आदर्श प्रारूप की संरचना - Structur of Ideal Type
आदर्श प्रारूप की संरचना - Structur of Ideal Type
आदर्श स्वरुप किसी भी समाज को बनी बनाई नहीं मिलती, बल्कि अनुसंधानकर्ता को इसका निर्माण करना पड़ता है। सामान्यतः अनुसंधान के समाप्त हो जाने के बाद किसी भी आदर्श प्रारूप का भी समय या जीवन काल समाप्त हो जाता है। मार्टिन डेल ने किसी भी आदर्श प्रारूप के निर्माण के दो प्रमुख आधार बताए हैं
1. वस्तुनिष्ठता की संभावना (Objective possibility)
2. पर्याप्त कार्य कारण संबंध (Adeauate Causation)
1. वस्तुनिष्ठता की संभावना
किसी भी विषय को आदर्श प्रारूप की श्रेणी में रखने से पहले यह देखना आवश्यक होता है कि उसके बारे में अनुसंधानकर्ता को पूर्ण वैज्ञानिक ज्ञान है या नहीं। इसका मतलब यह हुआ कि आदर्श प्रारूप का अध्ययन वस्तुनिष्ठ पद्धति से किए जाने की संभावना होती है।
2. पर्याप्त कार्य कारण संबंध
जब अनुसंधानकर्ता किसी भी घटना का अध्ययन करने के लिए विषय का चुनाव करता है तो उसे यह देखना आवश्यक है की घटना में जो तथ्य सम्मिलित है वे तार्किक रूप से बिखरे हुए ना हो। घटना के बीच कार्य कारण संबंध अनिवार्य रूप से स्पष्ट होना चाहिए क्योंकि कार्य-कारण संबंधों का प्रत्यक्ष प्रभाव अनुसंधान के परिणामों पर पड़ता है।
समाज वैज्ञानिक अपनी आवश्यकता के अनुसार सामान्य प्रघटना के भिन्न-भिन्न आदर्श प्रारूपों का निर्माण कर सकते हैं। आदर्श प्रारूप की अवधारणा की भूमिका को बौद्धिकता की दृष्टि से दो स्तरों पर देखा जा सकता है
1. अनुसंधान के स्तर पर आदर्श प्रारूप की रचना बौद्धिकता के आधार पर अनुसंधान के स्तर पर की जा सकती है।
2. वर्णनात्मक स्तर पर आदर्श प्रारूप वास्तविकता को यथावत हमारे सामने प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि वह स्पष्टता और सूक्ष्मता के आधार पर वर्णात्मक रूप में इसे प्रस्तुत करता है।
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