सामाजिक समूह की सैद्धांतिक अवधारणा - Theoretical Concept of Social Group
सामाजिक समूह की सैद्धांतिक अवधारणा - Theoretical Concept of Social Group
सामाजिक समूह की आवधारणा को स्पस्ट करते हुए गिडिंग्स ने जान-पहचान अथवा पारस्परिक जागरूकता पर आधारित अंतःक्रिया को महत्वपूर्ण मन। उनके विचार के विश्लेषण में आगवर्न निफकाफ का कहना है कि जब कभी दो या दो से अधिक व्यक्ति एकत्रित होते हैं और एक-दूसरे पर प्रभाव डालते है तो वे एक सामाजिक समूह का निर्माण करते हैं। इस प्रकार उन्होंने भी दूसरों के व्यवहार को प्रभावित करने वाली सामाजिक क्रिया को सामाजिक समूह का आधार स्वीकार किया है। उनके इस विचार को मकाइवर एवं पेज ने भी स्वीकार किया है, किन्तु इस विचार से मर्टन सहमती व्यक्त नही करते क्योंकि उनका मानना है कि इन विचारों से यह स्पष्ट नहीं होता कि किन प्रकार के सामाजिक संबंधों से समूह विकसित नहीं होते। अतः उन्होंने समूह निर्माण के लिए उसके सदस्यों के मध्य अंतःक्रिया एवं सामाजिक संबंधों में बारंबारता तथा तथा स्तायित्व को आवश्यक माना, किन्तु साथ ही वह यह भी स्वीकार करते है कि छोटे समूहों में सदस्यों के मध्य यह अंतःक्रिया अथवा सामाजिक संबंध तो स्पष्ट तौर पर परिभाषित होते हैं किन्तु कुछ बड़े सन्दर्भ में यह स्पष्ट नहीं होता। इसलिए उन्होंने सामाजिक समूहों के निर्धारण हेतु दो महत्वपूर्ण पक्षों की भी चर्चा की है:
1. व्यक्तिपरक पक्ष (Subjective View) : इसका अर्थ यह है कि स्वयं समूह के सदस्यों में इस तथ्य का ज्ञान होना चाहिए कि वह उस विशिष्ट समूह का सदस्य है।
2. वस्तुपरक पक्ष (Objective View): इसके अनुसार उस विशिष्ट समूह के अन्य सदस्यों के अतिरिक्त दूसरे लोग भी इस तथ्य को स्वीकार करें कि वह व्यक्ति उस विशिष्ट समूह का सदस्य है।
इस प्रकार मर्टन ने सामाजिक समूह के निर्माण के लिए निम्न तथ्यों को स्वीकार किया :
i. कम से कम दो या दो से अधिक व्यक्तियों का होना,
ii. कुछ हद तक बारंबारता पर आधारित अंतःक्रिया तथा उससे निर्मित स्थायी संबंध
iii. वह व्यक्ति स्वयं को उस निश्चित समूह का सदस्य माने तथा अन्य लोग भी उसे इस रूप में स्वीकार करें।
जॉनसन ने मर्टन द्वारा प्रस्तुत विचारों को तो स्वीकार किया किन्तु साथ ही उन्होंने एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष की ओर ध्यान आकर्षित किया। उनका कहना है कि समूह निर्माण हेतु उसके सदस्यों के मध्य अंतःक्रिया का स्वरुप सहयोगात्मक होना भी आवश्यक है क्योंकि अंतःक्रिया और उस पर आधारित संबंध नकारात्मक भी हो सकते हैं। जैसे दो राष्ट्रों की युद्धरत सेनाएं लम्बे समय तक अंतःक्रिया में व्यस्त हो सकती है किन्तु क्रिया के नकारात्मक होने के कारण समूहों का निर्माण नही हो सकता।
बोगार्डस ने भी सामाजिक समूह के सन्दर्भ में मर्टन के विचारों से सहमति व्यक्त की। उनके अनुसार सामाजिक समूह के विकास हेतु यह आवश्यक है कि व्यक्ति स्वयं उस समूह की सदस्यता के प्रति जागरुक हो तथा साथ ही वह उस समूह के प्रतीकों, नियमों, तथा मानदण्डों के प्रति जागरूकता प्रदर्शित करे।
हार्टन एवं हंट ने समूह निर्माण के लिए कहा है कि व्यक्तियों में एक प्रकार की ऐसी भावना मिलती है कि वे अन्तः क्रिया द्वारा समूह का निर्माण करते हैं। इस भावना को समाज की अवधारणा के विश्लेषण के क्रम में गिडिंग्स ने सदृश्यता की चेतना कहा है। समानता की इस चेतना को स्वीकार कर सिमेल ने भी समान हितों को समूह निर्माण का मुख्य आधार कहा है।
इन विचारों से यह स्पष्ट है कि समाज में जितने मानवीय समूह दिखाई देते हैं उन सभी को सामाजिक समूह में व्यक्तियों के बीच विचार हित अथवा स्वार्थ की प्रायः समानता होती है, साथ ही इसके सदस्यों के मध्य नियमित अंतःक्रिया तथा सामाजिक संबंध मिलते हैं जिससे सामाजिक समूह के सदस्य परस्पर एक-दूसरे को प्रभावित करने में सक्षम होते हैं।
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