सामाजिक वर्गों की संरचना - structure of social classes
सामाजिक वर्गों की संरचना - structure of social classes
भारतीय समाजों में प्राचीन काल से ही संस्तरण पाया जाता रहा है तथा इसे वर्ण व्यवस्था के नाम से जाना जाता था। इसमें कुल चार वर्ण पाये जाते थे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र। विद्वानों का मत है कि कालांतर में यही वर्ण व्यवस्था का रूपान्तरण जाति व्यवस्था के रूप में हो गया तथा वर्ण व्यवस्था के दौरान जो निर्धारण कर्म के आधार होता है, वह जाति व्यवस्था में जन्म आधारित हो गया। भारतीय समाज संभवतः अंग्रेजों के आगमन पर ही वर्ग व्यवस्था से रूबरू हुआ। इसके पश्चात औद्योगीकरण, मशीनीकरण, नगरीकरण तथा अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक, आर्थिक व राजनीतिक परिवर्तनों ने एक स्पष्ट वर्ग व्यवस्था को भारत में अपने पैर जमाने हेतु स्पष्ट पृष्ठभूमि प्रदान की। हालांकि भारत में वर्गों के रूपान्तरण को ईसा के 600 वर्षों पूर्व आर्यों तथा अनार्यों के सांस्कृतिक मिश्रण के दौरान माना जाता है।
यदि भारतीय समाज में सामाजिक वर्गों की संरचना के बारे में विश्लेषण प्रस्तुत किया जाय तो यह स्पष्ट होगा कि यहाँ वर्ग संरचना की घनिष्ठता जातीय संस्तरण के साथ सम्बद्ध है। प्राचीन काल में भारतीय समाजों में वर्ग संरचना के आधारों के रूप में अनेक कारक विद्यमान थे, जैसे संपत्ति पर आधिपत्य, बाजार, शक्ति आदि। अंग्रेजों के आगमन तथा आर्थिक राजनीतिक नीतियों ने भारत में जमीदारी तथा जागीरदारी व्यवस्था को पैदा किया। इस व्यवस्था ने वर्गों को दो प्रमुख भागों में विभाजित कर दिया – पहला, जमीदार तथा भूस्वामी वर्ग और दूसरा, जोतकर तथा कृषक वर्ग। इसी प्रकार से रैयतवाड़ी व्यवस्था ने भी दो वर्गों को पैदा किया पहला वर्ग रैयत भूस्वामियों का तथा दूसरा वर्ग रैयत कृषकों का।
अंग्रेजी शासन की समाप्ती तथा स्वतंत्र भारत में जमीदारी प्रथा के उन्मूलन तथा भूमि सुधार के कार्यों ने ग्रामीण क्षेत्रों में वर्ग संरचना को प्रभावित किया।
जमीदारी तथा सामंतवादी व्यवस्था का अंत हुआ तथा मालिक-मजदूर के संबंध भी परिवर्तित हुए। इन परिवर्तनों ने वर्ग संरचना को पूरी तरह से परिवर्तित कर दिया। इसे हम स्पष्ट तौर पर एक पैराडाइम शिफ्ट की संज्ञा दे सकते हैं। परिणामस्वरूप भूमि पट्टे के रूप में दी जाने लगी तथा कृषि मजदूरों द्वारा कृष्य कार्य कराये जाने लगे। इसके अलावा एक नए मध्य कृषक वर्ग का उदय हुआ जो वास्तव में पूर्व के जमीदारों व सामंतों का है।
कई स्थानों पर भू-सुधारों को लेकर कृषक सम्बन्धों में तनाव भी उत्पन्न हुये। एस. खुसरो ने आंध्र प्रदेश का अध्ययन किया और बताया कि इन क्षेत्रों में भूमि सुधार कानून के पारित होने पश्चात स्वयं की भूमि पर कृषि करने वाले किसानों की संख्या में वृद्धि हुआ है तथा साझेदारी प्रणाली से कृषि करवाने वाले जोतकरों को विभिन्न प्रकार की आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ा।
जमींदारी प्रथा के उन्मूलन तथा भूमि सुधार के क़ानूनों द्वारा कृषक वर्ग संरचना में होने वाले प्रमुख परिवर्तनों को पी.सी. जोशी ने चिन्हित किया है, वे परिवर्तन इस प्रकार हैं -
1) सामंतवादी एवं परंपरागत जोत व्यवस्था समाप्त हुआ तथा इसके स्थान पर अधिक शोषणकारी असुरक्षित पट्टेकारी व्यवस्था पैदा हुई।
2) सामंतवादी भूस्वामियों की समाप्ती तथा उनके स्थान पर नए व्यापारिक भूस्वामियों का जन्म हुआ। ये भूस्वामी कृषि कार्यों के लिए नवीन तकनीकों के प्रयोग में सक्षम तथा सहज हैं और ये कृषि को एक व्यवसाय/व्यापार के रूप में समझते हैं।
3) इन संरचनात्मक परिवर्तनों के परिणामस्वरूप कई स्थानों पर गरीब कृषकों तथा कृषि मजदूरों द्वारा विरोध और संघर्ष किए गए तथा इसने देश में तनाव की स्थिति पैदा की।
इसी तरह से के.एल. शर्मा ने अपने राजस्थान के छः गावों के अध्ययन के आधार पर स्पष्ट किया कि इन नई भूमि नीतियों ने पूर्व के भूस्वामियों की सामाजिक स्थिति को परिवर्तित किया है तथा यह परिवर्तन उनकी वर्गीय प्रस्थिति की गिरावट के रूप में हुआ है। वे भूस्वामियों की वर्गीय प्रस्थिति में गिरावट प्रक्रिया को में 'प्रोलेटेरियनाईजेशन' कहते हैं। वहीं दूसरी तरह एक नवीन बुर्जुआ वर्ग का जन्म हुआ है तथा यह वर्ग सम्पन्न कृषकों का है। इस प्रकार से समाज में कई वर्ग दिखाई देते हैं, जैसे- भूतपूर्व भूस्वामियों का वर्ग, व्यापारियों का वर्ग, कृषकों का वर्ग, कृषि मजदूरों का वर्ग आदि।
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