वर्णाश्रम धर्म - Varnashrama Dharma

 वर्णाश्रम धर्म - Varnashrama Dharma


कौटिल्य ने अपनी पुस्तक अर्थशास्त्र के प्रथम खंड में वर्णाश्रम धर्म का उल्लेख किया है जिसमें उन्होंने विभिन्न वर्णों के निए कर्तव्य निर्धारण किया है- ब्रह्ममण का धर्म पढना पढाना, यज्ञ-याजन और दान लेना व देना है। क्षत्रिय का धर्म पढना, यज्ञ करना, दान देना, शस्त्र बल से समाज एवं जीवों की रक्षा करना। वैश्य का धर्म है पढना, यज्ञ करना, दान देना। कृषि कार्य, पशुपालन तथा व्यापार करना। उसी प्रकार शूद्र का कार्य ब्रह्ममण क्षत्रिय-वैश्य की सेवा करना, खेती करना और गाने-बजाने तथा कारीगरी का काम करना।


उसी प्रकार कौटिल्य ने आश्रम धर्म का भी उल्लेख किया है ब्रम्हचारी का धर्म है नियमित स्वाध्याय करें अग्निहोत्र तथा रूद्राभिषेक करना, भिक्षा के लिए घूमना, गुरू के निकट रहना।

गृहस्थ का कर्तव्य है कि वह अपनी परंपरा के अनुकूल कार्यों से जीविका पालन करें, अपने से बराबर अथवा भिन्न गोत्र वालों से विवाह-संबंध स्थापित करना, देवता, पितर, अतिथि और सेवकों को भोजन देने के बाद सबसे अन्त में स्वयं भोजन करना। वानप्रस्थी का धर्म ब्रम्हचर्य पूर्वक रहना, भूमि पर शयन करना, जटा व मृगचर्म धारण करना। संन्यासी का धर्म है इन्द्रियों को काबू में रखना, इच्छारहित होना, एक जगह न ठहरना, जंगल में वास करना, मन, वचन, कर्म से पवित्र रहना ये सब वर्ण तथा आश्रम के लिए साधारण धर्म है अतः इनका प्रत्येक वर्ण को पालन करना चाहिए।