टोटमवाद धर्म का प्रारंभिक स्वरूप -Totemism the Elementary Form of Religion

 टोटमवाद धर्म का प्रारंभिक स्वरूप -Totemism the Elementary Form of Religion


दुर्खीम ने टोटम को ही धर्म का प्रारंभिक स्वरूप माना है। दुखम का कहना है कि आत्माबाद, प्रकृतिवाद दोनों ही सिद्धांत धर्म की उत्पत्ति को समझाने में असमर्थ रहे हैं। दोनों ही पवित्र एवं साधारण के बीच भेद नहीं कर पाते हैं। दोनों कल्पनाओं को वास्तविकता का नाम देते हैं। दुर्खीम का कहना है कि आत्मा एवं प्रकृति से पृथक अन्य वास्तविकता भी है जो की धार्मिक भावनाओं को जन्म देती है। इन दोनों से अलग भी अन्य पूजा पद्धति है जो वास्तव में अधिक मौलिक और अधिक प्राचीन है जिससे यह दोनों पद्धतियां विकसित हुई हैं। दुखम के अनुसार यह पद्धति टोटमवाद है। दुखम के द्वारा टोटमवाद का ऐतिहासिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। टोटम शब्द सबसे पहले प्रयोग जे लोंग ने अपनी पुस्तक में 1791 में भारतीय समाज के संदर्भ में किया था। इसके बाद प्रारंभिक 50 वर्षों में टोटमवाद को केवल अमेरिका की विशेषता समझा गया।

परंतु 1841 में आस्ट्रेलिया में ग्रे. नामक विद्वान ने टोटम का वर्णन किया। मैक्लेनन ने प्रथम बार यह स्पष्ट किया कि टोटमवाद से ही विकसित धार्मिक व्यवस्थाओं से ही विश्वासों और क्रियाओं का विकास हुआ है। प्राचीन समाज में पाई जाने वाली पशु-पक्षियों एवं पेड़ों के प्रति सम्मान एवं पूजा का विकास भी टोटमवाद से ही हुआ है। मॉर्गन, फ्रेजर, रोबर्टसन स्मिथ, डॉल क्रोज, बोअस, स्वैन्टन, डोरसे, हिलटाउट, मिंडेलेफ स्टीवेंशन आदि विद्वानों ने विभिन्न समाजों में टोटमवाद का अध्यन किया।


दुर्खीम ने आस्ट्रेलिया की अरुंटा जनजाति में टोटमवाद का अध्ययन कर धर्म की उत्पत्ति को स्पष्ट किया। अरुंटा जनजाति को उन्होंने अपने अध्ययन के लिए इसलिए चुना क्योंकि यह जनजाति पूर्णता आदिम है और इसके अंदर प्रचलित टोटमवादी धर्म के आधार पर धर्म के सार्वभौमिक स्वरूप की उत्पत्ति की व्याख्या की जाती है।