समाजशास्त्र का सैद्धांतिक विभाजन - Theoretical Division of Sociology
समाजशास्त्र का सैद्धांतिक विभाजन - Theoretical Division of Sociology
1980 के दशक से पहले अमेरिका के समाजशास्त्र में माइक्रो व मैक्रो को लेकर दो धड़ उभर कर आये एक माइक्रो सिद्धांत की श्रेणी में आते हैं। दूसरे मैक्रो सिद्धान्तों की श्रेणी में। इन दोनों के एकीकरण का प्रयास भी किया गये। जिसे टर्नर मेसो सिद्धान्तीकरण कहते है यद्यपि इन दोनों के बीच स्पष्ट रेखा खींचना कठिन है लेकिन अमेरिका में ये समाजशास्त्र के उदय को समझने हेतु माइक्रो व मैक्रो दोनों के सिद्धांत को समझना आवश्यक हो जाता है इनकी संक्षेप में व्याख्या निम्नलिखित है।
मैक्रो / वृहत्/स्थूल समाजशास्त्र
वृहत् समाजशास्त्र में सामाजिक व्यवस्थाओं तथा इन व्यवस्थाओं के आन्तरिक एवं इनके परस्पर निर्भर संबंधो का अध्ययन किया जाता है। मोटे रूप में, स्थूल समाजशास्त्र अपना ध्यान भूमंडलीय एवं ऐतिहासिक प्रक्रियाओं पर केन्द्रित करता है। आधुनिक वैश्वीकरण की प्रक्रिया का अध्ययन इसका एक उदाहरण है। यह उपागम व्यक्तियों की क्रियाओं या लघु समूहों के अध्ययन के विपरीत बड़े सामाजिक संगठनों जैसे सम्पूर्ण समुदाय, समाज, सैनिक संगठन, नगर आदि के विश्लेषण पर बल देता है। इसमें ऐसे सामान्य नियमों की खोज करने का प्रयास किया जाता है जो सम्पूर्ण मानव समाज पर लागू होते हों। मैक्रो सिद्धांतवेत्ताओं का अध्ययन, भूभाग, समय संख्या तीनों दृष्टि से विस्तृत होता है। सामान्यतया मैक्रो समाज वैज्ञानिक, ऐतिहासिक और आनुभविक विधि का प्रयोग कर निगमनात्मक सिद्धान्तों की रचना करते हैं। प्रकार्यवाद व प्रणाली सिद्धांत मैक्रो समाजशास्त्र के ही कुछ उदाहरण है। अमेरिका में मर्टन पारसन्स ऐसे ही विद्वान है जो इस परंपरा के प्रणेता रहे हैं।
माइक्रो समाजशास्त्र
सूक्ष्म समाजशास्त्र के अध्ययन का केन्द्र बिन्दु अन्तर्क्रिया व इनकी अर्थ संरचना है। सूक्ष्म समाजशास्त्र के अनुसरणकर्ता विद्वान समाज की बुनियादी इकाई व्यक्ति और उसकी क्रियाओं को मानते है। अतः व्यक्तियों की आमने सामने की सामाजिक अन्तर्क्रियाओं का अध्ययन ही सूक्ष्म समाजशास्त्रियों का प्रमुख विषय है। माइक्रो सिद्धांतकार लघु समुदायों के अध्ययन द्वारा वृहत् समाजो को समझने का प्रयास करते हैं। सूक्ष्म उपागम के अध्ययनकर्ता मनोवैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग करके आगमनात्मक नियमों की रचना करते है। मीड ब्लूमर होम्स, शूटस, गोफमेन, गारफिंकल आदि विद्वानों ने इसी परंपरा का अनुसरण करते हुए सांकेतिक अन्तर्क्रियावाद, संरचनात्मक प्रकार्यवाद, विनिमय सिद्धांत, एथनोमेथडोलॉजी फिनोमेनोलॉजी जैसे नये-नये परिप्रेक्ष्यों को जन्म दिया है
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