प्रत्यक्षवाद का सिद्धांत , प्रत्यक्षवाद का अर्थ - Theory of Positivism Meaning of Positivism

 प्रत्यक्षवाद का सिद्धांत , प्रत्यक्षवाद का अर्थ - Theory of Positivism Meaning of Positivism

प्रत्यक्षवाद 17 एवं 18वीं शताब्दी में विकसित एक वैज्ञानिक पद्धति है। इसकी उत्पत्ति वैज्ञानिक एवं यथार्थवादी चिंतन के आधार पर हुई। 19वीं शताब्दी तक यह विधि अन्य सामाजिक विज्ञानों में भी अपनाई जाने लगी थी। इस पद्धति के द्वारा यथार्थ का ज्ञान हो सकता है। इस विधि के द्वारा प्राकृतिक नियमों की तरह ऐतिहासिक और सामाजिक नियमों की व्याख्या की जाती है। कॉम्ट के समाजशास्त्री चिंतन में भी कॉम्ट के प्रत्यक्षवादी दर्शन का प्रवेश हो गया था। कॉम्ट को प्रत्यक्षवाद का जनक कहा जाता है। प्रत्यक्षवाद की विस्तृत व्याख्या कॉम्ट के दो प्रसिद्ध ग्रंथों 'द 'कोर्स ऑफ पॉजिटिव फिलॉसफी' (Course of Positive Philosophy) और दूसरा 'सिस्टम ऑफ पॉजिटिव पॉलिटी' (System of Positive Polity) में मिलती है

पहले ग्रंथ में कॉम्ट ने प्रत्यक्षवाद के सैद्धांतिक स्वरूप की व्याख्या की है। दूसरे ग्रंथ में कॉम्ट प्रत्यक्षवाद के व्यावहारिक रूप पर प्रकाश डालते हैं। कॉम्ट के अनुसार प्रत्यक्षवाद का अर्थ वैज्ञानिक है और विज्ञान में कल्पना का कोई स्थान नहीं होता।

यह निरीक्षण, परीक्षण, प्रयोग एवं वर्गीकरण की एक व्यवस्थित कार्यप्रणाली होती है। वैज्ञानिक प्रणाली द्वारा यह समझना ही प्रत्यक्षवाद है और यही कॉम्ट की विचारधारा का आधार है। बाद में यही कॉम्ट का धर्म बन जाता है। अगस्त कॉम्ट का प्रत्यक्षवाद एक ऐसी जटिल अवधारणा है। जिसका न तो कोई निश्चित अर्थ है और न ही कोई निश्चित प्रणाली।


प्रत्यक्षवाद का अर्थ


अगस्त कॉम्ट प्रत्यक्षवाद के जन्मदाता हैं। उन्होंने समाजशास्त्र की व्याख्या एक प्रत्यक्षवादी समाज विज्ञान के रूप में की तथा प्रत्यक्षवाद की धारणा को अनेक रूपों में व्यक्त किया। प्रत्यक्षवाद का अर्थ है विज्ञानवाद। इस अर्थ के अनुसार संपूर्ण ब्रह्मांड अपरिवर्तनीय प्राकृतिक नियमों के द्वारा संचालित होता है। इस संसार को समझने के लिए धार्मिक एवं तार्किक विश्लेषण कारगर नहीं हो सकते। इसका विश्लेषण तो केवल वैज्ञानिक विधियों के द्वारा ही हो सकता है। कॉम्ट के अलावा भी समाजशास्त्र के बहुत से संस्थापकों का विश्वास था कि मानव समाज का अध्ययन उन्हीं सिद्धांतों और पद्धतियों के आधार पर किया जा सकता है।

जैसा की प्राकृतिक विज्ञान के अध्ययन में किया जाता है। इसी पद्धति या उपागम को प्रत्यक्षवाद के नाम से जाना जाता है।


अगस्त कॉम्ट जिन्होंने की समाजशास्त्र शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया और जो इस विज्ञान के जन्मदाता माने जाते हैं की मान्यता थी कि यदि प्राकृतिक विज्ञानों की पद्धतियों को काम में लिया जाए तो समाज का सकारात्मक विज्ञान उत्पन्न हो जाएगा। समाज के उद्विकास को भी इन्हीं नियमों के आधार पर समझा जा सकेगा प्राकृतिक विज्ञान में पदार्थ के व्यवहार को कारण और प्रभाव के आधार पर समझा जा सकता है। उसी प्रकार मानव के व्यवहार को भी कारण एवं प्रभाव अर्थात कार्य-कारण संबंध के आधार पर समझा जा सकता है। समाजशास्त्र में प्रत्यक्षवादी उपागम इन मान्यताओं को लेकर चलता है। मनुष्य का व्यवहार पदार्थ के व्यवहार के सामान वैषयिकता के साथ मापा जा सकता है। जिस प्रकार पदार्थ के व्यवहार को वजन तापमान दबाव आदि के आधार पर नापते हैं। उसी प्रकार मनुष्य के व्यवहार को नापने के लिए भी वैसे ही पद्धतियों का विकास किया जा सकता है। व्यवहार की व्याख्या करने के लिए उसका मापन अति आवश्यक है।

इसलिए प्रत्यक्षवाद में उस व्यवहार पर विशेष बल दिया जाता है जिसे प्रत्यक्ष रूप से अवलोकित किया जा सके। प्रत्यक्षवादी अवलोकित किए जाने वाले तथ्यों पर इस कारण से बल देते हैं कि मानव व्यवहार की व्याख्या उसी तरीके से की जाए जिस तरह से की प्राकृतिक विज्ञान में पदार्थ के व्यवहार की व्याख्या की जाती है।


प्रत्यक्षवादियों की स्पष्ट मान्यता है कि मानव व्यवहार का एक विज्ञान संभव है और समाजशास्त्र को भौतिकशास्त्र, रसायनशास्त्र तथा जीवशास्त्र के समान वैज्ञानिक स्थिति प्राप्त करने का भी पूरा अधिकार है। अगस्त कॉम्ट की मान्यता है कि सामाजिक जगत का व्यवहार उन्हीं नियमों के आधार पर निर्देशित होता है। जिन आधारों पर प्राकृतिक जगत का व्यवहार निर्देशित होता है। हालांकि कुछ समाजशास्त्री मानते हैं कि विज्ञानों की पद्धति मानव व्यवहार के अध्ययन के लिए उपयुक्त नहीं है। इसलिए वे समाजशास्त्र के विज्ञान होने में शंका व्यक्त करते हैं। इसके बावजूद अधिकांश समाजशास्त्री सामाजिक अनुसंधान में प्राकृतिक विज्ञानों की शोध पद्धतियों का ही उपयोग करते हैं। इसलिए मानव समाज के अध्ययन के लिए प्रयोग की जाने वाली इस पद्धति या उपागम को प्रत्यक्षवाद के नाम से पुकारा जाता है।


अगस्त कॉम्ट को प्रत्यक्षवाद का संस्थापक माना जाता है। प्रत्यक्षवाद के आधार पर कॉम्ट ने अनेक अवधारणाओं को जन्म दिया है किंतु कॉम्ट ने कहीं भी प्रत्यक्षवाद की सुनिश्चित एवं स्पष्ट व्याख्या नहीं दी है।

उन्होंने प्रत्यक्षवाद की अवधारणाओं का उल्लेख अपनी दोनों रचनाओं 'पॉजिटिव फिलॉसफी एवं ‘पॉजिटिव पॉलिटी' में किया हैं। पॉजिटिव फिलॉसफी में उन्होंने प्रत्यक्षवाद की सैद्धांतिक व्याख्या की है तथा पॉजिटिव पॉलिटी में प्रत्यक्षवाद की व्यावहारिक व्याख्या की है।


अगस्त कॉम्ट प्रत्यक्षवाद को वैज्ञानिक बताते हैं। इसका तात्पर्य है कि प्रत्यक्षवाद और विज्ञान का अर्थ एक है। अतः जो वैज्ञानिक है वही प्रत्यक्षवादी भी है। कॉम्ट के अनुसार यदि हमें प्रकृति एवं ब्रह्मांड की घटनाओं को समझना है तो उसकी व्याख्या धार्मिक, तात्विक, एवं आलौकिक आधार पर नहीं बल्कि वैज्ञानिक विधि के आधार पर करनी होगी। वैज्ञानिक विधि में कल्पनाओं का सहारा नहीं लिया जाता है और घटनाओं की व्याख्या निरीक्षण, परीक्षण, प्रयोग एवं वर्गीकरण के आधार पर की जाती है।

कॉम्ट के प्रत्यक्षवाद का अर्थ वैज्ञानिक ज्ञान और वैज्ञानिक पद्धति से है। वैज्ञानिक पद्धति का आधार अनुभव निरीक्षण परीक्षण प्रयोग और वर्गीकरण है। विज्ञानों में घटनाओं का अध्ययन वैज्ञानिक विधियों के द्वारा किया जाता है। उसी तरह सामाजिक घटनाओं के अध्ययन में भी वैज्ञानिक विधि का प्रयोग करना प्रत्यक्षवाद कहलाता है। सामाजिक घटना आकस्मिक नहीं होती हैं और उनका संचालन भी कुछ निश्चित सिद्धांत और नियमों के आधार पर ही होता है। इसलिए हम सामाजिक घटनाओं के कारणों की खोज वैज्ञानिक विधि के द्वारा ही कर सकते हैं।

अगस्त कॉम्ट का प्रत्यक्षवाद में कल्पना का कोई अंश नहीं है।

अभी तक मानव जाति धार्मिक और तत्व दार्शनिक चिंतन के आधीन रही है। हमें उसे इस विचारधारा से मुक्ति दिलाने के लिए वैज्ञानिक ज्ञान एवं विधि का सहारा लेना होगा। जिसके आधार पर घटनाओं के बारे में तथ्यात्मक जानकारी प्राप्त की जा सके। प्रत्यक्षवाद के आधार पर सामाजिक घटनाओं की व्याख्या कैसे की जाती है? इसका प्रमुख उदाहरण देते हुए ब्रिजेस ने समझाया है कि मान लो एक व्यक्ति जहर खा कर मर जाता है। इस घटना की व्याख्या धर्मशास्त्री, तत्व दार्शनिक और वैज्ञानिक तीनों के द्वारा अलग-अलग ढंग से की जाती है। धर्मशास्त्रीय विचारक इसे एक दैविक घटना मानकर ईश्वर की इच्छा के रूप में इसे स्वीकार करेगा जबकि तत्व दार्शनिक कहेगा कि मिलना और बिछड़ना प्रकृति का शाश्वत नियम है। अतः जन्म के समान मृत्यु भी एक स्वाभाविक घटना है। जबकि प्रत्यक्षवादी शव के वैज्ञानिक परीक्षण के बाद जहर का शरीर पर प्रभाव का अध्ययन करेगा और व्यक्ति की मृत्यु किस तरह से हुई है उस पर अपना विचार प्रकट करेगा। इस तरह एक वैज्ञानिक किसी भी घटना को किसी के कहने मात्र से ही सच नहीं मान लेता बल्कि निरीक्षण, परीक्षण, प्रयोग और वर्गीकरण के आधार पर ही उसे स्वीकार करेगा या अस्वीकार करेगा।



इस तरह हम कह सकते हैं कि सामाजिक घटनाओं के बारे में निरीक्षण, परीक्षण, प्रयोग एवं वर्गीकरण के आधार पर वैज्ञानिक पद्धतियों का प्रयोग करके ज्ञान अर्जन करना, नवीन तथ्यों को खोजना, नियमों, सिद्धांतों एवं निष्कर्षों को निकालना ही प्रत्यक्षवाद है।