उद्विकास के चरण - Stages of Social Evolution

 उद्विकास के चरण - Stages of Social Evolution


समाजशास्त्रियों ने सामाजिक उद्विकास केविभिन्न चरणों का वर्णन किया है। इन समाजशास्त्रियों केअनुसार मानव समाज सभ्यता और संस्कृति के उद्विकास को एक सामान्य क्रमिक योजना में देखा जा सकता है। अगस्त कॉम्ट, हरबर्ट स्पेंसर, दुर्खीम, मार्क्स, वेब्लेन आदि विद्वान इस श्रेणी के अंतर्गत आते हैं इनमें से कुछ के द्वारा बताए गए विकास के चरण इस प्रकार हैं


1. अगस्त कॉम्ट ने सभ्यता एवं सामाजिक विकास के क्षेत्र को तीन स्तरों में विभक्त किया है


A. धार्मिक अवस्था (Theological Stage) 


B. तात्विक अवस्था (Mataphysical Stage )


C. वैज्ञानिक अवस्था (Positive Stage)


कॉम्ट के अनुसार अपने प्रारंभिक समय में समाज धार्मिक स्तर पर था। सामाजिक क्रियाएं धर्म की परिधि पर केंद्रित होती थी। विकास के दूसरे स्तर में समाज दार्शनिक विचारों से युक्त था। दार्शनिक विचारधारा और भौतिक संस्कृति का विकास इस युग की विशेषता थी।

सामाजिक उद्विकास के अंतर्गत विकास की तीसरी अवस्था है वैज्ञानिक अवस्था। इस अवस्था में समाज में विज्ञान का बोलबाला है। समाज के सदस्य हर बात को वैज्ञानिक तर्कों के बाद ही स्वीकार करते हैं। इस प्रकार सामाजिक उद्विकास के तीन स्तर धार्मिक तात्विक और वैज्ञानिक है।


2. मुर्डोक (Murdock) जो कि एक अमेरिकन मानवशास्त्री हैं ने 1965 में 915 विद्यमान समाजों के अध्ययन के आधार पर सामाजिक व्यवस्था के विभिन्न स्वरूपों का वर्णन किया है। इसमें सरल से सरल लघु समुदायों से लेकर उन्नत व जटिल समाज भी सम्मिलित थे। इन समाजों के वर्गीकरण के अध्ययन से समाज के प्रकार व समाज में इनके उद्विकास का भी अनुमान हो जाता है।


3. भारतीय समाजशास्त्री श्यामाचरण दुबे ने भी सामाजिक संरचनाओं के संभावित उद्विकास के चरणों की रूपरेखा प्रस्तुत की है। जो निम्नलिखित इस प्रकार हैं


1. सरल शिकारी एवं खाद्यान्न संग्राहक समाज


श्यामाचरण दुबे के अनुसार सरल शिकारीएवं खाद्यान्न संग्राहक समाज सामाजिक संरचना का सबसे पहला स्वरुप है। इस तरह का समाज आज से 35000 वर्ष पूर्व विद्यमान थे। इनके यंत्र बड़े सीधे-साधे और अपरिपक्व रूप में थे।

2. उन्नत शिकारी एवं खाद्य संग्राहक समाज


यह विकास के दूसरे चरण को प्रकट करता है। इसमें उन्नत यंत्र एवं हथियार विकसित हो गए थे जैसे धनुष-बाण आदि आज भी ऐसे समाज विश्व के अनेक भागों में पाए जाते हैं। एसदुबे .सी. ने बागवानी समाज को भी दो भागों में बांटा है। सरल बागवानी समाज और उन्नत बागवानी समाजा सरल बागवानी समाजों


में उन समाजों को रखा है। जिन्होंने की प्रारंभ में ही पेड़ पौधों को लगाना सीख लिया था परंतु वह उन्नत औजारों आदि का उपयोग नहीं करते थे दूसरी श्रेणी में उन बागवानी समाज को रखा गया है जो उन्नत औजारों का प्रयोग कर रहे थे।


3. इसके बाद तीसरे क्रम में कृषक समाजों का स्थान होता है। इन कृषक समाज को भी बागवानी समाज की भांति यांत्रिकी विकास के बाद में सरल एवं उन्नत समाज में रखा सकता है।

4. चौथे क्रम में औद्योगिक समाजों का उदय हुआ। ये उन्नत विज्ञान, तकनीकी, यंत्र एवं नए शक्ति के साधनों के उपयोग पर आधारित हैं। ये समाज विकास के क्रम में बाद में विकसित हुए हैं। इसी युग में कृषि एवं उद्योगों का यंत्रीकरण एवं औद्योगिकरण हुआ। यातायात एवं संचार के साधनों का विकास हुआ और इस विकास ने विश्व को ही एक नए समुदाय और बाजार के रूप में परिवर्तित कर दिया औद्योगिक समाज के विकास का चरम बिंदु अणु ऊर्जा एवं इलेक्ट्रॉनिक्स के रूप में देखा जा रहा है। डेनियल बेल तथा टॉफलर जैसे विचारको का मत है कि मानव समाज उत्तरोत्तर समाज के रूप में


विकसित होता जा रहा है। इसलिए हम दुबे के सामाजिक उद्विकास की उपर्युक्त योजना में एक और चरण जोड़ सकते हैं

और वह होगा उद्योगोत्तर समाजा यह समाज नवीन संभावनाओं को प्रकट कर रहा है और इससे सामाजिक जीवन में नवीन परिवर्तनों की आहट होने लगी है।

उद्विकास ही क्रम के संबंध में हम निम्न बातों पर ध्यान दे सकते हैं -


1. सामाजिक विकास के चरण सार्वभौमिक या अवश्यंभावी नहीं है। कोई भी समाज किसी विकास के क्रम पर रुक गया है। तो कोई किसी अन्य चरण पर


2. यह भी आवश्यक नहीं है कि एक समाज विकास के एक चरण से दूसरे चरण में होकर ही अंतिम चरण में 


3. ये चरण सामाजिक संरचनाओं के आदर्श प्रारूपों को बताते हैं। वास्तविक समाज मिश्रित प्रकृति के भी हो पहुंचा होगा। उदाहरण के तौर पर हम भारतीय समाज को उद्योगोन्मुख कृषक समाज कह सकते हैं।