श्रम विभाजन का सिद्धांत -Theory of Division of Labour

 श्रम विभाजन का सिद्धांत -Theory of Division of Labour

दुर्खीम द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों में श्रम विभाजन का सिद्धांत एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। दुर्खीम ने 1893 में फ्रेंच भाषा में अपनी पहली कृति 'De La Division Du Travail Social' (Social Division of Labour) नाम से प्रकाशित की। यह दुर्खीम की प्रथम रचना थी और यही उनकी प्रसिद्धि की दृढ़ आधारशिला थी। यह पुस्तक उनका शोध ग्रंथ है जो उन्होंने प्रमुख रूप से डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त करने के लिए लिखा था। इसी ग्रंथ पर 1893 में पेरिस विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टरेट की डिग्री प्रदान की थी। इस पुस्तक में उनके द्वारा प्रतिपादित मान्यताओं एवं सिद्धांतों के अंकुर स्पष्ट रूप से दिखाई देते है यह ग्रंथ उनके महत्वपूर्ण समाजशास्त्रीय सिद्धांतों और उनकी पद्धतिशास्त्र की आधारशिला के रूप में स्वीकार की जा सकती है।

इस महान ग्रंथ में दुर्खीम ने श्रम विभाजन के सिद्धांत को प्रस्तुत किया हैं। 1933 में उनकी इस पुस्तक का अंग्रेजी में अनुवाद किया गया। दुर्खीम की यह पुस्तक सामान्य जीवन के तथ्यों का वैज्ञानिक विधि द्वारा विश्लेषण करने का प्रथम प्रयास था। इस पुस्तक को लिखने की प्रेरणा आपको अर्थशास्त्री एडम स्मिथ के विचारों से मिली। सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री एडम स्मिथ ने जब श्रम विभाजन के बारे में अपने विचार प्रस्तुत किए तो दुखम का ध्यान इस तरफ गया। एडम स्मिथ ने श्रम विभाजन का कारण आर्थिक घटना बताया था और उसके दो परिणाम बताएं, क्रमश: उत्पादन में वृद्धि एवं वस्तुओं की श्रेणी में श्रेष्ठता। दुर्खीम ने श्रम विभाजन को एक सामाजिक तत्व के रूप में देखते हुए उसके प्रमुख सामाजिक परिणाम समाज में एकता बनाए रखने' पर बल दिया।