धर्म के समाजशास्त्र की विषय-वस्तु , धर्म के प्रकार - Subject matter of the sociology of religion , types of religion

 धर्म के समाजशास्त्र की विषय-वस्तु , धर्म के प्रकार - Subject matter of the sociology of religion , types of religion


धर्म का समाजशास्त्र में किसी भी धर्म के दर्शन और उसके सत्व का अध्ययन नहीं किया जाता है। • यदि कोई समाजशास्त्री इस तरह का प्रयास करता है तो उससे इस क्षेत्र में दक्ष होना चाहिए जो कि सामान्यता उनमें नहीं होता। क्योंकि हर धर्म में कुछ घटनाएं होती हैं, कुछ विशेषताएं होती हैं इनका अध्ययन समाजशास्त्र में समाजशास्त्री के द्वारा नहीं किया जाता। उदाहरण के लिए हिंदू धर्म में एक पुनर्जन्म का सिद्धांत है और यह पूरा दर्शन है और समाज शास्त्री इसके अध्ययन पर ध्यान नहीं देता। धर्म से उत्पन्न या धर्म जनित अंतर क्रियाओं एवं व्यवहार ओं का अध्ययन धर्म का समाजशास्त्र करता है। जुलियेन फ्रेड ने वेबर की धर्म के समाजशास्त्र की व्याख्या अधित रूप से की है जब कोई धर्मावलंबी किसी धर्म के संदर्भ में अर्थ पूर्ण व्यवहार करता है

तो उसका अध्ययन समाजशास्त्र के अंतर्गत आता है। यह समाजशास्त्री का काम नहीं है कि वह किसी धार्मिक संप्रदाय के धर्म संबंधी दर्शन का उसकी वैधता और उपयोगिता का अध्ययन करें। धर्म का समाजशास्त्र निश्चित रूप से धार्मिक व्यवहार को मनुष्य की लौकिक गतिविधि के रूप में अध्ययन करता है इस तरह की गतिविधि का रुझान या झुकाव धर्म के प्रति होता है।


वेबर के अनुसार “धार्मिक व्यवहार या अंतः क्रिया का प्रभाव नैतिकता, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था पर भी पड़ता है। यही नहीं धार्मिक व्यवहार का प्रभाव हमें सामाजिक संघर्षों में भी देखने को मिलता है। धर्म का समाजशास्त्रीय अध्ययन इस प्रकार आर्थिक और राजनीतिक अध्ययन भी बन जाता है और विशेषकर के नैतिक अध्ययन। मैक्स वेबर के धर्म के अध्ययनों का प्रारंभ आर्थिक अंतर क्रियाओं के अध्ययन से होता है उन्होंने धर्म के समाजशास्त्र को अपने जीवन में अंतिम वर्षों में अत्याधिक प्राथमिकता दी वेबर ने प्राथमिक रूप से यह देखने का प्रयास किया कि धार्मिक व्यवहार का प्रभाव आचार और अर्थव्यवस्था पर कितना और किस तरह से पड़ता है।

मैक्स बेवर यह भी मानते हैं कि धर्म और जादुई व्यवहार में तार्किकता होती है और ऐसा व्यवहार धार्मिक व्यवहार के अंतर्गत आता है।


धर्म के प्रकार (Types of Religion)


यह निश्चित करने के बाद की धर्म का दर्शन या उसका सत्व धार्मिक व्यवहार से भिन्न है वेबर ने धार्मिक व्यवहारों का संबंध धार्मिक प्रकारों से किया है धार्मिक व्यावहारों को लौकिक और पारलौकिक व्यवहार के रूप में देखा जाता। वेबर ने ने धर्म से जुड़े हुए दो प्रकारों का उल्लेख किया है


1. विश्वास मूलक धर्म या मुक्ति धर्म (Religion of Conviction or Salvation) - धर्म व्यक्ति के व्यवहार से जुड़े होते हैं और व्यक्ति का व्यवहार धर्म के समाजशास्त्र की विषय वस्तु है। जब मोक्ष प्राप्ति के लिए व्यक्ति गतिविधियां करता है तब उसकी भावनाएं पवित्र और द होती है जिसके कारण व तपस्या करते हैं ऐसी स्थिति में वह केवल पवित्र कानून का ही पालन नहीं करता है बल्कि अपनी द धारणा के कारण वह यह सब कार्य करता है। वह कई कर्मकांड करता है जैसे व्रत, उपवास, एक पैर पर खड़े होकर पूजा करना आदि और उसे विश्वास रहता है कि उसके द्वारा किए गए कार्य उसे मोक्ष दिलाएंगे। इस तरह विभिन्न धर्म के समर्थकों की क्रिया के मोक्ष से जुड़ी होती है और उनका व्यवहार नीतिशास्त्रीय हो जाता है। मैक्स वेवर का कहना है कि मोक्ष मार्गीय धर्म के समर्थक तीन प्रकार की क्रियाओं को करते हैं.


1. मुक्ति मार्ग के समर्थक विशुद्ध रूप से कर्मकांडीय क्रिया या अनुष्ठान को करते हैं जिससे उनका व्यक्तिगत करिश्मा और रहस्य बढ़ जाता है।


2. यह समर्थक ऐसे सामाजिक कार्य करते हैं जिससे उनकी प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है जैसे समाज के प्रत्येक व्यक्ति के साथ भाईचारे का व्यवहार रखना और नीतिपरक व्यवहार करना और सभी व्यक्ति को सामान्य दृष्टि से देखना।


3. अपने आप को पूर्ण बनाने का प्रयास करना पूर्णता की प्राप्ति का यह प्रयास उनको मोक्ष के निकट ले जाता है।


इस तरह बेवर का कहना है कि मोक्ष प्राप्त करने वाले व्यक्ति अपने आप को मध्यम स्थिति में मानते हैं यह सामान्य जीवन से उठे होते हैं असाधारण धार्मिक जीवन से नीचे होते है। हालांकि यह सही है कि मुक्ति धर्म किसी को मोक्ष प्राप्ति नहीं दे पाता ऐसे व्यक्ति अपने आप को करिश्माई या रहस्य पूर्ण जरूर बना लेते हैं।


धर्म का समाजशास्त्र मोक्ष प्राप्त करने के लिए व्यक्तियों के द्वारा जो क्रिया की जाती है उनका नैतिकता राजनीति और अर्थ पर क्या प्रभाव पड़ता है, का अध्ययन करता है।


2. कर्मकांड से जुड़ा धर्म- यह धर्म का दूसरा प्रकार है इस धर्म में धर्म का समर्थक कर्म कांडी होता है। इस का सबसे अच्छा उदाहरण चीन के कन्फ्यूशियस धर्म और यहूदी बाद में देखने को मिलता है। यह धर्म ऐसे हैं जो एक संप्रदाय की तरह स्थापित है और इनकी विश्वास और धारणाएं रुढीगत है इनके लिए धर्म के जो भी नियम है वह पवित्र है इन धर्मों में परंपराओं का दबाव इतना अधिक होता है कि इनके समर्थक की नैतिकता केवल धार्मिक व्यवहार तक ही सीमित हो जाती है। धार्मिक क्षेत्र के बाहर नैतिक व्यवहार को ताक पर रख देते हैं। इन लोगों लिए दुनिया का अर्थ द्वितीयक हो जाता है और कर्मकांड प्राथमिक होता है यह धर्म के रहस्यवाद को भूल जाते हैं ये धार्मिक संस्कारों को केवल संस्कार ही मानते हैं।