्पेंसर ने इस नियम का विस्तृत वर्णन अपनी पुस्तक 'फर्स्ट प्रिंसिपल' (First Principle) में किया है। स्पेंसर के अनुसार बौद्धिक विकास को समझने के लिए भौतिक जगत के कारणों को जानना आवश्यक है।
स्पेंसर कहता है कि प्रत्येक विचारक कारणों की खोज करता है और उसे ज्ञात होता है. कि भौतिक विकास का मूल कारण शक्ति (Force) है। शक्ति का अपना क्या रूप है। यह हम नहीं जानते क्योंकि शक्ति अज्ञेय है। पर शक्ति के दो रूप हैं जो ज्ञेय है। यह है पदार्थ (Matter) एवं गति (Motion ( स्पेंसर के अनुसार इसी आदिशक्ति के क्रियाशील हो जाने पर पदार्थ एवं गति के माध्यम से विकास होता है। के इस भौतिक विकास की प्रक्रिया के तीन बुनियादी नियम हैं
1. शक्ति के स्थायित्व का नियम (Law of persistence of Force)
शक्ति का यह बुनियादी नियम है कि यह कारणों का आदि कारण है। शक्ति में स्थायित्व रहता है। स्थायित्व का अर्थ है कि इसकी मात्रा घटती-बढ़ती नहीं है। यह केवल विकास का कारण है। इसलिए विकास होने पर इसके स्थायित्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
2. पदार्थ की अविनाशिता का नियम (Law of Indestructibility of Matter)
भौतिक विकास को समझाने के लिए स्पेंसर ने पदार्थ की अविनाशिता का दूसरा बुनियादी नियम प्रस्तुत किया। इस नियम के अनुसार पदार्थ का विनाश नहीं होता क्योंकि पदार्थ स्वयं शक्ति का एक पहलू है। पदार्थ को हम स्थाई तो नहीं कह सकते क्योंकि उसका रूप समयसमय पर बदलता रहता है। पदार्थ का स्थायित्व इसी बात में है कि वह नष्ट नहीं होता पर विकास की प्रक्रिया में आकर परिवर्तित हो जाता है। पदार्थ के रूप में परिवर्तन करने से ही विकास की प्रक्रिया चलती है।
3. गति की निरंतरता का नियम (Law continuity of motion)
भौतिक विकास का तीसरा बुनियादी नियम गति से संबंधित है। पदार्थ की तरह गति का भी कभी विनाश नहीं होता, गति रूप बदलती रहती है। गति में भी स्थिरता का नियम काम करता है। स्थिरता का अर्थ है कि विकास की प्रक्रिया में आकर गति परिवर्तित होती है, रूप बदलती है, पर नष्ट नहीं होती।
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