सामाजिक प्रस्थिति के प्रकार - types of social status

 सामाजिक प्रस्थिति के प्रकार - types of social status


राल्फ लिंटन द्वारा सामाजिक प्रस्थिति को दो भागों में वर्गीकृत किया गया है 


(क) प्रदत्त प्रस्थिति


कुछ प्रस्थितियाँ सामाजिक व्यवस्था में व्यक्ति को स्वतः ही प्राप्त हो जाती हैं। ये प्रस्थितियाँ किसी व्यक्ति को जन्म से ही प्राप्त हो जाती हैं। किसी परिवार विशेष में जन्म लेने के कारण अथवा परंपरा आदि के कारण व्यक्ति को यह प्रस्थिति प्राप्त होती है। यह प्रस्थिति व्यक्ति को जब प्राप्त होती है, तब संबन्धित व्यक्ति के व्यक्तित्व व व्यवहार-विचार आदि बातों से समाज अनभिज्ञ रहता है। प्रदत्त प्रस्थिति पर किसी व्यक्ति का कोई अंकुश नहीं रहता है। प्रजाति, जाति, लिंग, धर्म, गोत्र, आयु आदि के आधार पर जिस प्रस्थिति की सदस्यता प्राप्त होती है, उसे ही हम प्रदत्त प्रस्थिति के रूप में समझते हैं। आदिम तथा परंपरागत समाजों में इस प्रकार की प्रस्थिति अधिक मात्रा में देखने को मिलती थी तथा आधुनिक समाजों में प्रदत्त प्रस्थिति अपेक्षाकृत कम पायी जाती है। प्रदत्त प्रस्थिति के निर्धारण हेतु उत्तरदाई प्रमुख कारकों को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है - 


1. जन्म


जन्म के आधार पर सामाजिक प्रस्थिति निर्धारित होती है।

व्यक्ति का जन्म किसी न किसी परिवार, जाति अथवा प्रजाति में होता है तथा इसी जन्म के आधार पर स्वतः ही व्यक्ति को अनेक सामाजिक प्रस्थितियाँ प्राप्त हो जाती हैं। किसी उच्च जाति, कुल, वंश अथवा परिवार में जन्म लेने के कारण व्यक्ति की सामाजिक प्रस्थिति स्वतः ही निम्न जाति, कुल, वंश अथवा परिवार में जन्म लेने वाले व्यक्ति से उच्च रहती है तथा उसी के अनुरूप उसे समाज में सम्मान व प्रतिष्ठा भी प्रदान की जाती है। राजतंत्र में राजा का चुनाव इसी आधार पर होता था। 


2. जाति एवं प्रजाति


भारतीय समाज में सामाजिक प्रस्थिति के निर्धारण में जाति व्यवस्था की भूमिका सदैव से ही प्रमुख रही है। तथाकथित उच्च जाति (ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य) में जन्म लेने वाले शिशु की सामाजिक प्रस्थिति तथाकथित निम्न अथवा अछूत जाति में जन्म लेने वाले शिशु से उच्च रहती है। ठीक इसी प्रकार प्रजाति के संदर्भ में भी सामाजिक प्रस्थिति का निर्धारण होता है। काले रंग से संबंधित प्रजाति की प्रस्थिति गोरी प्रजाति की तुलना में निम्न सामाजिक प्रस्थिति रहती है। 


3. लिंग भेद


संसार की प्रत्येक संस्कृतियों में स्त्री पुरुष की प्रस्थितियों और भुमिकाओं में पर्याप्त अंतर देखने को मिलता है। प्रायः स्त्रियों को भावुक, कमजोर, कोमल, धार्मिक तथा एक विवाही माना जाता है। वहीं इसके विपरीत पुरुषों को वीर, साहसी, तार्किक, मजबूत आदि एक रूप में समझा जाता है।

ऐसी दशा कमोबेश रूप में सभी पितृसत्तात्मक परिवारों में देखने को मिलती हैं। पुरुषों की स्थिति सदैव स्त्रियों की स्थिति से उच्च रहती है। हालांकि मातृसत्तात्मक परिवारों में लड़कियों की स्थिति को पुरुषों से उच्च माना जाता है। लिंगभेद के कारण ही स्त्री-पुरुष के सामाजिक कार्यों का निर्धारण होता है तथा साथ ही श्रम विभाजन में भी इसकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। स्त्री-पुरुष के कार्यों में भेद सन्स्क्र्तिक मूल्य और मान्यताओं के आधार पर होता है तथा इसका नियोजन जन्म से ही समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा कर दिया जाता है। किसी स्त्री द्वारा समाज द्वारा कौन से कार्य निर्धारित किए गए हैं तथा किसी पुरुष द्वारा कौन से कार्य करने चाहिए? स्त्री अथवा पुरुष को ऐसा प्रतीत ही नहीं हो पाता है कि उसे इन लिंगभेद से जुड़ी क्रियाओं को अलग-अलग तरीके से सिखाया जाता है, वह इन क्रियाओं को प्राकृतिक अभिव्यक्ति के रूप में स्वीकृत मानकर चलता है।


हालांकि वर्तमान समय में ये नियम कुछ कमजोर व लचीले हुये हैं। वर्तमान समय में स्त्री-पुरुष के कार्य क्षेत्रों में समानता लाने के उद्देश्य से लिंगभेद आधारित श्रम विभाजन का विरोध किया जाता है। आंशिक ही सही परंतु लिंगभेद आधारित कार्यों में कमी अवश्य आयी है। 


4. आयु भेद


लिंग भेद की तरह ही आयु भेद भी एक स्पष्ट शारीरिक लक्षण हैं, परंतु यह परिवर्तनशील भी है। आयु विभाजन शिशु, बालक, युवा, प्रौढ़, वृद्ध आदि के रूप में किया जा सकता है तथा इसी के अनुरूप व्यक्तियों को अलग-अलग सामाजिक प्रस्थितियाँ भी प्रदान की जाती हैं। अर्थात् आयु के अनुसार व्यक्ति को विशेष प्रस्थिति मिलती है तथा उसी के अनुरूप संबंधित व्यक्ति को समाज में सम्मान व प्रतिष्ठा भी प्राप्त होती है। समान्यतः सभी समाजों में अधिक आयु के लोगों अथवा वृद्धों को अपेक्षाकृत अधिक सम्मान दिया जाता है। पितृसत्तात्मक परिवार का मुखिया भी एक वयोवृद्ध पुरुष ही रहता है। वैदिक काल में निर्धारित किए गए आश्रमों का विभाजन भी आयु के ही आधार पर किया गया था ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम तथा सन्यास आश्रम।


हालांकि आयु को ही सदैव से प्रस्थिति निर्धारण मीन महत्वपूर्ण नहीं माना गया है, यदा-कदा इसके साथ अन्य सांस्कृतिक आधार भी जुड़े रहते हैं, जैसे आयु के संपत्ति आदि का अंतर्संबंधित होना। साथ लिंगभेद, कुशलता, क्षमता, नातेदारी


5. नातेदारी


नातेदारी भी प्रस्थिति के निर्धारण में आवश्यक भूमिका निभाती है।

एक व्यक्ति अपने माता-पिता से तथा अन्य रक्तसंबंधियों के साथ जुड़ा रहता है तथा उनसे जुड़े रहने के कारण अनेक प्रस्थितियाँ उसे स्वतः ही प्राप्त हो जाती हैं। ये सभी प्रस्थितियाँ नातेदारी के आधार पर ही प्राप्त होता हैं, क्योंकि किसी व्यक्ति द्वारा सचेतन अथवा अचेतन तरीके से अपने माता-पिता, भाई-बहन व अन्य संबंधियों का चयन नहीं किया जाता है। व्यक्ति अपने माता-पिता का धर्म, वर्ग आदि ग्रहण करता है तथा कभी-कभी वह उनके व्यवसाय को भी ग्रहण करता है। माता-पिता, भाई-बहन, चाचा-चाची, दादा-दादी, मौसी-मौसा, जीजा साला, साली, सास, स्वसुर आदि प्रकार की प्रस्थितियाँ नातेदारी व्यवस्था द्वारा ही प्राप्त होती हैं।


आदिम तथा जनजातीय समाजों में नातेदारी आधारित सामाजिक प्रस्थितियों का बहुत महत्व होता है, परंतु वर्तमान सी के आधुनिक समाजों में नातेदारी व्यवस्था अपेक्षाकृत कमजोर हुई है तथा इसका असर नातेदारी आधारित सामाजिक प्रस्थितियों पर भी देखने को मिलता है। 


6. शारीरिक विशिष्टताएँ


शारीरिक विशेषताओं के आधार पर भी सामाजिक प्रस्थितियाँ निर्धारित होती हैं। शरीर से सुंदर, बलशाली, गौर वर्ण, स्वस्थ्य व्यक्ति की सामाजिक प्रस्थिति कुरूप, काले रंग, अपंग, दुर्बल आदि प्रकार के लोगों से उच्च प्रकार की होती है।


(ख) अर्जित प्रस्थिति


सामाजिक प्रस्थिति के दूसरे स्वरूप के रूप में अर्जित प्रस्थिति की बात की जाती है। अर्जित प्रस्थिति से तात्पर्य उन सामाजिक प्रस्थितियों से है जिन्हें किसी व्यक्ति द्वारा अपनी योग्यता, कुशलता तथा गुणों द्वारा प्राप्त करता है। शिक्षा, व्यवसाय, विवाह, संपत्ति, श्रम विभाजन आदि आधारों का संबंध अर्जित प्रस्थिति से होता है। आधुनिक समाजों में गुण, कुशलता तथा परिश्रम को अधिक महत्व दिया जाता है तथा यही कारण है कि में इन समाजों में अर्जित प्रस्थिति की बहुलता देखने को मिलती है। प्रदत्त प्रस्थिति के निर्धारण हेतु उत्तरदाई प्रमुख कारकों को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है -


1. शिक्षा


शिक्षित व्यक्ति की सामाजिक प्रस्थिति अशिक्षित व्यक्ति की सामाजिक प्रस्थिति की तुलना में उच्च में मानी जाती है। शिक्षित अशिक्षित के अलावा शिक्षा के स्तर के आधार पर भी प्रस्थिति का निर्धारण होता है। उदाहरणस्वरूप, किसी स्नातक व्यक्ति की सामाजिक प्रस्थिति किसी हाईस्कूल व्यक्ति की सामाजिक प्रस्थिति  से उच्च समझी जाती है। वर्तमान समय में शिक्षा के बढ़ते महात्व के कारण इसे प्रस्थिति के निर्धारण में एक महत्वपूर्ण कारक के रूप में व्याख्यायित किया जा सकता है। 


2. व्यवसाय


व्यवसाय के आधार पर भी सामाजिक प्रस्थिति का निर्धारण होता है। जिस किसी व्यवसाय के साथ ऊंचा पद और प्रतिष्ठा जुड़ा हुआ है, उसकी प्रस्थिति स्वाभाविक रूप से किसी निम्न पद व कम प्रतिष्ठा वाले व्यवसाय में लगे हुये व्यक्ति की सामाजिक प्रस्थिति से उच्च होगी। उदाहरणस्वरूप, किसी चिकित्सक अथवा इंजीनियर की सामाजिक प्रस्थिति किसी मजदूर अथवा चपरासी की सामाजिक प्रस्थिति से उच्च समझी जाती है।


3. संपत्ति


संपत्ति पर आधिपत्य भी सामाजिक प्रस्थिति को निर्धारित करता है। यहाँ इस बात पर ध्यान देना आवश्यक है कि मात्र संपत्ति पर आधिपत्य ही प्रस्थिति को निर्धारित नहीं करता है, अपितु यहाँ इस बात पर भी ध्यान दिया जाता है कि संपत्ति के संकलन में किस प्रकार के साधनों व तरीकों को अपनाया गया है। क्या वे साधन अथवा तरीके समाज द्वारा स्वीकृत हैं अथवा अस्वीकृत ? उदाहरणस्वरूप, किसी ईमानदार पूंजीपति की प्रस्थिति गलत तरीके से अर्जित की गई संपत्ति वाले व्यक्ति की प्रस्थिति से सदैव ऊंची समझी जाती है। 


4. विवाह


विवाह के उपरांत व्यक्ति को माता-पिता, पति-पत्नी की प्रस्थिति प्राप्त होती है तथा इसके अलावा भाभी, बहू, जीजा साली आदि प्रस्थितियाँ भी इसके पश्चात प्राप्त होती हैं। विवाह के स्वरूप तथा दशाओं के आधार पर भी प्रस्थिति निर्धारित होती है। उदाहरणस्वरूप, विधवा अथवा विधुर, एक विवाह, बहु विवाह आदि के आधार पर भी अलग-अलग सामाजिक प्रस्थिति प्राप्त होती है।


5. राजनैतिक सत्ता


राजनीतिक सत्ता पर आधिपत्य के आधार पर ही शासक तथा शासित के मध्य भेद किया जाता है। लोकतन्त्र में शासक दल से संबंधित नेताओं की प्रस्थिति को अशासक दल के नेताओं की प्रस्थिति से प्रायः उच्च रहती है। इसके अलावा जिन व्यक्तियों के पास राजनैतिक सत्ता रहती है, उनकी प्रस्थिति राजनैतिक शक्ति न रखने वाले लोगों की तुलना में उच्च रहती है। 


6. उपलब्धियाँ


वर्तमान समय में व्यक्ति अपने परिश्रम के आधार पर कुशलता प्राप्त कर अपने सामाजिक प्रस्थिति में बढ़ोत्तरी कर सकते हैं। सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, शैक्षणिक आदि क्षेत्रों में व्यक्ति अपने परिश्रम के द्वारा उपलब्धि हासिल कर सकता है तथा यह उपलब्धि व्यक्ति को सामाजिक प्रस्थिति प्रदान करने में सहायक होती है। उदाहरणस्वरूप, वैज्ञानिक, कलाकार अथवा खिलाड़ी की प्रस्थिति।