प्रकृतिवाद का सिद्धांत -Theory of Naturism
प्रकृतिवाद का सिद्धांत -Theory of Naturism
इस सिद्धांत के प्रतिपादक मैक्समूलर हैं। उन्होंने धर्म की उत्पत्ति का आधार प्रकृति को माना है। मैक्समूलर ने वेदों के आधार पर इस सिद्धांत को स्पष्ट किया है। मैक्समूलर ने उन अनुभूतियों की व्याख्या की है जिससे धर्म की उत्पत्ति हुई है। मैक्समूलर के अनुसार धर्म को यदि हमारी चेतना वैध तत्व के रूप में स्थान प्राप्त करना है तो इसे अन्य समस्त ज्ञान की भांति इंद्रियात्मक अनुभव से प्रारंभ होना चाहिए। मैक्समूलर की विचारधारा के अनुसार मनुष्य के सामने सबसे पहली वास्तविकता प्रकृति के रूप में प्रकट हुई। इसलिए उनके अनुसार धर्म की उत्पत्ति प्राकृतिक शक्तियों के भय के कारण हुई। आंधी, तूफान, भूकंप, बिजली का चमकना, सूर्य, चंद्रमा, सितारे आदि को देखकर मनुष्य के मन में भय उत्पन्न हुआ।
वह आश्चर्यचकित होकर उन्हें देखता रहा और उनसे प्रभावित होता रहा। निरंतर प्रभावित होने के कारण उनसे डरने लगा। इससे उसके मन में श्रद्धा भक्ति के साथ-साथ भय उत्पन्न हुआ और उसने प्रकृति की पूजा प्रारंभ की। जिससे धर्म की उत्पत्ति हुई। प्रकृति के तत्व बार-बार प्रकट होने के कारण प्राकृतिक और स्वाभाविक कहलाए।
मैक्समूलर के शब्दों में प्रकृति का ऐसा कोई पक्ष नहीं है जो हमारे मन में एक अनंत की यह अनुभूति जगाने के योग्य नहीं है जो हमारे चारों ओर व्याप्त है और हम पर शासन करता है।” दुर्खीम धर्म की उत्पत्ति के दोनों सिद्धांतों का सरलता से खंडन करते हैं।
इन दोनों सिद्धांतों को धर्म के प्रारंभिक स्वरूप स्वीकार नहीं करते क्योंकि यह सिद्धांत केवल भाषा विज्ञान के नियमों पर आधारित हैं। जिनकी वैधता अभी भी पूर्ण रूप से प्रमाणित नहीं है। इस तरह दुर्खीम इन सिद्धांतो को अत्यंत संकुचित मानते हैं। इस सिद्धांत में धर्म के केवल एक पक्ष, प्राकृतिक पक्ष पर अधिक बल दिया गया है। इसके दूसरे पक्ष पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया गया क्योंकि धर्म की उत्पत्ति का कोई सामाजिक कारण न हो यह असंभव है। दुर्खीम के अनुसार प्रकृतिवाद पवित्र एवं साधारण की भी व्याख्या नहीं करता हैं।
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