संस्कृति की संरचना व उपादान -Structure and ingredients of culture

 संस्कृति की संरचना व उपादान -Structure and ingredients of culture


संस्कृति अपने आप में एक समगेर अवधारणा है। लेकिन संस्कृति का निर्माण उसके विभिन्न निर्माणकारी अंगों के पारस्परिक संगठन व सम्बन्धों से होता है, जो निम्नलिखित है:


1- सांस्कृतिक तत्व,


2- सांस्कृतिक संकुल, 


3- सांस्कृतिक प्रतिमान


4- सांस्कृतिक क्षेत्र


1. सांस्कृतिक तत्व:


सांस्कृतिक तत्व संस्कृति की सबसे छोटी व परिभावित इकाई है जिसका आगे विभाजन नहीं किया जा सकता है। क्योंकि और अधिक विभाजन से यह अपना मूल अर्थ खो देती है।

सांस्कृतिक तत्व की तुलना, किसी भौतिक पदार्थ की सूक्ष्मतम इकाई परमाणु' तथा मानव शरीर की सूक्षतम इकाई कोशिका' से की जा सकती है। जो अर्थपूर्ण एवं अविमान्य है। 

सांस्कृतिक तत्व को हम निम्नलिखित परिभाषाओं के माध्यम से और अधिक स्पष्ट तरीके से समझ सकते हैं- 

क्रोबर सांस्कृतिक तत्व संस्कृति का अल्पतम परिभावित तत्व है।” 


जबकि डॉ.एस.सी.दूबे लिखते हैं कि सांस्कृतिक तत्वों को हम संस्कृति के गठन की सरलतम व्यवहारिक इकाईयाँ मान सकते हैं।" 


हर्षकोविट्स इसको एक निर्दिष्ट संस्कृति में पहचानी जा सकने वाली सबसे छोटी इकाई माना। 


जेकब्स तथा स्टर्न के अनुसार, “सांस्कृतिक तत्व संस्कृति का वह अविष्कृित तथा हस्तान्तरित इकाईयाँ हैं जिनको विवरण तथा सैद्धान्तिक अध्ययन के लिए विभिन्न भागों में विभाजित नहीं किया जा सकता है।"


इस प्रकार सांस्कृतिक तत्वों की परिभाषाओं की विवेचना व अध्ययन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सांस्कृतिक तत्व संस्कृति की सूक्ष्तम, अर्थपूर्ण तथा अविभाज्य इकाई है। जिस प्रकार संस्कृति के भौतिक एवं अभौतिक पक्ष होते है, वैसे ही सांस्कृतिक तत्व के भी भौतिक एवं अभौतिक पक्ष है जैसे भौतिक पक्ष में पेन, रेडियो, पंखा, साइकिल आदि। यहाँ यदि साइकिल का विभाजन कर उसकी चैन या हैण्डिल को निकाने पर साइकिल अर्थपूर्ण नहीं रह जायेगी ऐसा ही पेन और रेडियों के साथ भी है। ऐसे ही सांस्कृतिक तत्वों के अभौतिक पक्षों में, हाथ मिलाना, गले लगाना, मूर्तियों पर गंगाजल छिड़कना, कोई शब्द, संकेत आदि है। किसी संस्कृति के अर्थ एवं विशेषता को पूर्णरूप से समझने के लिए उसके सांस्कृतिक तत्वों को समझना आवश्यक शर्त है। अतः इन विवेचनाओं के आधार पर हमं सांस्कृतिक तत्वों की निम्नलिखित विशेषताएं देखने को मिलती हैं - 


(i) प्रत्येक सांस्कृतिक तत्वों की उत्पत्ति का एक इतिहास होता है। चाहे छोटा या बड़ा हो। 


(ii) गतिशीलता सांस्कृतिक त्व की विशेषता है, यह संस्कृति की भाँति स्थिर नहीं होते। कभी-कभी सांस्कृतिक तत्वों में परिवर्तन संस्कृतियों में भी परिवर्तन ला देते हैं।


(iii) सांस्कृतिक तत्व स्वतंत्र नहीं रहते वरन् अन्य तत्वों के साथ संयुक्त होकर रहते हैं। अनेक सांस्कृतिक तत्वों का अध्ययन संस्कृति के अध्ययन को अर्थपूर्ण बनाता है। क्रोबर तथा टायलर जैसे विद्वानों ने संस्कृति का अध्ययन सांस्कृतिक तत्वों के माध्यम से ही किया है।


2. संस्कृति संकुल:


संस्कृति संकुल का निर्माण विभिन्न सांस्कृतिक तत्वों के अर्थपूर्ण संयोजन से होता है। जैसे विभिन्न कोशिकाओं से शरीर का निर्माण होता है, कई परिवारों के संयोजन से समाज व समुदाय का निर्माण होता है वैसे ही कई सांस्कृतिक तत्वों के संयोजन से संस्कृति संकुल का निर्माण होता है।

दाबेक के अनुसार संस्कृति संकुल परस्पर घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित प्रतिमानों का एक जाल है।" डा0 एस0सी0 दूबे ने संस्कृति संकुल को परिभाषित करते हुये लिखा है कि, “संस्कृति संकुल, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि समान धर्मों एवं पूरक संस्कृति-संकुल, सांस्कृतिक तत्वों का वह समग्र समूह है जो इनके अर्थपूर्ण ढंग से परस्पर संगठित होने से बनता है। इस प्रकार जब सांस्कृतिक तत्व परस्पर अर्थपूर्ण ढंग से जुड़ कर मानव आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं तो हम उसे संस्कृति संकुल कहते है। जैसे किसी मूर्ति के सम्मुख झुकना उस पर जल छिड़कना, प्रसाद चढ़ाना, दीपक जलाना तथा आरती करना आदि सांस्कृतिक तत्व मिलकर धार्मिक संस्कृति संकुल का निर्माण करते हैं। ऐसी ही किसी खेल संस्कृति संकुल के अन्तर्गत, गेंद, स्टिक, रेफरी की सीटी, खिलाड़ी की पोशाक खेल के विभिन्न नियम आदि सांस्कृतिक तत्व आते है। गिडिंग्स ने संस्कृति संकुल को संस्कृतिक तत्वों का प्रकार्यात्म सम्मिलन कहा है। संस्कृति संकुल में सांस्कृतिक तत्व परस्पर प्रकार्यात्मक क्रिया करते हुये एक विशिष्ट प्रकार के व्यवहार प्रतिमान जन्म देते हैं।

संस्कृति तत्वों एवं संकुलों से मिलकर ही संस्कृति विशेष का जन्म होता है। पारसन्स ने प्युबलो इण्डियनों के धार्मिक अनुष्ठानों और वेनेडिक्ट ने उत्तरी अमेरिका मे संरक्षक प्रेताम के चारों ओर केन्द्रित अनुष्ठानों और विश्वासों के संकुलों का अध्ययन किया। 


3. संस्कृति प्रतिमान:


जब सांस्कृतिक तत्व एवं संकुल मिलकर प्रकार्यात्मक भूमिकाओं में परस्पर सम्बन्धित हो जाते हैं तो उसे संस्कृति प्रतिमान कहते हैं। संस्कृति प्रतिमान की अवधारणा का विकास रूथ वेनीडिक्ट ने अपनी पुस्तक पैटर्न आफ कल्चर में दिया और कहा कि, “सांस्कृति प्रतिमान, एक संस्कृति तत्वों की वह डिजाइन है जो कि उस समाज के व्यक्तिगत व्यवहार प्रतिमान के माध्यम से व्यक्त होता हुआ जीवन के इस तरीके को सम्बद्धता, निरन्तरता एवं विशिष्टा प्रदान करता है।

“वेनेडिक्ट के अनुसार संस्कृति प्रतिमान आदर्श एवं प्रेरक सिद्धांत जिसे सभी लोग स्वीकार करते है जो मानव व्यवहार को निर्देशित एवं निर्धारित करती है। उदाहरण के लिए प्युबलो इण्डियन लोगों की संस्कृत सुव्यवस्था, अनुशासन तथा व्यक्तिगत दिखावें पर जोर देती है। जबकि डोबू संस्कृति के लोग शंकालु, धोखेबाज व संघर्षशील प्रकृति के होते हैं। इसका कारण उनका संस्कृति प्रतिमान है। सदरलैण्ड एवं वुडवर्ड के शब्दों में, “सम्पूर्ण संस्कृति के एक प्रकार का समान्यीकृत चित्र के रूप में संकुलों का एक संग्रह संस्कृति प्रतिमान है।" क्लार्क विसलर ने 9 आधार मूलक सांस्कृतिकतत्वों का उल्लेख किया जो संस्कृति प्रतिमानों का निर्माण करती है। जबकि किम्बल यंग ने 13 तत्वों को सार्वभौमिक में सम्मिलित किया।